बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

शनिवार, 29 अगस्त 2015

एक समय छत के ऊपर नेवाड़ के खटिया डसाये हुए
हम गहिरा अंघी में सुतल थे थाकल तनी अलसाये हुए
नगदे चीकन आसमान रहा चान - जोन्हि चमकाए हुए
तनी मधिमें-मद्धिम बेयार बहे गंध चमेली नहाये हुए
तले कहाँ दूनी से बुनी पर गया हम भागे अगुताये हुए
अंघी टूटल से आलगा सगरो बिछौना भींजाए हुए
कोठरी में पहुंचे जइसे ही सुतने का मूड बनाये हुए
तइसे बरखा खत्तम् भs गया हम एतना खिसियाए हुए
कि इनर देव बूझत होइहें केतना हम गरियाये हुए

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