बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

रविवार, 28 दिसंबर 2014

हे प्रथमपूज्य ,हे वक्रतुण्ड, हे लम्बोदर ,मूषकवाहन !
हे शैलसुतासुत, एकदन्त ,हे ऋद्धि -सिद्धि के फलदायक !
एक यक्षप्रश्न का समाधान मै आपसे सुनने आया हूँ I
कितने शीश कटे गिरी पर मैं उनकों गिनने आया हूँ I
माता की लाज बचाने हेतु बाल गणेश प्रहरी- सा डंटा था I
कर्तव्यनिष्ठ था, निर्भय था, इस कारण उसका शीश कटा था I
इतिहास ने खुद को दुहराया है, यह कितनी निष्ठुर विधना है I
आज भी हेमराज का सर माता की रक्षा हेतु कटा है I
उस समय माता के क्रंदन का कुछ भी उपचार हुआ तो था I
किसी तरह गजमस्तक से ही बाल गणेश जिया तो था I
पर नहीं किसी को हेमराज का त्याग दिखाई देता है I
उसके घरवाले रोतें है पर किसे सुनाई देता है ?
खंडित भाल साथ ले गए वे दानव आततायी हैं I
स्वजनों को भी कहाँ त्याग का मोल समझ में आई है ?
कबतक अपमान सहन होगा कबतक माताएं रोयेंगी ?
वसुधा कबतक उसके रक्षा हित उद्द्यत सैनिक खोयेगी ?
हे विघ्नहरण, हे गणनायक ,कुछ ऐसा कौतुक दिखलाएं !
फिर ना कोई माता रोवे फिर ना कोई सर काटा जाये I
चाऊंर के खेत |
सोगहक धनगर खेत |
दादा - परदादा के निशानी खेत |
घर के इज्जत , खानदानी खेत |
माटी से सोना उपिजावे |
अन्न -धन के बरखा करवावे |
दुलरुआ पूत से अधिक लायक -
सभकर हियरा जुड़ावे खेत |
उहे खेत ,
मटियामेट ---
करि दिहले चारु भाई |
जिनकर झागरा कहियो ना ओराई |
इंची टेप से नापल जाइ
आरी -डंडारी से पाटल जाइ |
गते - गते काटल जाइ
सँउसे लमहर खेत |
अब कइसे हरखित रहि पाई -
आ दोसरा के का भूख़ मेटाई -
अपने दूबर पातर खेत |
हाय रे ! हेतना असहाय -
छींछवत--कुहुकत --बिसूरत – टूअर -
भाई -भाई में बाँटल खेत !
आमद - ए - हुस्न जब रेल में बढ़ जाती है
खुदा कसम ट्रेन जन्नत-सी नज़र आती है
कुछ दूध से भी गोरी , कुछ सांवली काजल-जैसी
कुछ हिज़ाबवालियों के चहरे पर जाली है
सुर्ख ,फिरोज़ी ,बैगुनी हैं पोशाक उनके
फिज़ाओ में खुशनुमा ,सतरंगी बहार आई है
इत्तर- फुलेल की खुश्बूएं फैलीं हरसूँ
कोई चमेली है ,चंपा है ,तो कोई गुलाब की डाली है
कोई इशारों से करे बात ;कोई देख कर शर्माएं
किसी ने मेरी नाम- पता- हैसियत तक पूछ डाली है
बंदिशे सख्त हैं ; पर जोश मेरा भी कम नहीं
मंज़िल दूर है अभी ;रेल का सफर जारी है
अहा ! यह अमूल्य जीवन
और इसके -
रत्नो-से भी अधिक कीमती पल !
और , कुछ क्षण के लिए ही सही
मैं हुआ प्रतिबद्ध दृढ़तर
कि सहेज लूँगा मैं पल - पल -
रत्न की ही माफिक !
किन्तु हाय ,
रेत के माफिक बाहर गिरे
ये कीमती पल !
बंद होती मुठ्ठियों से और भी वेगतर !
शेष पल हो गए है
और भी बहुमूल्य अब !!!!
