बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

शनिवार, 29 अगस्त 2015

आवs जम के लड़ल जाओ
ना आपसे में कपार फोरल जाओ
बम -गोला ,मारा-मारी
बेमतलब के गारा-गारी
भाई के खून के पियासल भाई
ई पुरनका लीख के पट्टीदारी

अब कुछु नवका कईल जाओ
एगो नया लड़ाई लड़ल जाओ
आवs जम के लड़ल जाओ

तू तनिका बढ़ जा हमसे आगे
कुछु बढ़िया करी जा आगे
तब हम तोहरा के पिठियाई
एही नले हमहूँ बढ़तीं आगे

हाराहुँसी में बढ़ल जाओ
ई नवका लीख धईल जाओ
आवs जम के लड़ल जाओ

तू भईलअ पाकिस्तानी
आ हम भईनी हिन्दुस्तानी
हमनी के झगड़ा मेंटी ना
झगड़ा अउरी गहिरा छानी

अब झगड़ा के रोख मोड़ल जाओ
नवका इतिहास रचल जाओ
आवs जम के लड़ल जाओ

झगड़ा अशिक्षा गरीबी से
जड़ता के जाल-फरेबी से
कहीं हम तोहरा के पिछुवायीं
कतहुँ तू बढ़ जा तेज़ी से

फेनु एक दोसरा पर हँसल जाओ
शेम-शेम कहल जाओ
आवs जम के लड़ल जाओ

केतना नीक लड़ाई होइ उ
मारकाट ना गारागारी होइ उ
पनकी-बढ़ी-फली-फूली बैर-भाव
तबो केतना बढ़िया फलदायी होइ उ

कुछु एहु तरे लड़ल जाओ
अउरी बढ़-चढ़ के लड़ल जाओ
आवs जम के लड़ल जाओ

सभकर निगाह बा हमनी पर
केहु आशा धईले बा हमनी पर
केहु आग लगा माज़ा लेता
केहु खूब ठठात बा हमनी पर

चल सभकर जवाब दिहल जाओ
नवका इतिहास रचल जाओ
अउरी जम के लड़ल जाओ
आवs जम के लड़ल जाओ
एक समय छत के ऊपर नेवाड़ के खटिया डसाये हुए
हम गहिरा अंघी में सुतल थे थाकल तनी अलसाये हुए
नगदे चीकन आसमान रहा चान - जोन्हि चमकाए हुए
तनी मधिमें-मद्धिम बेयार बहे गंध चमेली नहाये हुए
तले कहाँ दूनी से बुनी पर गया हम भागे अगुताये हुए
अंघी टूटल से आलगा सगरो बिछौना भींजाए हुए
कोठरी में पहुंचे जइसे ही सुतने का मूड बनाये हुए
तइसे बरखा खत्तम् भs गया हम एतना खिसियाए हुए
कि इनर देव बूझत होइहें केतना हम गरियाये हुए
फेनु मनबढुवी कईल जाव फेनु बदमाशी के काम
चल इयारवा फेनु चलल जाव हमरा महबूबा के गांव |

फेनु से हुरदंग होखे फेनु से कुछुओ धमाल
घर के पिछुवारे चहुँप के हम करीं उनका के चाल |

