बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

मंगलवार, 29 जुलाई 2014

ख़ुशी का गुस्सा
दो नन्हें हाथ---
साधिकार उठते है !
कि हमें गोंद में उठाओ!
दुलारो पुचकारो लोरी सुनाओ!
या कोई खेल खिलाओ!
यहाँ वहां घुमाओ !
अब घर में आग लग जाये
या आसमान सर पे टूटे !
जरूरी काम हो जितना अपनी बलाय से छूटे!
मना कर देना आफत है!
समूची जान कि सांसत है !
हाथ,पैर, नाक,मुंह,  माथा --
क्या पटका जायेगा
समझ में नहीं आता ?
इतना रोना कि घर में आग लग जाये!
इतना चिल्लाना कि आसमान फट जाये!
अब देखते है कि --
कितना जरूरी काम कर लोगे !
घंटे दो घंटे तो गोंद में ही थामोगे!
पहले कहा था प्रेम से माने नहीं तब!
दिखाया रंग असली तब
समझ  आया तुम्हें सब!

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