हमार शिवनारायण भाई -
पूजा पाठ ना जानेले |
लोग कहेला कि उ भगवान के ना मानेले |
दिन में शराब पियेले ; रात में गांजा |
जब दुनू ओराउ , तब भांग के भाँजा |
लोग घिनाला उनका से ;
कगरियाला उनका से |
हमरा त बड़ा पटेला ,नीमन फरियाला उनका से |
ना, ना हमारा में कवनो ऐगुन नईखे |
हम पियक्कड़ ना हईं |
बाकिर हमहीं उनका बकवास के बुझक्कड़ हईं |
हमारा उ काहें भावेले ई कथा से बुझाई रउआ |
उनकर झूठ-साँच सभै फरियाईं रउआ |
बात तेरस के हा ; ओहिदीन शिव जी के पूजा रहे |
शिवनारायण भाई के हाथ में गंगा-जल ,बेलपत्र , आ धतूरा रहे |
हमारा से कहले कि शिव जी उनकर गुरु हईं, आ गुरु-मंतर हईं |
काSहे कि शिव जी उनका नियर पियक्कड़ हईं |
उ कहले कि हम आज शिव जी के पहिले जल चढ़ायेम ;
तबै दू ढकना मुंह में लाएम |
हमनी के दुनू जाना मंदिर में गईनी जा |
भारी अचरज !
शिवलिंग गायब ! खलिहा गड़हा रहे ओहिजा !
ई मत बुझी कि शिवनारायण भाई से शिव जी लुका गईनी |
ना, ना,उहाँमें रतन जड़ल रहे ,
उहाँके इंटरनेशनल मार्किट में बेंचा गईनी |
पंडीजी पूजा करत-करत गज़ब करी देहले |
तेरस के दिनहिं शिव जी के स्मगल करि देहले |
बाकिर शिवनारायण भाई हिमत नाS हारले |
गणेश मंदिर गईले --
जल बेपत्र धतूरा ओहिजा चढवले |
गणेश जी से कहले-‘’आsहो बबुआ !
राउर बाबूजी त बिदेश घूमे गईल बानी |’’
‘’उहाँ के आयीं , त कही देब- काका आ के, चल गईल बानी |
हमरा घरे कुल्हि ढेर काम सरिहारे के बा |
भांग पियेके बा चिलम चढ़ावे के बा |’’
‘’एही से अबहिन जात बानी |
ई जल बेलपत्र राउए के चढ़ा देत बानी |’’
हम उहवा देखनी जे रोज़ पूजा करे वाला--
पत्थर पूजेवाला --
भगवान के बेंचि के खा गईले |
आ नास्तिक शिवनारायण भाई -
शराब पियेवाला --
पथरो के भगवान बना गईले |
बात त ढेर लमहर हो गईल; बाकिर अब बतायीं राउआ |
सही माने में आस्तिक के फरियाई राउआ |
बस यही दुआ है -
जल उठे सब झालरों की लाईटे-
जो कल लिया था आपने बाज़ार से !
और कमतर ही मिले मिलावटें,
उन लड्डुओं में -
जो मिले थे पास की दुकान से !
और फुस्स से न बजे धम्म से बजे,
वो चाइनीज़ पटाखे-
जो खूब महंगा जानकर आपने लियाथा !
औए सबकुछ ठीक वैसे ही चले,
जैसा की प्लानिंग आपने पहले किया था !
आपको दीपोत्सव की मेरी शुभ कामना है !
बस यही दुआ है !!!!!!
झड़ गए हैं शब्द तुम्हारे मुँह से ,
पोपली भी हो गयी है बुद्धि तुम्हारी ,
आ रही बदबू तुम्हारी सोच से ,
भावनाओं में शिथिलता व्याप्त है,
उसपर तुर्रा यह कि तुम हो अनुभवी -
सबसे अधिक ;
विश्व के प्रतिपल बदलते परिदृश्य में |
कबो एकहुँ ना हाथ में आवे
मन चाहो कि सभ मिल जावे
रंग रंग के तितली जइसन लरिकाई के ख्वाब |