उ निकल के छत पर आवस झारत आपन भींजल बाल
हम तनी सिसुकी भरीं छाती प रख के आपन हाथ |

उ देखावस जीभ हमके जइसे हमसे ना पहिचान
हम करीं अइसन इशारा जे उनका बिन निकली परान|

एके छने रंग बरसी चारू और छायी बहार
जब झटक के बान्ह लीहें केश के जुड़ा सम्हार |

दिन थथम जाइ तबे चिहुंकी तनी पुरुवा बेयार
केकरा भलुक नीक लागि दू गो प्रेमीजन के प्यार |
एक महीना से मातवा अइसन जिद पकडले रहनी जे कुल्हि घर के लोग औतियाईल रहे | आ काल्ह त एकदमे गजब करि देहुवीं | एकदम्मे अन्न जल तियाग के | का जे उहाँ के चंडीगढ़ ले जाईल जाओ | लोग लाख समुझावाल जे पुरनिया देह ट्रेन के सफर ना सह पाई | बाकिर उहाँ के जवन जिद ना धयीनी जे लोग केतनो मना के हारल गईल , बाकिर दुपहरिया से साँझ लेक अन्न के एको दाना मुंह में ना डालनी | संजय अपना आजी के दुलरुआ ह्वुआन |उनका के भेजल गईल जे एको दाना त बुढ़ियो मुंह में डालस | बाकिर ई का जे बुढ़ियो मान जास |हार पाछ के संजय कहले –“मतवा ईया ! देखीं, ट्रेन के रिजर्वेशन चार महीना पहिले करावे के परता एही घरी | बिना रिजर्बेशन के के लेखां रउआ चंडीगढ़ जाएम ?’
“हम जेनेरलो में चढ़ि के चल जाईब हो ,केहु खाली हमार देहिया सम्हारे खातिर साथ में चलो ना |”
“जेनरल में हमनी के चढ़ल मुश्किल बा | राउर त पुरनिया देह भईल |”
“ऐ संजय ! हम जेनेरल में गईल नईखी काs जे हमरा के बुरबक बनावत बाड़s लोगिन ? एही जेनरल में हम काशी मथुरा लेक घूम आयिल बानी |ई कह लोगिन जे हमार जांगर नईखे चलत त तहरा लोगिन पर बोझा भईल बानी |नाही त हम पूछे जईति कि अपनहि चल जईति चंडीगढ़ !” तनी टिहुक के मातवा बोलनिं |
अब मतवा के केs समझाओ जे ओह घरी के जमाना अलग रहे |तब ट्रेन से आवे-जाए वाला लोग कम होखे |यह घरी त स्लीपर में लेक ठकठेल लागल रहेला |खैर ,लोग बुझ गईल जे मतवा बिना चंडीगढ़ गईले ना मनिहें, त सोचल गईल जे तत्काल में टिकस लिहल जाई |छोटका बाबा आँगन में आ के कहि गईनी –“मतवा भाभी ,टाटकाल्ह में टिकस कटा दिहल जाई |परसों संजय संघे चंडीगढ़ चल जयिहs |अब मान जा | कुछु अन्न जल ग्रहन कs लs | बाकिर तहरा गईला से होइ काs ? तहार भाई के त होश हवास लेक नईखे |”
“हम नु जानत बानी कि का होइ?”- इहे कहत मतवा खटिया पर से उतर के तनी भात खईनी –“खाली हमरा के जाए ना द लोगिन हमार बबुवा हरखित नु हो जाइ हो |”
मतवा गिने लगनी -दू दिन ट्रेन के सफर ; ओकरा बाद तिसरका दिने सावन के पुनवासी ........|राखी ....| पता ना एह साले काहें उनका अपना भाई के राखी बान्हे के मन करता | आजु लेक त कब्बो भाई के राखी ना बन्हले रहली | बाकिर आजु जब उ कोमा में बाड़े चंडीगढ़ के पी जी आई में, त पता ना काहें दूनी भाई के राखी बान्हे के मन करता | मने-मन बुझाता जे बड़का बाबू हमरा गईला पर हरखित हो जइहें | राखी बन्हवाईहें,उठ के बईठ जइहें |
उनका आपन लइकाई इयाद आवे लागल |मतवा रहनीं त अपना माई बाप के पहिलका संतान -बेटी ! बाकिर मतवा के जन्म भईला पर थरिया ना बाजल –‘इनका से काs कुल उजियार होइ ? आपन ध-बान्ह के दोसरा के घरे चल दीहें|’ फेनु पांच साल बाद अईले- “बड़का बाबू” -माई बाप के दुलरुआ ! अब मतवा के कुसमय शुरू भईल | बड़का बाबू खातिर दूध रहे, घीव रहे, फल रहे, मेवा रहे | ओईमें जवन बच जाऊ तवन मतवा के हिस्सा | कबो मतवा लइकाई में चोरा के कुछु खाइयो लेस त अइसन मार पड़े जे गतर गतर दुखाये लागो –‘ई म्लेछिनी लइकवा के मुंह के कौरा छिनत बिया | चोरी जइसन कु रहन सीखतिया |’ बाद में त मार कुटाई के बेरोक टोक अधिकार बड़का बाबू के मिल गईल | खेलत-में ,कूदत-में ,सुतल-जागल-खात- पियत हर समय बड़का बाबू के मारकूट के स्वाभाविक आश्रय स्थल मतवा के शरीर रहे | बड़का बाबू के अत्याचार के खिलाफ शिकायत के कवनो उपाय ना रहे | कबो-कबो जब प्रतिकार में मातवा बाबू के ठुनकाईयो दीं त बाबू भेम्हा फोर के डहकस|एकरा बाद माई बाप से मतवा के अउरी पिटाई होखे ,एही से अपना छोट भाई के सगरो जुलुम मतवा सहि लीं |
