बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

रविवार, 11 जनवरी 2015

हम त बोलनी ढेर अब रउआ बोलीं
बोलीं , बोल के कान में मिसरी घोरीं |

नेह बा रउआ खातिर हमरा मन में
हमरा बदे रउआ मन में का बा , बोलीं  |

ढेर दिन से हम अकेलहीं बोलत बानी
रउओ त आपन दिल के राज खोलीं  |

प्रीत हम कइनीं,निबहनी,बोल देहनीं
मत रउआ मुड़ी झुका माटी निखोरीं |

मन ई संसय के भंवर में डूबल जाता
रउआ अब हं भा ना कुछऊ त बोलीं |

हम त बोलनी  ढेर अब रउआ बोलीं |     
भारी पाप….. महापराध…….. बाम्हन के मौत | दोसी बा सगरो गांव | अब केहु चैन से ना रहि पायी | गांव में कुकुर फेंकरिहेंसन; सियार बोलिहेंसन |बाम्हन के मउअत भईल बा ……….|ना ई हतिया हा ,कुल्हि गांव मिल के कईले बा |
काल्ह दुपहरिये में पंचाईत बइठल रहे | एक ओर भिरगु बाबा ; दोसर ओर रासबिहारी के लईका |भिरगु बाबा अपना माई के कजिया में करजा लेहले रहले | आजु लेक ना लौटवले | लौटावास कहाँ से ? भिरगु बाबा खानदानी भिखारी | घरे-घरे सीधा-चाउर , दान-दच्छिना माँगेले | ओहि से गरज चल जाला | घर में उ आ उनकर मेहरारू दू बेकत | एगो लईका रहे , पता ना कवन बेमारी से खतम हो गईल | ओकरो दवा -बीरो में रासबिहारी से करजा लेहले रहले भिरगु बाबा | बाकिर आपने पलानी के पीछे के खेत रास बिहारी के नावे लिख देहले | अब जर-जमा में खाली पलानी रखे भर के जमीन बाँचि गईल बा |कहाँ से करजा लउटावस भिरगु बाबा ?
आ एही बात पर रास बिहारी के लइका उनका के दू तमेचा मार देहले रहे बीच चौराहा पर | भिरगु बाबा गरीब रहलेहन बाकिर इज्जतदार | सोचले जे-- का लंगा के मुँहे लागे के हा |फरियावता पंचाईत करी |इज्जतदार बाम्हन के मुंह पर तमेचा गलत बात बा | रासबिहारी के लइका के गोड़ ध के माफ़ी मांगे के परी |बाकिर भिरगु बाबा के पहिला बेर लागल जे लोग सत्त-असत पर बिचार ना क के रुपिया पैसा पर ढेर बिचार करत बा | केहु हूँ हाँ नइखे करत | सब लोग चुप चाप बा | आ रासबिहारी के लइका कहत बा जे हमार उधारी लौटा देस हम माफ़ी मांग लेब |
पंडीजी लोग के मुंह ताकत रहले | जब केहु उनकर पक्ष ना लिहल त कहले जे हमारा लगे पैसा त नइखे बाकिर पलानी वाला जमीन हम तोरा नांवे लिख देम | तुरते कागज आईल आ बाबा तुरते साइन करि देहले |ओकरा बाद भरल सभा में बाबा के गोड़ ध के रासबिहारी के लइका माफ़ी मंगलस ---बाबा हमारा से गलती हो गईल मांफ करि दिंहिं | आ भिरगु बाबा परम प्रसन्न दुनू हाथ उठा के आशीर्वाद देहले --- विजयी होखा बेटा , यश मिलो | अपना तमेचा के बदला पंडीजी ले लेहले | सब लोग अपना अपना घरे चल गईल | जाते-जाते रासबिहारी के लईका पंडीजी से कहि गईल -- काल्ह बिहाने लेक पलानी खाली हो जाये के चाहीं , ना त घर में से घींच के बाहर करि देम |
हम रहेम कहाँ हो ? भिरगु बाबा के काठी मारि देहले रहे |
आ अजु भिरगु बाबा के देहि काठ हो गईल बा |उ अपना मेहरारू संघे माहुर खा लेहले बाड़े | लोग फूंके के काम में लागल बा | डर सबका मन में बा |बरहम पिशाच के |आ कि अपना मन के पिशाच के ? जवन छुपे छुपे भिरगु बाबा के जान ले लेहलस ? रासबिहारी के लइका जवन उनका के कहले रहे जे हमारा मुड़ी पर ना नु रहबा आजु कान्हा पर ढ़ो के ले जाता | अब उनकर पलानी के लगे उनकर किरिया करम होइ |ओहिजा मंदिर बनी |

