बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

रविवार, 26 अप्रैल 2015

बरखा रानी
बरखा करिहैं |
खड़ा फसल के
खेत उपटिहैं |
उफर परिेहैं ;
असगुन उचरिहैं|
ना चरिहैं त
मरुस्थल में |
ना पर्वत के
आँगन में |
ना सूखल झरही
के जल में |
ना आग जरत
दहकत वन में |
ना भर हीक
पियासल के मन में |
अपने मन में
ई अगरइहैं |
कबो अइहैं ;
कबो ना अईंहैं |
अपने कुल-भतार के खईहैं |
रांड होइ
पायल झमकइहें |
अपने नांव
कुलबोरनी धरइहैं |
तब बरखा रानी
काहें कहइन्हें |
बरखा रानी !

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

आँचरा से अंग-अंग आपन तोप ढांक के
मुड़ी निहुरा के, लमहर घूंघटा निकारि के
नवही कनियवा जब नापे ले डगरिया
नगरिया सगरो अचके में जाग गईल बा |

अलसात-पगुरात पाड़ी-पाड़ा बोले लागल
दायें-बाएं-आगे-पीछे खौरा कुकुर घूमें लागल
चुप भईल तनी देर कुहुकत कोयलिया
रुनक-झुनुक बाजे उनकर कंगन पायलिया
नगरिया सगरो अचके में जाग गईल बा |

खेलत-कूदत लईका मुंह बा के देखे लगले
घास गरहत बुढऊ हीक भर निरेखे लगले
मेहर सब झांके लगली खोली के केवड़िया
नवही कनियवा जब हेले ले दुअरिया
नगरिया सगरो अचके में जाग गईल बा |

खेतवा में सुतल सरसों नज़र परते नाचे लागल
जेने-जेने जाए दुल्हिन ओने-ओने ताके लागल
ढांक लेहलस घाम के नेहगर बदरिया
सांय-सांय पूछे पुरुवा तू केकर दुलहिनिया ?
नगरिया सगरो अचके में जाग गईल बा |
उबल रहा था दर्द
ह्रृदय में धीमे - धीमें |
संपीड़ित कर दिया गया था
कई महीने |
आँखें नम होती थी जब
तनिक भाप रिसती थी |
खदबद -खदबद की आवाजें
निकली बनकर सिसकी थी |
कुछ अंदर ही अंदर
राख हुआ जाता था |
जो कुछ रसमय था
ख़ाक हुआ जाता था |
फिर दर्द को भी तब
कहाँ शेष बचना है ?
बर्तन ढक्कन सब
तहस नहस होना है |
दर्द उबलकर जभी
भाप बन जाए |
तभी कहीं वह
खुलकर बाहर आये |
 अलस्सुबह जब तुम नहाकर केश को फटकारती हो
बून्द मेरे तन - बदन को झकझोर कर यह पूछतें हैं
आज भी बरसात है क्या ? आज भी बरसात है क्या?
और तुम परदे हटाकर गीत कोई टेरती हो
कूकती कोयल अचानक आके मुझसे पूछती है
आज भी मधुमास है क्या ? आज भी मधुमास है क्या ?
फूल की खुशबू हवाओं में बिखर कर घूमती है
बोल पूजा के तुम्हारे , आके मुझसे पूछतें है
आज उत्सव खास है क्या ? आज उत्सव खास है क्या ?
दूर रहने पर भी तुम्हारे स्पर्श की अनुभूति होना
और पुलकित मन का मेरे से उलट कर पूछना यह
आज तुम उदास हो क्या ? आज तुम उदास हो क्या ?
पत्नी के प्रति
अभी कुछ ही दिन हुए
हमारी शादी को ,
जब एक ही गाँठ से
बंधे थे हम दोनों |
मैं बारात लेकर गया था
तुम्हारे घर |
और लगभग
अपहरण करता हुआ
लाया था तुम्हे
अपने घर |
फिर खोल दी गयी गांठे
कि मैं निस्सीम आकाश में
उड़ सकूँ ; कर सकूँ
जो भी करना है मुझे |
पर शायद ठीक से
गिरह खुली नहीं थी ,
क्योंकि आज भी
महसूस करता हूँ -
एक खिंचाव
तुम्हारी ओर |
शायद यही प्रेम है
जो आरक्षित रहेगा
सिर्फ तुम्हारे लिए |
बहुते नीक लागे तोरा मुंह से गारी रे , गुजरिया !
देखते रहि गईनी होठवा के लाली रे , गुजरिया !
देखते रहि गईनी होठवा के लाली रे , गुजरिया !
कबो भनभनालु , कबो जोर से कढावेलु
गारी भले कहs बाकिर गीत नियर गावेलु
सुरताल में सधल बाs , हो ओ ओ ओsss
सुरताल में सधल बा तोर गारी रे , गुजरिया !
देखते रहि गईनी होठवा के लाली रे , गुजरिया !

गारी संघे नीमन-नीमन नाच तू देखावेलु
चोना बढ़ावs कबो हाथ झमकावेलु
अचके में तनिका साs हो ओ ओ ओsss
अचके में तनिका सा हिलावेलु कमरिया !
देखते रहि गईनी होठवा के लाली रे गुजरिया !
जानतानी गारी तुहूँ झूठहिं सुनावेलु
मन में बा प्रीत तु हमसे छुपावेलु
ई गारी ना ह तोरs , हो ओ ओ ओsss
ई गारी ना ह तोर पर्दादारी हs गुजरिया !
देखते रहि गईनी होठवा के लाली रे गुजरिया !
बहुते नीक लागे तोरा मुंह से गारी रे , गुजरिया !
देखते रहि गईनी होठवा के लाली रे , गुजरिया !
देखते रहि गईनी होठवा के लाली रे , गुजरिया !