ए माहौल में का भाई खातिर नेह छोह जागी? मतवा के नईखे इयाद जे उहाँ के कबो बड़का बाबू के प्रेम से राखी बन्हले होखेम | कबो माई बाप के बरजोरी राखी बनहईलो होइ त बड़का बाबू ठेंगा देखा के भाग जयिंहे आ तनी देर में राखी नोचा चौथा जाइ|बड़का बाबू- बड़का बाबू रहले ....आ मतवा एगो बेटी -जेकरा दोसरा के घरे जाए के रहे |आ एक दिन सांचहूं में मतवा दोसरा घरे चल गईनी -बियाह क के | आ एहिजा से मतवा के दिन बदलल शुरू भईल | एतना समझदार आ गमखोर पतोह के नाम-जस जवार में फइल गईल | लोग आदर से उहाँ के मतवा जी (महाराज जी के मेहरारू )कहे लागल |मतवा के सोर से अब बड़हन हरिहर गाछ पनप गईल बा |नाती-पोता-बेटा-बहू सब मन जोगे बा लोग |
बाकिर नईहर के मोह कहाँ मेहरारू लोग से छुटेला ? भाई से मतवा के मुंहामुँही सम्बन्ध बनले रहे |बाकिर जब लोग बतावल जे बड़का बाबू के किडनी फेल हो गईल बा आ उ चंडीगढ़ में भर्ती बाड़े तहिया से मतवा बेचैन रहनीं ह | कोमा में गईला के खबर सुन के त मतवा अन्न जल छोड़ देहनी जे चंडीगढ़ आजुवे ले चल लोगिन | ई कहs जे घरवा में अभियो मतवा के लोग बात सुनेला| अब बुझाता जे राखी के दिने चंडीगढ़ ......|-- इहे सोचत मतवा करवट बदलत रात कटनिं आ बिहाने बिहान संजय टू ए सी के तत्काल टिकस ले के आ गईले |संजय के साथे मतवा के चंडीगढ़ जाए के रहे | मतवा के पतोह -पड़पतोह लोग नीमन से तईयार क देहल लोग |मतवा ट्रेन में बईठ के चंडीगढ़ चल देहनीं अपना भाई के राखी बान्हे | राखी एक दिन पहिलहीं जीन बाबा के चढ़ा आयिल रहनीं - “जीन बाबा हमरा भाई के हरखित कs दीं |हम रोट परसाद चढ़ायेम |”
आ मद्ध (ठीक) राखिये के दिने मतवा चंडीगढ़ के पी जी आई में पहुंच गईनी -आपना बड़का बाबू के सामने | बड़का बाबू इंटेंसिव केयर यूनिट में एगो बेड पर एक महीना से पटाईल रहले -अचेत | उनकर कीटोन लेवल बढ़ गईल रहे | दुन्नु किडनी फेल हो गईल रहे | दिमाग में खून के थक्का जम गईल रहे |डाक्टर कहि देहले रहे कि बाँचल मोसकिल बा | मातवा के एतना कुल्हि बात से काs मतलब रहे ? उहाँ के त राखी बान्हे के रहे | स्टाफ केतनो रोकत रही गईले सन-“नो फॉरेन ऑब्जेक्ट प्लीज” ,बाकिर अपना हाथ में राखी के धागा लिहले मतवा भाई के बेड तक पहुंच गईनी |
“बड़का बाबू हो !दाहिना हाथ दs | राखी बान्हे के बा |”
आ जले लेक नर्स पहुँच के राखी के मरीज के हाथ से निकालs सन , बड़का बाबू अपना दोसरा हाथ से छन भर में राखी नोच देहले | ई उनकर पुरान आदत हs -ई मतवा जानत रहली |जब जब मतवा राखी बान्हेली ; बड़का बाबू नोच देले | बाकिर हॉस्पिटल वाला लोग खातिर त ई अचम्भा रहे |बड़का बाबू कोमा से बाहर आ गईल रहले |अचम्भे में हॉस्पिटल वाला लोग मतवा के बड़का बाबू के पंजरा से ना हटावल |मतवा बड़का बाबू के केश सझुरावत रहनी -“बड़का बाबू ! अबकी भईया दूज में हमरा घरे जरूर अईहs |जिन बाबा के रोट प्रसाद साथहीं चढवल जाइ |”
बड़का बाबू के सहमति में पलक झपकावल केs देखल ?केs देखल बड़का बाबू के आँख से लोर बहत? केs कहता जे भाई बहिन के नेह-छोह महतारिये के घर लेक होला ? केs कहता जे खाली बहिनिये के रक्षा खातिर राखी बान्हल जाला ? केs कहता जे भाई बहिन के रिश्ता खाली राखिये के दिन तक रहेला ? एही साल बड़का बाबू भईया दूज के दिने मतवा के घरे जरूर जइहें |