बुधवार, 7 जनवरी 2015

ए  हवा ! जनि तू हमरा के डोलावSS |
 मत छुवS तू देह, धोती मत हिलावSS |
आज हम संसार से परेशान बानी
 सुत गईल बा दर्द ओहिके मत जगावSS |
 प्रीत कईनी हम जहाँ :घात मिलल
 पीठ पर ना हाथ मिलल : लात मिलल
 दुश्मनों  से घटिया  रिश्ता - नात मिलल
 मत तू हमके प्रेम से आपन बोलावSS |
 ए हवा, जनि छुवS तू देह धोती मत हिलावSS |
 जे सटल लगे :आपन लाभ खातिर
 हं-में-हं कईल, अपना स्वार्थ खातिर
गरज पडला पर भईल  कबो ना हाज़िर
 मत तुहु एतना अब नजदीक आवSS |
 ए हवा, जनि छुवS तू देह धोती मत हिलावSS
 मन ह कुकुरपोंछी : ई ना  सुधरिहैं
भले आग में ई फतिंगा जरि के मरिहैं
फेनु से ई प्रीत करिहैं : फेनु से उफर परिहैं
देह के छूवलुS त अब जियरा में आवSS |

ए हवा,जनि छुवS तू देह धोती मत हिलावSS |
सब कुछ अपने आप हो जाला | कूकर में भात-दाल बन जाला | लंच खातिर चार गो परवठा बन जाला | जब लेक उनकर मरद नहा-धोआ के निकलेले , तब ले उनकर जूता-मोजा,शॉर्ट-पाईन्ट उनका लगे पहुँच जाला | चट देना चाय बन जाला | खा -पी के उनकर मरद डियूटी चल जाले | फेन शुरू होला घर के धोवाई-पोछाई, आपन नहान - धेयान ,पूजा-पाठ भोजन-छाजन | तब तनी टाइम मिलेला त देहि के सोझ क लेली , चाहे सीरियल के रिपीट देख लेली | एही बीच में आँचार के घाम लगावल, आ कुल्हि सियन-बिनन के काम निपटा देली |सब कुछु अपने आप हो जाला ; माने बिना बिशेष परयास के | रोज रोज एके गो चीझ ....जैसे कवनो मशीन आपन काम करत होखे |तले लेक साँझ हो जाला | आँचार के घर में रख देली |सोफ़ा के सरिहार देली | रिमोट के टेबुल पर ध देली;अब उनका मरद के घरे आवे के टाइम हो गईल बा |
रोज पांच बजे लेक चलि आवे ले | आज साढ़े पांच हो गईल | कहे ना आईले अबलेक ? जाम में फंस गईल होईहें | अच्छा तलेलेक दूध में चाहपत्ती आ चीनी मिला के रख देहली ,जे अइहें त चट देनी चाय बना दीहें |बुझाता जे केहु केवाड़ी ठकठकावत बा |आ गईले का ? आ धत तेरी के , केहु ना ह | एहिंगा कान बाजत रहेला | बाक़िर छव बज गईल | हे भगवान कवनो गड़बड़ी नईखे नु भईल ? ई मुआ फोनवो नईखे लागत | यह घरी ढेरकुल्हि बम ब्लास्ट के खबर सुने में आवेला | बाक़िर आज के समाचार में त कवनो खबर नईखे | समाचार चैनल लगा देहली , कि उ आवेले त पहिले समाचार देखेले | अब बालकनी में खड़ा हो के आपन मोटर सयकिल के आवाज चिन्हे लगली |लोग आवत जात त बा |… हो गईल होइ कवनो काम |… एह घरी ऑफिस वाला खून चूस लेत बड़ेसन ओभर ड्यूटी करा के | …अच्छा अइहें त हारल-खेदायिल नु आईहें |सोचली जे तनी चिउरा मुमफली भुज लेस …. चाय के साथे खाए खातिर | किचन में गईली |अबहिन भुजते रहली कि उनका मरद के आइला के आवाज सुनाई दिहल | सब कुछ छोड़ छाड़ के केवाड़ी खोले भगली | धक –धक……. आ गईले का ? जबले उ केवाड़ी खटखटावास ओकरा से पहिलहीं खोल देहली |
कहाँ रहनी हा एतना देर ?
अरे एक जाना गांव के भेंट गईल रहलाहान |
चाय बना दी ? पीएब ?
जरूरत त नईखे ; बना देबू त पी लेब | एतना कहि के उनकर मरद हाथ गोड़ धोवे चल जाले , आ उ किचन में चाय बनावे |
फेन सब कुछ अपने आप हो जाला | अपने आप चाय बन जाला |टिभी देखत उनकर मरद चाय पी लेले | उ किचन में डिनर बनावे चल जाली | जइसे कवनो मशीन होखे ......बिना परयास के काम करे......अपने आप.......रोज रोज | बाक़िर कराही में भुजे खातिर धईल चिउरा जर के खोंता हो जाला .......रोज रोज |
हंडिया - पतुकी - बटुली - खोरा
निकलल ढिंढ आ बबुआ कोरा
मरियल देंह आ माँगे सेनुर
मन पसंगा भर, मन -भर सबुर
बियहुति साड़ी में छप्पन पेवन
लड़िकयिएँ में बुढाईल जोबन
चूल्हा- चौकी बर्तन - बासन
छोड़ल-छाड़ल उनकर अगरासन
बाहरो- भितरो घरवो -दुअरोँ
सास- ससुर- देयादीन - देवरो
एतना सगरो के मलिकाइन
गरीब "टहलुआ "के मलिकाइन