जेतना लागत ; ओतने लाभ
ना तनी अधिक ना तनिको घाट
पंसारी के गल्ला जइसन तरुनाई के ख्वाब |



कुछु टूट गईल कुछु चनक गईल
कुछु बेमन से जतन धईल
शीशा जइसन हो जाला बुढ भईला पर ख्वाब |



जवन ख़्वाब शेष रहि जाला
संतति के मन में घुस जाला
देहि भले मर जाओ बाकिर न मुएला ख्वाब |



रंग बिरंगा बाकिर महंगा शीशा जइसन ख्वाब |
जीवन के सुघर फेड़ के बीया जइसन ख़्वाब |
बात के कुछ एह तरे कहल गईल बा |
बात खलिहा बात भर के रह गईल बा |
एगो मुँह के बात कई गो मुँह से सुननी
एके बतिया , कई गो माने हो गईल बा |
साँच बोलनी ; अपजसी में नाम भईल
चुप रहलको बुरबकाही हो गईल बा |
एगो बुरबक हम अकेले बाँचि गईनीँ
गांव सगरो आज ज्ञानी हो गईल बा |
चलs ए मन , छोड़ द साँचका कहलका
लोग अब झूठका के साथी हो गईल बा |
सच का मुंह बदसूरत क्यूँ है ?
झूठ के मुंह पर मेकअप क्यूँ है ?
झूठ में सच का घालमेल ,
यह इंसानों की फितरत क्यूँ है ?
गदहे जब से राजा बन गए
सारी दुनिया भौचक क्यूँ है ?
कौए राजमहल जा बैठे -
बहुमत इतना घातक क्यूँ है ?
चिल्लाना अब राजधर्म है ,
मौन अभी इतना चुप क्यूँ है ?
एक मनस्वी के सम्मुख
सबकी बुद्धि नतमस्तक क्यूँ है ?
यह किस युग की नीरवता है ,
प्रश्नों की कम ताकत क्यूँ है ?
राम ने शिव धनु तोड़ दिया तो
विश्वामित्र भी गुपचुप क्यूँ है ?
अगडम -बगडम ,अनर्गल फ़ांय-फूंय
टुच्ची -बतकुच्ची -बेमतलब- माथापच्ची
थियरी,बिचार, वाद -विवाद, बकवाद
हो-हो ,हल्ला बोल, बजाओ ढोल
ऊपर दीखे ठोस; नीचे पोलमपोल
लच्छेदार भोजन; लच्छेदार बोल ,
घुमाओ गोल गोल
आलाप-विलाप-प्रलाप हवा-हवाई
दिखावे की पीर अपनी ;दूसरे के पैर में बिवाई
ये भी ,वो भी ,भी-भी, खीं-खीं, हा-हा, ही-ही
टेबुल के नीचे सेटलमेंट ,बंटाई
बस अपने हिस्से मिल जाये थोड़ी मलाई
फिर आपादमस्तक नमन; चाटेंगे वमन
ये देश के विद्वान हैं ,संभ्रांत हैं ,सम-भ्रांत है ,उद- भ्रांत हैं !
चानी पर के केश
धीरे धीरे कर के सगरो झर गईल |
एगो- दुगो दाढ़ी के बाल पर
टटका सफेदी पसर गईल |
अँखियाँ के नीचे-
झुर्री पर गईल ;
चमड़ा सिकुड़ गईल |
बी ए ,भा एम ए ,भा पि एच डी -
कुल्हि पढ़ाई ,पढ़ते -पढ़त सपर गईल |
पहिले जे कहल तोहके चाचा
अबके उहो चाचा बन गईल |
ऐ भाई , गांव भर के गोधन त कुटा गईल
तोहार गोधन कहवाँ बिचिल गईल ?
हुनकर रसगुल्ला बड़हन बा
हुनकर कनबाली दमिल बा
हुनकर साड़ी जरी- बनारसी
आ हुनकर पायल भारी बा
आ हुनका बम में बेशी दम बा
हुनकर फुलझरिया धाँसू बा
बा हुनका लगे अनार मरिचाई
छुरछुरियो बा आकाशियो बा
हऊ हमरा घरे ना अईले
हऊ हमरा घर के ना खइले
हऊ बड़ा टेढ़ बतियावेले
जे हमारा मन के ना कईले
हर बात पर रगड़ा- झगड़ा जी
कुछ मनभीतर कुछ बहरा जी
कईसन बीतल यह साल दिवाली
दियना जरल कि जियरा जी ?


कभी यह सोचता हूँ कि ग़ालिब बन ही जाऊँ मैं
मगर अच्छा नहीं लगता है मुझको मुसलमाँ होना |
चलो शुरुआत करतें है, मुसलमाँ बन भी जाते है
मुझे ही कुफ्र लगता है मेरा दारू पिया होना |
यहाँ तक ठीक है, दो बूँद दारू पी लिया तो क्या
घटिया है ,किसी बेहैसियत साकी पर फ़िदा होना |
हुस्ने -साकी की लज्जत आजमाने में बुराई क्या
मगर ये बेहयाई है कि उसपर ग़ज़ल कहना |
ग़ालिब!लिखो तुम शेर ,पढूंगा मैं, मज़े लूँगा
मुझे बेहतर यही जंचता है जहाँ हूँ मैं; वहीँ रहना |

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

अबके परती में बीया बोआई ,ऐ भाई !
तनी हाथ राउओ लगायी ऐ भाई !
कहीं रेन्ड जामल, कहीं राढ पनपल
कहीं नूनछत मांटी के ऊसर भेटाई |
बहुत दिन से एईमें ना खादर परल बा
बहुत दिन से एईमें ना भईल जोताई |
पत्थर बुझातिया धरती जे अबहिन
उहे मांटी पाछे में सोना उगाई |
तनिक जोर लागी,तनिक देह थाकी
शुरूआती में तनिका-सा मेहनत बुझाई |
सभै मिल के तनी -तनी देह लगायी तs
काम केतनो बा मुश्किल ई तुरते हो जाइ |
गेंहू ,आ रहर ,आ सरसों,आ तीसी,
आ धनिया आ लहसुन,आ मरीचा रोपाई |
जे खाए के बईठी त कुछउओ कम ना होखे
आ अगलों के, बगलों के ,सगरो के जिमायीं |
दू गो रेन्ड के पेड़ डॉरांडी पर छोड़ दी
जे एहमें से तनिका सा तेल निकलाई |
आ बजरिया से लिज्जत के पापड ले आयी
आखर के जन्मदिन के भोज-भात खियाईं |