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

ईश्वर बूढ़ा हो गया है ;
बहुत बूढ़ा |
शिथिल हो गए हैं -
उसके अंग प्रत्यंग |
अब वह सफेद स्याह में
अंतर नहीं कर पाता |
बल्कि जो भी करना चाहता है
ठीक से कर नहीं पाता |
कांपते हाथ- थरथराती देह और मद्धिम बुद्धि ने
सब गड़बड़ कर रक्खा है |
धूप में बारिश ;बारिश में धूप
कभी लम्बा सूखा ; कभी पानी खूब |
जाड़े का गर्मी में घालमेल
पुरवा पछुवा सब बेमेल |
फिर जिद्दी लड़के की तरह -
गुस्से में थम-थम-धम-धम
पटकता है पाँव
हिला देता है धरती और आसमान |
फिर पता नहीं क्या बोलता है -
झाँय-झाँय सांय-सांय
जो केवल उसके चमचे ही सुनते है; समझते है |
और वे भी अपनी मन की ही करते हैं -
मार-धाड़-नरसंहार;हत्या-आगजनी-बलात्कार
हाथापाई-झगड़ा-वादविवाद
मतलब वही झाँय-झाँय-सांय-सांय |
कोई किसी की नहीं सुनता |
और न ही ईश्वर ही सुनता है -
पूजन-अभ्यर्थन-चीख-पुकार
उसे मोतियाबिंद हो गया है |
उसे नहीं दीखता जरा भी -
अव्यवस्था-अराजकता-संताप |
बुढऊ ने पकड़ लिया है खाट |
पर छोड़ेगा नहीं अपना राज पाट |
इतनी जल्दी मरेगा भी नहीं बुढऊ
भले ही वह बूढ़ा हो गया है |
बहुत बूढ़ा !
झूठ फरल बा एतना कि झूठ बेंच के तेल कीनाता !
तेल मालिश करेवाला के लाज शरम तनिको ना बुझाता !
लाज धरे दोसरा के ; अपना पिछुवारी में फेड़ रोपता !
नाच-नाच पिछुवारी देखलावे, से इहे फेड़ से झूठ तुराता !
झूठ तुराता एतना कि अगल बगल में खूब बंटाता !
झूठ बंटाता दुनिया में गोतनी के हिस्से लेंढा जाता !
लेंढा के पेंड़ा जोहत गोतनी के उलटी हो जाता !
उलटी से लोगवा बुझात बा पूत-जनम हाले नियराता !
शर्त लगी आदमखोरों में
किससे कौन अधिक जन खाय !
मंज़र-मंज़र मातम फैला
कहीं हुआँ -हुआँ; कहीं हाय- हाय !
बैताल बिराजे राजभवन में ,
सबकी एकमत हुई राय !
खून बहे नदियों में अविरल
धरती का जी तिरपित हो जाय !
गली गली सन्नाटा फैले ;
विकराल पवन बहे सायं-सायं !
बड़ी उमस है घर के बाहर
कौन मचाये हाय - हाय !
जबतक गर्दन रहे सलामत ,
तबतक हलवा पूरी खाय !
भले आग लगे छप्पर में ,
घर में घुसे गए रामसुभाय !
माथे सेनुर लाल ;
साड़ी लाल ;
साड़ी के किनारी-
जरीवाली ;
नाक में के ठोप -
चानी के ;
कान में -सोना के बाली
हाथ में –मेंहदी- टटका ,
नेलपालिश ;
गोड़ में- महावर ,
पायल घुंघरूवाली;
देह चिक्कन-
टटके में आबटन लगावल ;
मन चिरईया-
हुलसत आकाशे ;
जे काल्ह राति खान -
उनकर सोहागऱात रहे !
मिलन के रात रहे !
आज-भोरे-भोर-
रमुआ के मेहर -
धान के रोपनी बदे-
खेत में आईल बाड़ी |
लोग बा निरखत,
तनी लजाईल बाड़ी |
मजूर के मेहर -
ना लजाईला से
कवनो काम चली |
रानी -पतुरिया ना हई
जे घर में रहींहै |
काम करिहैं |
धान रोपीहैं |
तनिका निहुरि के
धान के कोठी रोपत
गीत गईंहै |
ननदी जब बोली टीबोली
तब लजईहें |
देख लीहें कनखी से
रमुआ के मुस्की |
तब अपनहिं करीहें ठिठोली |
बीग दीहें जान के -
एगो बोझि धान ,रमुआ के ओरि |
अकबका के -
लपक ना पायी रमुआ |
आहि रे बबुवा !
मेहर बिया चोख
ई भोथर रमुआ !
मने मन हो जायी
निहाल रमुआ |
उलीच दिही
अंजुरी भर पानी उठाके |
“धत्त”-
कही मेहर लजाके-
“लोग देखत बा लुकाके” |
“देखे द”-
रमुवा सुनाई
“आज सुहागदिन हउवे” |
काल्ह सुहागरात रहे;
मिलन के रात रहे !
जो कुछ बातें सच्ची हैं; वे सारी बातें झूठी हैं
देश भले आजाद हो गया सारी जनता भूखी है|
भूखी जनता नंगी होकर भीषण लूट मचाये है
जिसके हिस्से जो भी आया लूट खसोट के खाए है|
हवा को खाया कुछ लोगों ने ,अब पानी की बारी है
मिट्टी कौन ग्रसेगा इसकी मारामारी जारी है|
कुछ लोगों ने औरत खाया ; बच्चे खाए औरों ने
सरहद पर के फौजी को खाया नरभक्षी सिरमौरों ने|
बड़े घाघ निकले जिन्होंने हड्डी खाया -खून पचाया
जिसके हिस्से इज्जत आई उसको भी धोधोकर खाया |
कुछ ऐसे भी थे जो अपना ही हाड-मांस खा गए
जिनके हिस्से कुछ ना आया वे गोली सल्फास खा गए
***********शान बढे, कुछ काम दिखाओ ऐसा
***********एक तिरंगा फहराने से क्या होता है ?
बीत गए युग नव आशाओं वाले
दूर क्षितिज पर घुमड़ रहें है बादल काले
अन्न -प्रसवा धरती ही अब डायन बन गयी
निगल रही है खुद ही वह जीवन के दाने !
**********फूल खिले ,तुम बीज लगाओ ऐसा
***********टूटे फूलों को छितराने से क्या होता है !
***********शान बढे ,कुछ काम दिखाओ ऐसा
***********एक तिरंगा फहराने से क्या होता है ?