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

बात पिछला साल के ह |का जाने कहाँ दुनी से हमरा मन में बिचार आईल कि हमरा महापुरुष बने के चाहीं | जेतना कुल्हि किताब पढवाल गईल बा , जेतना ज्ञान के चर्चा ई दुनिया में भईल बा ; कुल्हि बात के इहे मतलब बा कि सब केहु के महापुरुष बने के चाहीं | ना त , महापुरुषों कि जीवनी -- किताब काहें पढ़ावल जाइत ? कवनों भर्तृ हरी कही गईल बाड़े कि जे महापुरष नईखे बनत , उ ई दुनिया में गदहा नियर बा |भले उ घास ना खाके ,चाउर-गेंहू खाता |त मोट बात ई कि महापुरुष बने के चाही ;आ सबका बने के चाहीं |इहे बात सोच बिचार के हम महापुरुष बने खातिर किरिया खइनीं |
अब बात आ गईल जे महापुरुष बने खातिर कईल का जाओ ? बिना कईले त ई दुनिया में भीख ले ना भेंटाला | ढेर सोच बिचार के हम फैसला कईनी जे एगो सोसाइटी बनावल जाऊ | काहें कि सभ महापुरुष लोग कवनो ना कवनो सभा भा सोसाइटी से जुडल रहे लोग | एही से हम चट देना एगो सोसाइटी बना लेहनी - महापुरुष बनाओ सोसाइटी | हमारा ई ना बुझाला जे सोसाइटी के नाम सोंस से काहें शुरू होला |सोंस त एगो मछर के नाव ह , जवन काटेलेसन त बुझाला जे खून के साथे परानो चूस लिहेंसन | जाये दिहिं, जे नाव धईले होइ उ कवनो समानता देखिये के नु धईले होइ ? एने हमार सोसाइटी तैयार त हो गईल बाकिर एहिमे अउरी लोग के जोडलो त जरूरी रहे | हम ढेर हाथ-गोड़ ध के कुछु लोग के जोवाइन करवनी | केहु के अध्यछ त केहु के सभापति बनावे के दिलासा देहनीं | हम खाली संजोजक बनि के रहि गईनी | बाकिर सब लोग से हम सकरववनीं जे हमर भाषण सुनला के बाद हमारा के महापुरुष कहे के परी | सभ लोग के माला पहिना के , बढ़िया खातिर बात निबहा के ,कुल्हि लोग के आउंज- गाउँज भासन सुनि के , कुल्हि लोग के झूठ साँच में मूड़ी डोला के जब हम हारि गईनी तब हम भासन देबे खातिर खड़ा भईनी | बाकिर ई का ? कुल्हि लोग घसक लिहल | माने हम अकेले बाँच गईनी ,अपना के महापुरुष कहे खातिर | पहिला परयास एकदमें असफल हो गईल |
बाकिर उ पहलवान कवन जवन घाव लागला पर कलपे लागे , अगिला दांव ना सीखो |चलीं , अब दोसर परयास कईल जाऊ | नया बेयार बहल रहे सफाई अभियान के | हमहूँ सोचनी जे एगो कर्मयोगी खातिर एकरा से बड़हन कवनो अवसर नईखे | अब हमरा के केहु महापुरुष बनला से नईखे रोक सकत | हम अकेलहीं नरदोह आ नाबदान के सफाई करे लगनी | हमार हित-मित्र लोग हमरा के छूतीहर कहे लागल | समाज से बायकाट के धमकी दिहल लोग | बाकिर हम सोच लेहले रहनीं जे भले हम मुड़ी कटा देंगे बाकिर निहुराएँगे नहीं |मर्द के बच्चा हैं ,महापुरुष बनिए के रहेंगे |