शनिवार, 20 सितंबर 2014

रेS , मुए वाला बिया उ बुढ़िया माई !
मोर माई ,तोर माई , जवार के माई !
ढेर दिन से रहली हा बेमार I
केहु लउकत ना रहल हा तीमारदार I
जबसे बुढ़िया के बक्सा खोलाईल हा I
नगदे लोग बिटोराईल हा I
अब तहनि के छोड़ाS सन सेवा पानी कइल I
बुढ़िया के आपन कहाये वाला लोग आ गईल I
बढ़नी मारो कु-रहनी के !
भाग सन तहनि के !
अशुद्ध ;नीच ----
तहनि के नाश करि देहला सन I
बाहर जा के चुपचाप बइठा सन I
अब बुढ़िया के घीव मलल जाइ I
रेशम के कफ़न में लपेटल जाइ I
चारि आदमी कान्हा पर उठाई I
ले जा के दफ़न करि आई ; शमशान में I
थोरे दिन खूब हो-हाला रही ; श्राद्ध के I
सब लोगन के राय होइ
त तहनियो के बोलावल जाइ I
आके खूब रोइहां सन, माई ! माई !
फेनु साल साल भर पर बरखी मेटावल जाइ I
बस ओहि दिने बुढ़िया के करनी के गावल जाइ I
तब तहनि के ना बोलावल जाइ I
अशुद्ध ! नीच !
राउर बोली चाहे भासा ,चचा,
बहुत्ते मधुर छै I
दरभंगिया के भाषा, चचा,
करइ छै , बुझइ छै I
पहिले -पहिल त कुछुओ ना बुझाउ I
छि-छा कहि के हमन के करथिन जा मज़ाक I
बाकिर जिकिर जब ---
मलदहिया आम क, रोहू क -
तीसी क, कोल्हू क -
चिउरा क, दही क -
अदौरी क, बरी क -
आवै चचा !
राउर कवित्त चचा, कुछु-किछु तS बुझाउ I
बाकिर तबहुँ एगो लमहर गैप रहि जाऊ -
भाषा के I
चचा !
जदि नागार्जुन बन के रउआ हिंदी में ना लिखले रहितीं I
त राउर भासा के सुगढ़ता के -
राउर बोली के मधुरता के -
मरम हम कैसे पइतीं ?
एही से , आज के हिंदी दिवस पर,
हे यात्री चचा ! हे नागार्जुन बाबा !हे वैद्य नाथ मिसिर जी !
रउआ के दिल से धन्यवाद !
बहुत अच्छा है अगर किसी की लाज बचा ली जाये !
पर इसके लिए क्यों किसी की पगड़ी उछाली जाये !
मनहूस शहर में एक तू ही बचा था दोस्त मेरा
चल , अब तुझसे भी अदावत पाली जाये !
 जमाना सिर्फ मेरी बुराईयों पर गौर करता है !
अच्छाई जो भी करता है कोई और करता है !
बहुत नाज़ुक हो गए आजकल रिश्तों के धागे
तुरंत ही टूट जाते है जब भी जोर पड़ता है !
बहुत गुलज़ार थी उनकी हवेली चार बच्चों से
अब सबकी हुयी शादी यहाँ पर कौन रहता है !
जब भी मिले यह शख्श जम कर पीटना इसको
पकाता है बहुत जब फेसबुक पर शेर कहता है !
कि ताकत आजमाया जा रहा है
मुझे गदहा बनाया जा रहा है I

फकत घास है किस्मत में मेरे
मुझे ये भी सिखाया जा रहा है I

अंगूर मेरी नज़रों से हटाकर
उसे खट्टा बताया जा रहा है I
ख़बर है कि मेरे पीठ पीछे
कोई खिचड़ी पकाया जा रहा है I
उसे मालूम है वो पहले कटेगा
जो बकरा ज्यादा खिलाया जा रह है I
वो भी हंस रहा है आज सब पर
जिसकी खिल्ली उड़ाया जा रहा है I
रात होने तो दे उसे सब दिखेगा
जिसे उल्लू बनाया जा रहा है I
कहीं से तर्ज़ कहीं से हर्फ़ लेकर
इस ग़ज़ल को बनाया जा रहा हैI
फिर से वही कहानी मैं सुनाये जा रहा हूँ I
पुरानी गलतियों को ही दुहराये जा रहा हूँ I
जानता हूँ जेब में खंजर लिए हुवे है
उन दुश्मनों को भी गले लगाये जा रहा हूँ I
मुफलिसी में काम आएगी जो मेरी दौलत
दोनों ही हाथों से उसे लुटाए जा रहा हूँ I
यूं तो मेरे जिगर में हैं जख्म बड़े गहरे
दुनिया के लिए ही सही मुस्कुराये जा रहा हूँ I
तुम भी पीठ पीछे मुझे उल्लू ही कहोगे
जो अपने सारे ऐब मैं बताये जा रहा हूँ I
जिंदगी अब तो दोराहे पर खड़ी है I
किस तरफ जाएँ यही दुविधा बड़ी है I
इस डगर का लक्ष्य से रिश्ता नहीं है ;
और दूसरी मुश्किलों से भरी पड़ी है I
वक्त है कि सोचने तक भी न रूकता
और हमको सोचने की जल्दी पड़ी है I
क्या करें ?जाएँ कहाँ ?-यह है समस्या
किंकर्तव्यविमूढ़ता सम्मुख खड़ी है I
हे प्रभु! संत्रास हरो ! अवलम्ब तुम हो !
सिवा तेरे संभावना अब तो नहीं है !


