बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

ईश्वर बूढ़ा हो गया है ;
बहुत बूढ़ा |
शिथिल हो गए हैं -
उसके अंग प्रत्यंग |
अब वह सफेद स्याह में
अंतर नहीं कर पाता |
बल्कि जो भी करना चाहता है
ठीक से कर नहीं पाता |
कांपते हाथ- थरथराती देह और मद्धिम बुद्धि ने
सब गड़बड़ कर रक्खा है |
धूप में बारिश ;बारिश में धूप
कभी लम्बा सूखा ; कभी पानी खूब |
जाड़े का गर्मी में घालमेल
पुरवा पछुवा सब बेमेल |
फिर जिद्दी लड़के की तरह -
गुस्से में थम-थम-धम-धम
पटकता है पाँव
हिला देता है धरती और आसमान |
फिर पता नहीं क्या बोलता है -
झाँय-झाँय सांय-सांय
जो केवल उसके चमचे ही सुनते है; समझते है |
और वे भी अपनी मन की ही करते हैं -
मार-धाड़-नरसंहार;हत्या-आगजनी-बलात्कार
हाथापाई-झगड़ा-वादविवाद
मतलब वही झाँय-झाँय-सांय-सांय |
कोई किसी की नहीं सुनता |
और न ही ईश्वर ही सुनता है -
पूजन-अभ्यर्थन-चीख-पुकार
उसे मोतियाबिंद हो गया है |
उसे नहीं दीखता जरा भी -
अव्यवस्था-अराजकता-संताप |
बुढऊ ने पकड़ लिया है खाट |
पर छोड़ेगा नहीं अपना राज पाट |
इतनी जल्दी मरेगा भी नहीं बुढऊ
भले ही वह बूढ़ा हो गया है |
बहुत बूढ़ा !

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