कहाँ गयी वह ओज पुरानी वाली
पत्थर पिघलाकर नीर बनानेवाली
घोष गूंजता था जिसका कोने कोने में
कहाँ गयी वह मुखरित वाणी हमारी !
***********तन झूम उठे ,तुम गीत सुनाओ ऐसा
***********मुर्दा भाषण पढ़ जाने से क्या होता है ?
***********शान बढे ,कुछ काम दिखाओ ऐसा
***********एक तिरंगा फहराने से क्या होता है ?
पत्थर के हुए श्रमिक रोज ही कारखानो में घिसकर,
सांस टंगी है मज़दूरों की अट्टालिका पर चढ़कर,
शीश विहीन पड़े हैं रक्षक घर-भीतर या बाहर
अन्न प्रदाता जान गंवाते कर्ज- जाल में फंसकर |
***********सब सधे स्वयं ही; जुगत लगाओ ऐसा ,
***********विधवा विलाप बस कर जाने से क्या होता है ?
***********शान बढे, कुछ काम दिखाओ ऐसा
***********एक तिरंगा फहराने से क्या होता है ?
एक तृण भी खुद से नहीं हिलाया तुमने ,
कोरे-सिद्धांत -पोंगा -पुराण ही रोया -गाया तुमने ,
अस्थि-मज्जा-लोहू की जब दरकार हुई धरती को
खुद हुए ओट में ,औरों की गर्दन कटवाई तुमने |
***********उऋण होओ ,धरती का तुम कर्ज चुकाओ ऐसा
***********नाखून कटाकर वीर कहाने से क्या होता है ?
*********शान बढे कुछ काम दिखाओ ऐसा
*********एक तिरंगा फहराने से क्या होता है ?