लात-जूता , लाठी-घूँसा
दुलार –पुचकार, झिड़की -दुत्कार
हार-पर-हार , बिपत अपार
मिलल सब ; बाकिर हम -
उहे कइनी जवन मन में धईनी !
मन में धईनी ,मनन कइनी
सोच-विचार , क्रिया-व्यौहार
जीत चाहे हार
सगरों परिनाम-
के खाली हम जिम्मेदार !
हम जिम्मेदार ---
त गांव -समाज के का सरोकार ?
का सरोकार ?
बुद्धि -विचार , धन -व्यौपार
क्षण भर के साथ, सहारा के हाथ
समाज ना देला !
त समाज का देला ?
लात-जूता , लाठी –घूँसा
दुलार –पुचकार, झिड़की -दुत्कार
हार-पर-हार , बिपत अपार …………………….
राम-राम ! हे राम !

बुधवार, 3 सितंबर 2014

जो बीत गये कुछ साल बिना कुछ किये हुये ही......
जो रीते-से कुछ पल गुजरे है,बिना ह्रुदय छुये ही....
जो स्व्प्न अधूरे छूट गये क्या उनसे मिलने जाऊ मै
य़ा नये सपनो की दुनिया की ओर घूमने जाऊ मै
यह जन्मदिवस का द्व्न्द्व हमेशा आ जा ता है
कुछ खुशियो का उपहार भी लिये आता है
युग बीते करते प्रयास
पुरे न हुए मन के आश
जीवन पथ का पिछला वर्ष
थोड़े गम तो थोड़े हर्ष
कुछ मस्त फूल कुछ त्रस्त शूल
कुछ नए सबक कुछ नयी भूल
हे, जीवन पथके गत साल
लू विदा मै तुमसे अब सोल्लास
पुनः कुछ करने है प्रयास
पूरे करने है कुछ आश
ये दीपों का त्योहार , बंधु !
लाये जीवन में प्यार ,बंधु !
फैले चहुँ ओर उजास ,बंधु !
सफल हों सबके प्रयास , बंधु !
घर भरा रहे खुशियों से , मित्र !
बर्फी ,मोदक , गुझियों से ,मित्र !
भस्म हो सारे दुर्योग , मित्र !
पुष्पित हो सुखद सुयोग , मित्र!
बस यही दुआ है -
जल उठे सब झालरों की लाईटे
जो कल लिया था आपने बाज़ार से !
और कमतर ही मिले मिलावटें
उन लड्डुओं में -
जो मिले थे पास की दुकान से !
और फुस्स स न बजे धम्म से बजे
वो चाइनीज़ पटाखे
जो खूब महंगा जानकर आपने लियाथा !
औए सबकुछ ठीक वैसे ही चले
जैसा की प्लानिंग आपने पहले किया था !
आपको दीपोत्सव की मेरी शुभ कामना है !
बस यही दुआ है !!!!!!
गत वर्ष सहर्ष सोल्लास गया
अब नूतन वर्ष का स्वागत कीजिये
इस वर्ष करेंगे नया कुछ ही
नये इस साल में यह प्रण लीजिये
जो प्राप्त हुए अक्षुण्ण रहे
अप्राप्त फलों को भी हस्तगत कीजिये
क्षमा हो, विलम्ब हुआ है मगर
नव वर्ष कि मेरी शुभकामना लीजिये
दाढ़ी के दो पके बाल !
काले बालों से अधिक प्रखर श्वेताभ छटा,
युवा तन के परदे को एक ओर हटा,
करने आये प्रौढ़ावस्था को स्वागत प्रणाम !
दाढ़ी के दो पके बाल !
" क्या अब से ही गत यौवन" कर लूँ स्वीकार ?
कदापि नहीं इतनी जल्दी मानूंगा हार ,
अब तक किया केश रञ्जित अबकी बार ,
नहीं बचेंगे दाढ़ी के दो पके बाल !!!!!
दाढ़ी के दो पके बाल !
एगो चप्पल नया किनाइल पिछला खिचड़ी के मेला में !
अबले धईले बाड़े काका पैकिंग सहित्ते झोरा में !
जब जइहें ससुरारी ओहिदिन पैकिंग उ खोलिहें !
भले पैकिंग खोल दीन्हे बाकिर गोड़ में न डलिहें !
हाथ में चप्पल कान्हे कुरता ससुरारी टांगले जइहें !
जब सीवान नियराई देह में कुरता तब डलिहें !
चप्पल के त पारी आई ससुर जी के दुअरा पर !
हाथ के चप्पल गोड़ में जाई सरहज के पाँव छूवला पर !
बहुते नया चप्पल बा पाहून सारिन सारहा जब कहिहैं !
फाटल गोड़ के पीर भुला खूब ठठा के काका हसिहें !
फेन बिदाई के बेरा हाथे चप्पल कान्हे कुरता !
घरे वापस अइहें काका खेते खेते घूमता फिरता !
कुरता खूँटी पर टाँगल जाई चप्पल जाई बक्सा में!
दुन्नु के फेर नंबर आई अगिला ससुरारी जात्रा में !
शहर के एक कोने मेरी एक दुकान थी !
इसकी अपनी उम्दा आन बान शान थी !
न अपना धंधा मंदा था न कोई काम गन्दा था!
बड़ी शोहरत थी मेरी कि मै एक नेक बंदा था !
न दोयम कभी बेंचा न लूटा किसी को !
न ही एक रत्ती कम कभी तौला किसी को !
शहर के लोग मुझसे खुशनुमा व्यवहार रखते थे!
मेरी तारीफ करके मुफ्त में प्रचार करते थे !

