बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

अबके परती में बीया बोआई ,ऐ भाई !
तनी हाथ राउओ लगायी ऐ भाई !
कहीं रेन्ड जामल, कहीं राढ पनपल
कहीं नूनछत मांटी के ऊसर भेटाई |
बहुत दिन से एईमें ना खादर परल बा
बहुत दिन से एईमें ना भईल जोताई |
पत्थर बुझातिया धरती जे अबहिन
उहे मांटी पाछे में सोना उगाई |
तनिक जोर लागी,तनिक देह थाकी
शुरूआती में तनिका-सा मेहनत बुझाई |
सभै मिल के तनी -तनी देह लगायी तs
काम केतनो बा मुश्किल ई तुरते हो जाइ |
गेंहू ,आ रहर ,आ सरसों,आ तीसी,
आ धनिया आ लहसुन,आ मरीचा रोपाई |
जे खाए के बईठी त कुछउओ कम ना होखे
आ अगलों के, बगलों के ,सगरो के जिमायीं |
दू गो रेन्ड के पेड़ डॉरांडी पर छोड़ दी
जे एहमें से तनिका सा तेल निकलाई |
आ बजरिया से लिज्जत के पापड ले आयी
आखर के जन्मदिन के भोज-भात खियाईं |