बाकिर पर-सुक्खे दुखी रहे वाला लोग के हमरा के महापुरुष बनत देखल नीक ना लागल | उ लोग जा के ओह जात केलोग के उकसा दिहल जवना के पुश्तैनी व्यवसाय नाली साफ कईल हा | का जे बिन्हाचल बाबा तहनी के पेट पर लात मरत बाड़े ; तहनी के रोजिगार खा जइहें |बस, ओकनी के कुल्हि टोला , मरद -जनाना ,बाल-बच्चा आके हमरा दुआर पर महाभारत ठान देहलेसन | हम समझावे के कोशिश कईनी जे संविधान हमरा के कइसनो काम करे के अधिकार देता | आ सफाई कईल खाली कवनो जात के बपौती ना हा | जबाब मिलल जे संबिधान ओहि लोग के जात के केहु बनवले रहे , जे आरक्षण के साथे सफाई के काम ओहि लोग खातिर रिजरब का देहल | जेह तरे पंडित लोग पंडिताई बना के पंडिताई अपने खातिर रिजरब क लिहल लोग | हम केतनो समझावे के कोशिश करीं बाकिर उ मानेके तईय्यार न भइलेसन | लोग बढ़ा-चढ़ा दिहले रहे | हम केतनो माताये -बहनें करते रही गईनी , ओकनी के महतारी -बहिन पर उतर गईलेसन |हम बुझ गईनी जे यहां न चलिहें राउर माया | हम हाथ जोरि के माफ़ी मांगनी जे फेन-फेन हम एहि तरीका से महापुरुष बने के कोशिश ना करेम | आ साफ- सफाई ओहि लोग से कराएब |भले ओह लोग के ना आईला पर घर सूअर के खोभार हो जाऊ | हमार दुसरको परयास असफल हो गईल |
अब हम सोचनी जे अब छोट मोट काम करि के महान बनल जाओ | जैसे अस्पताल में रोगी सेवा कईल ,झगरा के फरियावता कईल ,ढ़ेरी कुल्हि काम रहे जवना के कईला से आदमी महापुरुष बनि जाई आ दोसरा के आँखि में ना खटकी | हमार अधिके समय एहि कुल्हि काम में खरचा हो जाऊ | घर के कुल्हि काम हमार शिरिमति जी के करे के परि जाऊ | खाली हमरा मन में इहे रहो जे एक बेर , खाली एक बेर केहु हमरा के महापुरुष कही देऊ ; हमार सकल परयास सवारथ हो जाई | बिना तियाग के , कुछुओ ना मिलेला |
बाकिर सबसे अधिक तियाग त हमार घरनी करत रहली | गाई के दाना-पानी देहला से लेके बाल-बुतरू सरिहरला लेक | सगरो काम बेचारी बिना मुंह खोलले करि देस | आ रात बिरात घरे आईला पर हमरा के जवन भोजन पानी बनवले रहस , पिरेम से जीमा देस | फेनु बिहाने उठी के हम महापुरुष बने के फेरा में लागिये जाइ |
एहि बीच में एक दिन घरे आईला पर हम पुच्छनी जे का हो ? आज का बनल बा ?
‘ कुछऊ ना’ - उनकर जबाब रहे |
हम पूछनी जे काहें ?
उ कहली जे ढेर दिन से चाउर ओरा गईल बा आ गेंहू पिसाईले नइखे ?