मेरे बेटे ने संभाली है गद्दी आजकल में !
बड़ा तब्दील अाया है मेरे खुद के चलन में !
अब मै झूठ को भी सच ही कह कर बेंचता हूँ!
जितना झींट सकता हूँ किसी से ;झींटता हूँ !
मेरी इज्जत को बेटे ने सरेआम फींच कर !
बैनर बना कर टांग दी है चौक पर !
इसकी उसकी इज्ज़तों में अब न कोई फर्क है!
साथ वाले बैनरों के एक जैसे हर्फ़ है!
जिनकी सोहबत में मसें भींगी, जवान हुए .
ऐसे दोस्त तो रोज़ी रोटी में परेशान हुए .
बेडा गर्क तो साथ की लड़कियों ने किया
जब उनको शौहर मिलें तो हम भाईजान हुए .
अपनी नाकामियों का इल्म तब पेश्तर हुआ
कुछ के गोद में बच्चे थे हम उनके मामूजान हुए !
दरवाजा खुलेगा एक - ब - एक ,तुम भीतर खींचे जाओगे !
उस लड़की के घर पर तुम पुरकस पीटे जाओगे !
जिन हांथों को गए मांगने अब्बा की जागीर समझ
उन हाथों की नेमत होंगी जूते चप्पल खाओगे !
अकड़ू बन कर घूम रहे हो जिस सरकारी नौकरी पर
बेवजह मुकदमा ले करके नौकरी अपनी छुड़वाओगे !
साथ जिएंगे साथ मरेंगे ये सब फिल्मी बातें है
लड़की ही ना कह देगी तुम चु ..(उल्लू )बन जाओगे !
चलो मिया अब जिद छोडो ये नौटंकी बहुत हो गयी
रिश्तेदार जान गए तो शादी भी न कर पाओगे !
जब मैं---
सबसे ज्यादा थका हुआ था !
असफलता के बड़े बोझ से
दबा हुआ था !
खैरियत तुमने
उसी समय पूछा था -
बड़े ही कुटिल अंदाज़ से !
मैं बिलबिला उठा ,मानों -
किसी ने जख्म कुरेद दिए हो,
हाथ से!
और मल रहा हो नोन उसपर
ठाट से !
चार पैसे हाथ में ला पाये तो तुम आज़ाद हो
कल के लिए दो रोटियां भी बचाये तो तुम आज़ाद हो
देह से पहले तुम्हारे स्वप्न बूढ़े हो गए
उनको मरने से बचा पाये तो तुम आज़ाद हो
रेत बनती जा रही है भाई चारे की जमीन
फूल कोई उसमे खिला पाये तो तुम आज़ाद हो
हर तरफ से लुट रही दौलते -हिन्दोस्तान
एक मुट्ठी तुम उड़ा लए तो तुम आज़ाद हो
हशिए से भी बहुत दूर बैठे हैं कई
हाशिये के भी करीब आये तो तुम आज़ाद हो
आत्महत्या के इरादों ने किया भरी सितम
ज़िंदा अगर खुद को बचा पाये तो तुम आज़ाद हो
चौराहे पर नंगी होकर
एक औरत रोज़ नहाती है !
पानी की पाइप केवल
चौराहे तक जाती है !
बेशर्म भीड़ की नज़रों में
न खून है, ना ही पानी है !
यह आज़ादी का नव
अर्थशास्त्र है ,समाजशास्त्र है !
दबे कुचले सिर्फ
दया के पात्र हैं !
यह भारत के ट्रांजीशन का
बर्निंग फैक्ट हैं !
यह सत्ता का जनता से
कॉन्सील्ड पैक्ट हैं !
यह नूतन समाजवाद हैं
ट्रिकल डाउन इफ़ेक्ट हैं !
शान बढे कुछ काम दिखाओ ऐसा
एक तिरंगा फहराने से क्या होता है !
बीत गए युग नव आशाओं वाले !
दूर क्षितिज पर घुमड़ रहें है बादल काले !
अन्न -प्रसवा धरती ही अब डायन बन गयी
निगल रही है खुद ही वह जीवन के दाने !

