बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

सोमवार, 22 अगस्त 2016

रात्रिमध्य में मुक्ति दिवस का हैतुक
विधि की लीला , किंचित प्रपंच , या कौतुक ?
या दिनमान-प्रखर से छुप जाने की आशा ?
कुछ श्वेत-श्याम गोपन रखने की अभिलाषा ?
या शयन-मग्न जगत से आँख बचाकर,
अपना ही अनहित कर लेना घबड़ाकर ?
या तज देना पुरखो की शाश्वत रीति-
अरुणोदय पर चैतन्य होने की नीति ?
या सुरा सुंदरी को आलिंगन करके
सोते ही रहना तीक्ष्ण घाम से डरके ?
इनमे किस कारक को सच्चा जाने ?
सुनी हुयी बातें ही हम भी बखाने ?
कुछ विलम्ब के बाद दिवस जब उगता
क्या अपनी जय हेतु शुभ मुहूर्त नहीं रुकता ?

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

तथ्य सारे
हो गए हैं दोगले |
परिभाषाएँ समूची
अपवादकारी हो गयी हैं |
नियम सभी
विपथन ग्रसित हैं |
अबोध हैं विवेक -
निष्क्रिय पड़ा-सा |
ज्ञानचक्षु चुंधिया गए हैं;
दिग्भ्रमित |
शेष केवल चेतना हैं
जिसके सहारे जी रहा हूँ !
झुक जाने से
अधिक सरल है
गिर जाना / टूट जाना
नन्ही घास ने
तब जाना
जब समूल उंखाड़ी गयी
आपादमस्तक
झुक जाने के बाद
पास खड़ा था
पेड़ ताड़ का
आधा टूट जाने के बाद
अइसन हँसी हँसs तू बाबू
झर के जवन ग़ज़ल बन जाय |

अइसन गीत कढ़ावs जवन
सारंगी के स्वर बन जाय |

अइसन बात कहs तू लय से
जइसन कोइलर गीत सुनाय |

अइसन चुप्पी साधs जे
बहत बेयार थथमिए जाय |

जबले जियs, जियs तू अइसन
ढेला-माटी धड़कन बन जाय |

जदि मरs , मरs तू अइसन
जइसन दरिया लहर समाय |

रविवार, 15 मई 2016

अब तोहरा के ना बईठाईब बुलेट पर बरजोरी
गोरीअब चलबू चलs अपना मन से .........

तहरा से भईल जब प्यार
  हँसे लागल गांव -जवार
कहाँ -कहाँ ना हमरा मिलल
बिना बात के मार .....

कबो हाथ टूटल कबो टंगरी.......केहू केश धइल केहू नटई
ना जाने कई बेर फुटल बा ........भुभुन कपार ...

गोरी ! प्रीत करबू कर अपना मन से .......
अब तोहरा के ना पीठीआईब  कतहूँ चोरी चोरी   
गोरी ! प्रीत करबू करs अपना मन से .......



तोहके गिफ्ट महंग हम देहनी
दुनिया भर से कर्जा लेहनी
कबो पेट जोगवनी आपन
कबो अपने घर चोरी कईनी
गाँव नगर के सोझा ......तोहरा बदे  फजीहत सहनी
थेंथर बन के पूरा कईनी .............तोहर सजी डिमांड ....

गोरी गिफ्ट धरबू धर अपना मन से.....
अब ना फेनु गिफ्ट खरिदेम करि के हम बकलोली
गोरी ! गिफ्ट धरबू धरs अपना मन से.....
 

प्रीत ना आईस पाईस
ना ताकत के आजमाइश
प्रीत ना झूठ देखावा
ना दोगला के पैदाइश
एक ठाँट पर हं भा ना के ......खुल के बोल च्वाइस
आव अबे दिल में ना ........जा दक्खिन  दरबार

गोरी ! उफर परबू परs अपना मन से ....
भौजाई ना आज के बाद से हमार संघतिया बोली
गोरी ! उफर परबू परs अपना मन से ....
पार्टी को गाली मत दो
नेताजी को कुछ मत बोलो
बाहर का अखबार पढ़ो
घर की खबरें मत खोलो
कितनी शान्ति हैं न ?..
सुशासन की शांति ....
शराब बंद है ;खुश हैं -
कमला , विमला और कांती ...
कांती का खसम
सूरत में था ,मर गया
कारखाने की आग में जल गया
अपने गांव की मिटटी भी
नसीब नहीं हुई उसको
और विमला की बेटी
सरकारी सायकिल से
जाती है कालिज को
"नॉलिज को" प्रोफेसर भी
नहीं हैं ढंग के
और रस्ते में छेड़ते हैं
लुच्चे लफंगे
दरोगा भी सुनता नहीं नालिश को
और चालीस पार की कमला का
पहले रेप हुआ ,
फिर पंचायत हुई और खसम मरा
बाद में खबर छपी तब केस हुआ
पर कातिल का दो दिन में ही बेल हुआ
उसके बाद लड़के का भी मर्डर हुआ
पर कोर्ट से कातिल को
बाइज्जत बरी करने का आर्डर हुआ
गुनहगार पिस्तौल थी
उसे फांसी दी गयी , चौराहे पर
उसके पुतले फूंके गए
राज के इशारे पर
यह विक्रमशिला के राजा का न्याय था
जिसके पीठ पर अगिया बैताल बैठा है
और सुशासन को युवराज का इन्तजार है
यह ओपन सीक्रेट है खुलेआम मत बोलो
पार्टी को गाली मत दो
नेताजी को कुछ मत बोलो .....

