बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

***********शान बढे, कुछ काम दिखाओ ऐसा
***********एक तिरंगा फहराने से क्या होता है ?
बीत गए युग नव आशाओं वाले
दूर क्षितिज पर घुमड़ रहें है बादल काले
अन्न -प्रसवा धरती ही अब डायन बन गयी
निगल रही है खुद ही वह जीवन के दाने !
**********फूल खिले ,तुम बीज लगाओ ऐसा
***********टूटे फूलों को छितराने से क्या होता है !
***********शान बढे ,कुछ काम दिखाओ ऐसा
***********एक तिरंगा फहराने से क्या होता है ?

कहाँ गयी वह ओज पुरानी वाली
पत्थर पिघलाकर नीर बनानेवाली
घोष गूंजता था जिसका कोने कोने में
कहाँ गयी वह मुखरित वाणी हमारी !
***********तन झूम उठे ,तुम गीत सुनाओ ऐसा
***********मुर्दा भाषण पढ़ जाने से क्या होता है ?
***********शान बढे ,कुछ काम दिखाओ ऐसा
***********एक तिरंगा फहराने से क्या होता है ?
पत्थर के हुए श्रमिक रोज ही कारखानो में घिसकर,
सांस टंगी है मज़दूरों की अट्टालिका पर चढ़कर,
शीश विहीन पड़े हैं रक्षक घर-भीतर या बाहर
अन्न प्रदाता जान गंवाते कर्ज- जाल में फंसकर |
***********सब सधे स्वयं ही; जुगत लगाओ ऐसा ,
***********विधवा विलाप बस कर जाने से क्या होता है ?
***********शान बढे, कुछ काम दिखाओ ऐसा
***********एक तिरंगा फहराने से क्या होता है ?
एक तृण भी खुद से नहीं हिलाया तुमने ,
कोरे-सिद्धांत -पोंगा -पुराण ही रोया -गाया तुमने ,
अस्थि-मज्जा-लोहू की जब दरकार हुई धरती को
खुद हुए ओट में ,औरों की गर्दन कटवाई तुमने |
***********उऋण होओ ,धरती का तुम कर्ज चुकाओ ऐसा
***********नाखून कटाकर वीर कहाने से क्या होता है ?
*********शान बढे कुछ काम दिखाओ ऐसा
*********एक तिरंगा फहराने से क्या होता है ?

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