फूल खिले तुम बीज लगाओ ऐसा
टूटे फूलों को छितराने से क्या होता है !
शान बढे कुछ काम दिखाओ ऐसा
एक तिरंगा फहराने से क्या होता है !
कहाँ गयी वह ओज पुरानी वाली !
पत्थर पिघलाकर नीर बनानेवाली !
घोष गूंजता था जिसका कोने कोने में
कहाँ गयी वह मुखरित वाणी हमारी !
तन झूम उठे तुम गीत सुनाओ ऐसा
मुर्दा भाषण पढ़ जाने से क्या होता है !
शान बढे कुछ काम दिखाओ ऐसा
एक तिरंगा फहराने से क्या होता है !
सहारा छोड़ दो साहिल पे आओ सबने मुझसे ये कहा
कैसे बताऊँ मुझसे जुदा होकर सहारा डूब जायेगा
बहुत अच्छा है अगर किसी की लाज बचा ली जाये !
पर इसके लिए क्यों किसी की पगड़ी उछाली जाये !
मनहूस शहर में एक तू ही बचा था दोस्त मेरा
चल , अब तुझसे भी अदावत पाली जाये !
रउआ देखनी ह ;मुँहवा- साँच के ?
पुरनका ना ; टटका ,आज के ?
करिया बा ?
आ कइसन ओकर बाबडिया बा ?
लोग कहत रहल हा गोर बा
झुलुफियो मुड़िया पर थोर बा !
रउआ देखनी हा कपडा लत्ता ?
आ लोगवा देखल हा लंगटा !
लोग लाबजा बा की रउआ जी ?
रउआ साँच बोलतानी की बनौआ जी ?
अब एकर कवन परमान हा :कवन जाँच हा ?
जाये दी ! सभकर आपन आपन साँच हा !
 जमाना सिर्फ मेरी बुराईयों पर गौर करता है !
अच्छाई जो भी करता है कोई और करता है !
बहुत नाज़ुक हो गए आजकल रिश्तों के धागे
तुरंत ही टूट जाते है जब भी जोर पड़ता है !
बहुत गुलज़ार थी उनकी हवेली चार बच्चों से
अब सबकी हुयी शादी यहाँ पर कौन रहता है !
जब भी मिले यह शख्श जम कर पीटना इसको
पकाता है बहुत जब फेसबुक पर शेर कहता है !
तुमने कल जो बात कही थी ,अच्छी थी !
कुछ बातें तो उनमें बिलकुल सच्ची थी !
ऐब ज़माने भर के मुझमें है लेकिन
कल तुमने कुछ ज्यादा ही पी रक्खी थी !

मंगलवार, 29 जुलाई 2014

"काकू है ....हो….ओ..मत छुओ .....काटेगा"
कोई बाप अपनी बेटी को इसी तरह से डाँटेगा !
बेटी भी डरने वरने का थोड़ा फ़र्ज़  निभा देगी  !
जब अकेले में होगी;   उसको छुएगी जांचेगी !
पूरी तसल्ली हो जाने पर उसको हाथ में ले करके
बापू को ही डराएगी कूका….. कूका  कह  करके!
उस डरने वाली चीज से अब हमको डरना पड़ता है!

शायद बच्चो के संग सबको बच्चा होना पड़ता है!
ख़ुशी का गुस्सा
दो नन्हें हाथ---
साधिकार उठते है !
कि हमें गोंद में उठाओ!
दुलारो पुचकारो लोरी सुनाओ!
या कोई खेल खिलाओ!
यहाँ वहां घुमाओ !
अब घर में आग लग जाये
या आसमान सर पे टूटे !
जरूरी काम हो जितना अपनी बलाय से छूटे!
मना कर देना आफत है!
समूची जान कि सांसत है !
हाथ,पैर, नाक,मुंह,  माथा --
क्या पटका जायेगा
समझ में नहीं आता ?
इतना रोना कि घर में आग लग जाये!
इतना चिल्लाना कि आसमान फट जाये!
अब देखते है कि --
कितना जरूरी काम कर लोगे !
घंटे दो घंटे तो गोंद में ही थामोगे!
पहले कहा था प्रेम से माने नहीं तब!
दिखाया रंग असली तब
समझ  आया तुम्हें सब!