हमरा इयाद परल जे चार दिन पहिले उ हमरा से गेंहू पिसवावे के कहले रहली |बाकिर हम महापुरुष बने के चक्कर में ई बात भुला गईल रहनीं | तबो, बड़ा लक्ष्य खातिर छोटा तियाग त करहिं के परी | हम चट देना जबाब देहनी जे का भईल |आटा नईखे , त गेंहू के भात बना लेहले रहितु | अब सम्बाद में अल्पविराम हो गईल बुझाइल जे शिरिमति जी कुछु सोचत बाड़ी | उ हमरा लगे आईली | कहली जे रउआ परुष ना ....... महापुरुष हई | चरनवा कहाँ बा राउर ? तनी छुए दिहिं | जवन भात गाई भैंस के खाए के दिहल जाला , अब हमार नसीब उहे खाए के हो गईल बा I बढ़नी मारो एह महापुरुष बनला के |
लिहिं, एतना दिन से हम महापुरुष कहाये खातिर खखुआइल रहनीं हा | अब तs हमार घरनिये महापुरुष कही देहली | बाकिर हमार बुझाइल नाs , जे हम महापुरुष बनला खातिर हँसी कि पुरुष पद से पदावनति खातिर रोईं | ओहि रात , हम भुखले रहि गईनी आ रात भर पुरुष आ महापुरुष के बीच में लड़ाई चलते रहि गईल | केहु कहे जे हम बड़ ,तs हम बड़ |
फेन बिहान भईल | किरिन उगल | अंजोर में सब साफ-साफ लउके लागल | हमहूँ फैसला कईनी जे हमरा के अउरी लोग त महापुरुष कही ना ; आ शिरिमति जी हमरा के पुरुष कहस -इहे हमरा खातिर जियादा जरूरी बा | एहि से हम निखालिस पुरुष बने के किरिया खईनी | आ महापुरुष बने के आशा सिकहर टाँग देहनीं | अब हम पुरुष बने के परयास करत बानी | गेंहू पिसवावत बानी | लईका खेलावत बानी |
सब कुछ अपने आप हो जाला | कूकर में भात-दाल बन जाला | लंच खातिर चार गो परवठा बन जाला | जब लेक उनकर मरद नहा-धोआ के निकलेले , तब ले उनकर जूता-मोजा,शॉर्ट-पाईन्ट उनका लगे पहुँच जाला | चट देना चाय बन जाला | खा -पी के उनकर मरद डियूटी चल जाले | फेन शुरू होला घर के धोवाई-पोछाई, आपन नहान - धेयान ,पूजा-पाठ भोजन-छाजन | तब तनी टाइम मिलेला त देहि के सोझ क लेली , चाहे सीरियल के रिपीट देख लेली | एही बीच में आँचार के घाम लगावल, आ कुल्हि सियन-बिनन के काम निपटा देली |सब कुछु अपने आप हो जाला ; माने बिना बिशेष परयास के | रोज रोज एके गो चीझ ....जैसे कवनो मशीन आपन काम करत होखे |तले लेक साँझ हो जाला | आँचार के घर में रख देली |सोफ़ा के सरिहार देली | रिमोट के टेबुल पर ध देली;अब उनका मरद के घरे आवे के टाइम हो गईल बा |