रविवार, 8 मई 2016

जवनी गंगा में
गूह -मूत कुल्हि बोरल  बा |
जवनी गंगा में
दुनिया भर के
कचरो- डभरो   घोरल बा |
जवनी गंगा में
कल -कारखाना के
कानो- पाँकी  - गाद- रसायन
जानबूझ के छोड़ल बा  |
जवनी गंगा के
छानल   साफ़ पानी
भी आई पी खातिर अगोरल बा |
जवनी गंगा के
सरत-महकत पानी
जनता के माथे थोपल बा  |
तवनी गंगा  में .... |
“सावधान !
गंगा ना ; गंगा माई कहs  |
हं भाई !
तवनी गंगा माई में
पहिले गोड़ डुबाईं  कि माथा
सोचे लागले काका ;
गंगा नहान के बेरा |
हं; काका साफे बुरबक हवुअन |

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

जा तारs परदेश पिया त
देश हीक भर देख के जा |
काs जाने जब अइबs तबलेक
देश रही कि ना ?


****जइसन दुनिया लउकेले उ ओइसन ना ह
****ई दर-देवाल-आंगन–घर मुर्दा पत्थर ना ह
***** जब संगिरहा करेवाला ना बाचि केहू
दर -देवाल - आँगन -घर
तब मजबूत रही कि ना ?

काs जाने जब अइबs तबलेक
देश रही कि ना ?



****रूप-जवानी के संगम बस थोरे दिन के होला
****भंवरा आ कली के मिलना बस बसंत में होला
*****भले भंवरा बसंत गईल पर निकट कली के जाओ
मुरझाईल कली के सुंदर
रूप रही कि ना ?

काs जाने जब अइबs तबलेक
देश रही कि ना ?



****रूप रंग रस गंध के सेवन बूढ देह बदे ना ह
****थाकल तन पाकल मन के जिनगी के भरोसा का ह
*****ई हरमेशा के छुदुर जीवन रही सदा लुलुवाईल
बाकिर भोग करें खातिर
संजोग बची कि ना

का जाने जब अइबs तबलेक
देश रही कि ना ?



जा तारs परदेश पिया त
देश हीक भर देख के जा |
काs जाने जब अइबs तबलेक
देश रही कि ना ?



मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

कुछ गीली यादें शेष बची हैं
छुट्टियां चुक जाने के बाद
घर की चौखट बुला रही है
बाहर आ जाने के बाद

****उन हिलते परदों के भीतर
**** छुपी हुयी कजरारी आँखें
**** वहीँ कहीं कोने में दुबकी
**** बिटिया की नन्ही-नन्ही बाहें

बाहर बैठक में ठिठका मन
बूढ़े बाबा के बिलकुल पास
घर की चौखट बुला रही है
बाहर आ जाने के बाद

****एक छौंक के खुश्बू से तर
**** सांसों से ललचाती जीभ
****बूढी स्नेहिल हाथें जो
**** भोजन संग परसती सीख

पकी हुई मूंछों पर थिरती
अपनापन भरी मधुर मुस्कान
घर की चौखट बुला रही है
बाहर आ जाने के बाद

****इन सबसे ज्यादा याद आते
****घर की चिंता में अपना अंश
**** अम्मा की पिराती आँखें
**** बापू के घुटने का दर्द

बीबी की वंचित फरमाइशें
बेटी के अधूरे अरमान
घर की चौखट बुला रही है
बाहर आ जाने के बाद

**** यह भूख पेट की बड़ी क्रूर है
**** छुड़वा देती है अपना देश
****तोड़ के सारे रिश्तें नाते
**** घूम हूँ रहा हूँ देश विदेश

मन, लेकिन , अभी वहीँ अटका है
अपने घर- अपनी मिटटी अपने गांव
घर की चौखट बुला रही है
बाहर आ जाने के बाद