रविवार, 15 जून 2014

पत्नी के प्रति

पत्नी के प्रति

तुमको जब भी चुनने का संकट आये 
ध्यान रहे, मै मात्र विकल्प नहीं हूँ !
मै जो हूँ ,जैसा हूँ ,जितना भी हूँ ,
प्रथम नहीं अंत भी नहीं---
बहुत अधिक या अल्प नहीं हूँ !
सबसे ऊपर, सर्वोपरि या उससे भी ऊपर कुछ हो 
मै उसका स्वाभाविक दावेदार हूँ ; द्वंद्व नहीं हूँ !
तुझपर मेरे अधिकार क्षेत्र का निर्णयकर्ता 
मै ईश्वर से भी ज्यादा स्वछन्द कहीं हूँ !

तुम हो मेरे होने की बस एक वज़ह 
तेरे बस होने से ही कुछ हो भी पाता है !
जो करता हूँ जो धरता हूँ जो हाड़ तोड़ कर लड़ता हूँ 
सबका निमित्त सर्वस्व तुम्ही और श्रेय तुम्हे ही जाता है !
अंतर क्या तेरे मेरे में जब अंतर्मन है एकरूप 
जो भी कहता हूँ मै मुख से, तेरा मन ही उसे सुझाता है ! 
जीवन - धन- मन - तन हो तुम मेरे 
स्वीकार तुम्हारा ही मुझको जग में पहचान दिलाता है !

गाँव का खत

गाँव का खत 


मेरे गाँव ने फिर मुझको खत भेजा है , बुलाया है !
बाट जोहती राह थक गयी
पगडण्डी की कमर टूट गयी
पुलिया नाले को अब क्या जोड़े
उसकी अपनी पीठ दरक गयी

आओ पैरों से पीठ दबा दो ----
ऐसा खत में लिखवाया है !
मेरे गाँव ने फिर मुझको खत भेजा है , बुलाया है !

बँसवारी से कोयल कूके
फुलवारी में कुत्ते भूंके
घर की छत पर कौआ आकर
कब आओगे --ऐसा पूछे

अबके तो निश्चय ही आओगे
ऐसा सबने माना है !
मेरे गाँव ने फिर मुझको खत भेजा है , बुलाया है !

ईंख के रस का स्वाद बदल गया
घूरे का जलना अब कम गया
मिसरी आम का पेड़ पुराना
पिछले साल चुपचाप गुजर गया

परिवर्तन ही नियति है जग का
जड़ता तो मात्र छलावा है !
मेरे गाँव ने फिर मुझको खत भेजा है , बुलाया है !

खेल खेल के साथी सारे
सबने मिल कर गांव बिसारे
बूढ़े जिनसे हम लड़ते थे
एक एक कर स्वर्ग सिधारे

चला चली की बेला मिल लो
खत में ऐसा कहलाया है!
मेरे गाँव ने फिर मुझको खत भेजा है , बुलाया है !

आप भाड़ में जाएँ !

आप भाड़ में जाएँ !

-----इस कविता का किसी वास्तविक घटना या व्यक्ति से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है . सभी पात्र काल्पनिक है . और किसी का दिल दुखने का मेरा इरादा नहीं है. मैं खुद दुखी दिल से लिख रहा हूँ !

आप इस इतवार को मदर डे मनाएं
अगले इतवार को स्टेप मदर डे मनाएं
फिर किसी इतवार को ही फादर डे मनाएं
लॉजिकली अगले इतवार को स्टेप फादर डे मनाएं
उस दिन पैरंट्स को फोन कर आप लोरी सुनाएँ
दिखावे के लिए फेसबुक पर कमेंट टीप आएं
(हर्रा लगे न फिटकरी रंग चोखा आये )
आपके इसी चलन पर आपकी बीबी गौर फरमाये
साल में एक दिन हस्बैंड डे मनाये
उसके बाद एक्स हस्बैंड डे मनाये
फिर पहला दूसरा तीसरा चौथा
पांचवा छठा आदि बॉयफ्रेंड डे मनाये
(मज़ा आ जाये !)
तो जनाब मैं बिहारी ही अच्छा हूँ
आप भांड में जाएँ !
हमें तो आज भी फादर के नाम से डर लगता है
कलेजा उनका ना दुखे कही ये डर लगता है
बहुत रो रोकर तकलीफ से छिलवाई थी मूंछे
कि उनका मानना है - बेमोछ का आदमी टूअर लगता है

मेरी माँ और मेरे भाई और बहन छोटी
इनके लये कोई स्पेशल दिन नहीं होता
मेरे हर काम का आगाज़ उनके बिन नहीं होता
बहन के मैरिज के लिए पैसे
मैं भी बचाता हूँ भाई भी बचाता है
मैं भी वही खाता हूँ जो कि मेरा भाई खाता है
नहीं करता हूँ कोई काम जो सबको नापसंद आये
मैं बिहारी ही अच्छा हूँ जनाब
आप भांड में जाएँ !