रोज पांच बजे लेक चलि आवे ले | आज साढ़े पांच हो गईल | कहे ना आईले अबलेक ? जाम में फंस गईल होईहें | अच्छा तलेलेक दूध में चाहपत्ती आ चीनी मिला के रख देहली ,जे अइहें त चट देनी चाय बना दीहें |बुझाता जे केहु केवाड़ी ठकठकावत बा |आ गईले का ? आ धत तेरी के , केहु ना ह | एहिंगा कान बाजत रहेला | बाक़िर छव बज गईल | हे भगवान कवनो गड़बड़ी नईखे नु भईल ? ई मुआ फोनवो नईखे लागत | यह घरी ढेरकुल्हि बम ब्लास्ट के खबर सुने में आवेला | बाक़िर आज के समाचार में त कवनो खबर नईखे | समाचार चैनल लगा देहली , कि उ आवेले त पहिले समाचार देखेले | अब बालकनी में खड़ा हो के आपन मोटर सयकिल के आवाज चिन्हे लगली |लोग आवत जात त बा |… हो गईल होइ कवनो काम |… एह घरी ऑफिस वाला खून चूस लेत बड़ेसन ओभर ड्यूटी करा के | …अच्छा अइहें त हारल-खेदायिल नु आईहें |सोचली जे तनी चिउरा मुमफली भुज लेस …. चाय के साथे खाए खातिर | किचन में गईली |अबहिन भुजते रहली कि उनका मरद के आइला के आवाज सुनाई दिहल | सब कुछ छोड़ छाड़ के केवाड़ी खोले भगली | धक –धक……. आ गईले का ? जबले उ केवाड़ी खटखटावास ओकरा से पहिलहीं खोल देहली |
कहाँ रहनी हा एतना देर ?
अरे एक जाना गांव के भेंट गईल रहलाहान |
चाय बना दी ? पीएब ?
जरूरत त नईखे ; बना देबू त पी लेब | एतना कहि के उनकर मरद हाथ गोड़ धोवे चल जाले , आ उ किचन में चाय बनावे |
फेन सब कुछ अपने आप हो जाला | अपने आप चाय बन जाला |टिभी देखत उनकर मरद चाय पी लेले | उ किचन में डिनर बनावे चल जाली | जइसे कवनो मशीन होखे ......बिना परयास के काम करे......अपने आप.......रोज रोज | बाक़िर कराही में भुजे खातिर धईल चिउरा जर के खोंता हो जाला .......रोज रोज |
हंडिया - पतुकी - बटुली - खोरा
निकलल ढिंढ आ बबुआ कोरा
मरियल देंह आ माँगे सेनुर
मन पसंगा भर, मन -भर सबुर
बियहुति साड़ी में छप्पन पेवन
लड़िकयिएँ में बुढाईल जोबन
चूल्हा- चौकी बर्तन - बासन
छोड़ल-छाड़ल उनकर अगरासन
बाहरो- भितरो घरवो -दुअरोँ
सास- ससुर- देयादीन - देवरो
एतना सगरो के मलिकाइन
गरीब "टहलुआ "के मलिकाइन
सच है,

तुम्हारे पुरखों ने सबकुछ रचा था-

जहाज, रेल, मोबाइल और कम्प्यूटर भी |

कि वे चाँद और सूरज से भी आगे गए थे |

कि भांति-भांति के यन्त्र भी उनने गढे थे |

आकाशवाणी-अभियांत्रिकी-सर्जरी-परमाणु बम

माना कि जो कुछ आज है उनके दिये है  |

पर खटकती है हमेशा बात एक मेरे ह्रदय में

जब कुछ नहीं था उनके पास ; कुछ भी नहीं

( और आज भी कुछ नहीं है तुम्हारे पास; कुछ भी नहीं )

तो शुरुआत कैसे की उन्होंने ?

कुछ सोच - कुछ विचार  - कुछ कर्म - कुछ विज्ञानं

या कि चालीसा पाठ या पोंगा पुराण

या कपोल कल्पना, व्याख्यान -

जो आजकल तुम कर रहे हो |

चन्द भीख और उधारियों पर जी रहे हो |

आज कि प्रोद्योगिकी बहुत आगे बढ़ गयी है |

चेक करवा लो खून अपना


कहीं तुम्हारी नस्ल तो नहीं बदल गयी  है ?