सोमवार, 25 जनवरी 2016

बबुआ के बाप-दादा कोदो खात रहले 
बबुआ के मिलल दाल-भात भारत देश में |
बबुआ के बाप जानस पढ़े-लिखे कुछु नाहीं
बबुआ के मिलल शिक्षा-अधिकार भारत देश में |
बैलगाड़ी ,छकड़ा हाथी-घोडा बाप जनले
बबुआ जानेले    मंगलयान     भारत  देश में  |
बाटे दिक्दारी बहुत देश में बीमारी बहुत
धीरे-धीरे होते बा सजी के इलाज भारत  देश में |
काहें करीं हाय-हाय ; काहें रोयीं भायँ - भायँ
अपना कमीनी के करीं जयगान भारत देश में
धरीं, तनी धीरा धरीं , आपन काम नीके करीं
आपनहूँ दिहिं जोगदान भारत देश में |
देश के प्रशासन ,संविधान विधान के
दिल के भीतर से करीं समान भारत  देश में |
आईं, रउओ साथे आईं , एके सुर में गीत गाईं

देश महान जनता महान भारत देश में |

शनिवार, 23 जनवरी 2016

सावधान !
बामुलाहिजा होशियार !
बीच समर में
रुदालियों के दल बुलाये गए हैं |
दायें- बाएं -आगे -पीछे -
यहां तक कि हरावल दस्तों के बीच
छुपाये गए हैं |
वे जंग नहीं लड़ते
केवल मर्सिया पढ़ते हैं |
रोने को मिले ;कोई मरे तो-
यही कामना करते है |
योद्धाओं !
जंग जरूरी है
पर इससे ज्यादा जरूरी है-
इन रुदालियों को पहचानना |
ये पिछले जंग की विधवाएं हैं,
जिन्होंने जौहर नहीं किया था |
ये कल भी रोई थी ;
आज भी कलपती हैं |
रोज नए-नए शहीद हड़पती हैं |
शहीदों !
जंग जरूरी हैं -
पर इससे ज्यादा जरूरी हैं
जंग के लिए मरना ;
रुदालियों के लिए नहीं |
ये अपने बच्चे खाती हैं |
साधो गज़ब तमाशा देखा
गदह-पूंछ पकड़े है धोबी पीछे-पीछे जाए
दुलत्ती खाए कितना भी पर पूंछ नहीं बिलगाये
यह मंद बुद्धि का लेखा
साधो गज़ब तमाशा देखा


चाम जीभ की बजै निरंतर जब-जब निकसे बोली
मरे चाम का ढोल बना कर पुरकस पिटे ढोली
झूठा -सच - अशुद्ध -मटमैला
साधो गज़ब तमाशा देखा


सबके सर में भुस भरे है सुलग रहे है भीतर
अपनी कुंठा जग को दे गए लेक्चर दिए फटीचर
बातें बड़े गुड़ का भेला
साधो गज़ब तमाशा देखा


क्या कहिये, क्या सुनन-जोग है ,किसकी बात बिचारें
सब के सब हैं मतिभ्रमित, ये अंधे भक्त बेचारे
सबको बूझो यहां गपेड़ा
साधो गज़ब तमाशा देखा
एक दिन के बात हवे की हम गईनी ससुरारी
पहिला पहिला बेर रहे जब से भईल रहे शादी
ससुरारी गईला से पहिले करिया केश रंगवनी
दुइ हज़ार के जूता कीननी दस के कोट सियवनी
असली में ई बात झूठ बा रउवा बुझीं सहीं
पैंतीस किलो चिउरा कीननी दस तौला के दही
सारिन खातिर जींस खरीदनी सरहज खातिर साड़ी
एक दिन के बात हवे की हम गईनी ससुरारी
तीन कोस जाए खातिर काका के सायकिल लेहनीं
पावडिल दाब के सीट चहड़ के इलू इलू गाना गवनीं
बहरिये ससुर भेंटाइल रहले राम-राम हम कहनी
उनका पुछला पर हम घर के खबर-दबर सब कहनीं
जाके खटिया पर बइठनी मिसरी से पियनीं पानी
एक दिन के बात हवे की हम गईनी ससुरारी
सारिन सारवा सब आइलैं सं अवुरी अईली सरहज
हमरा के अइसन घेरले सं बुझीं जइसे अलवंज
उ सभन के हंसी ठिठोली हमरा मने ना भावे
छव बजे मुक्ति मिलल जब भईंस लागल रम्भावें
सारवा सब छोट रहले सं ससुरा रहे लापाता
भईंस हमरे दूहे के परल टूटल दामाद ससुर के नाता
खोल के मोजा –जूता- कोट के भितरे देहनी गारी
एक दिन के बात हवे की हम गईनी ससुरारी
कान पकड़ के उठक बईठक तब हम उहँवे कईनी
ओकरा बाद से ना कबो हम ससुरारी के गईनी
चाह-
तिलकुट के रहे :
धोंधा मिलल |
सुख- दुख मिलल
खिचड़ी के
चाउर दाल जइसन | घीव जइसन, अनासहूँ कबो - उपरे से मिलल, उनकर अनुग्रह | धरम- दही ; पापड़ -वैभव ; अंचार के मत्सर्ग से पहिचान तनिका बढ़ गईल बा | जिंदगी अब - संकरात हो गईल बा |