बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

सोमवार, 7 सितंबर 2015

खुंड़िआरी पर राजनीत ,
आ सड़क पर लाठा लाठी |
कान फुंकईया अन्हे-अन्हे
मुंहसोझा भतराकाटी |
हुनकर नोचल हुनकर चोथल
नेकी हुनकर इनरा डारी |
मने-मने लुत्ती लागल
मुंहझौंसा, बढ़नीमारी |
बीख चढ़ल नकिया पर
जिभीया माई बहिन के दे गारी|
बड़ा ठसक बा गांव के हमरा
रउओ कबो झाँकी पारी |
एक बकोटा माटी लेहनी
यूपी आ बिहार से |
दोसर बकोटा माटी लेहनी
आन्हकेहु के दुवार से |
कि हमर माटी - हरदम गाभिन ;
आन्ह के माटी- कबो गाभिन ; कबो बिसुकल !
तबो आन्हकेहु काँहे हरखित ;
आ हम हर दफे काँहे बिसूरत ?
-करवईया बिनु !
माटी के कोड़वईया बिनु ,
हरनधी करवईया बिनु,
मड़ई के छ्वइया बिनु,
जंगली घास गर्हवईया बिनु ,
(सबसे आगे ;सबसे बढ़के )
-गीत नया लिखवइया बिनु ,
सोहर के गवईया बिनु ,
सीख नया सिखवइया बिनु ,
आगे बढ़ के लड़वइया बिनु ,
(कँहा बा लोग उ लोग ,होs ?केने बा लोग उ लोग? )
-खेत कोड़त बा , हर जोतत बा
मड़ई छावत बा गीत गावत बा; आन्हे के
खूब लड़त बा ,खूब पढ़त बा
चमचागिरी में नाम करत बा
बाकिर सगरो कुल्हि आन्हे के
(आपन काम फलाने के)
तब काs सींकहर टाँगे के?
लमहर-लमहर मुंह बावे के
बड़हन धोंधा बान्हे के|
प्रणाम उन शिक्षकों को जिन्होंने गढ़ -गढ़ काढ़े थे खोट |
नमन उनको जो कहा करते थे -सोच ,कुछ अच्छा सोच |
अभिनंदन उनको जिनका हम हरदम खिल्ली उड़ाते थे |
वंदन उनको जो फिर भी हमें प्रेम से सिखलाते थे |
आज उनके न होने की कमी बहुत खलती है |
अब कोई नहीं बताता हमने किया कहाँ गलती है |
हे प्रगल्भ - रणछोर ,चोर-माखन के ,हे लीलाधारी
कहां गुम हुई जन्मदिवस पर सह-जन्मी वह बहन तुम्हारी
जन्मदिवस की धुमधाम बस अपने लिए आरक्षित करके
तुम कृतघ्न बैठे हो उसके अस्तित्व -मात्र को विस्मृत करके
तुम पकवानों से घिरे स्वर्ण झूलाओं पर झूले बैठे हो
अपनी बहना के हिस्से का दायभाग भी भूले बैठे हो
हे छद्म वीर रणछोर हमेशा रण में पीठ दिखानेवाले
भरमा भरमाकर लोगों के कंधे से तीर चलानेवाले
घोर विपत्ति बीच हमेशा एक ओट छुपजानेवाले
खुद कर्तव्यहीन अन्य को ज्ञान बहुत सिखलानेवाले
कुछ तो यश गाओ योगमाया के वीर इरादों के
जो सम्मुख होकर लड़ी कंस के दुर्निवार आघातों से
माँ के आँचल में छुपे हुए थे तुम जब गोकुल के राजमहल में
उसी समय से बहन तुम्हारी रहती आई विंध्याचल में
कालांतर में सम्राट हुए अपना इतिहास लिखवाया तुमने
पर बहना का एक हर्फ़ भी जिक्र कहीं ना लाया तुमने
वह आज भी कुछ गुमनाम तुम्हारे नाम से विमुख खड़ी है
माँ है ,पूजा होती है ,पर उसका जन्मदिवस ज्ञात नहीं है
लाज धरो ,केशव!यश गाओ अपनी रक्षाकरिणी बहना का
जब भी जन्म दिवस मनाओ संग मनाओ बहना का