बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

सोमवार, 25 जनवरी 2016

बबुआ के बाप-दादा कोदो खात रहले 
बबुआ के मिलल दाल-भात भारत देश में |
बबुआ के बाप जानस पढ़े-लिखे कुछु नाहीं
बबुआ के मिलल शिक्षा-अधिकार भारत देश में |
बैलगाड़ी ,छकड़ा हाथी-घोडा बाप जनले
बबुआ जानेले    मंगलयान     भारत  देश में  |
बाटे दिक्दारी बहुत देश में बीमारी बहुत
धीरे-धीरे होते बा सजी के इलाज भारत  देश में |
काहें करीं हाय-हाय ; काहें रोयीं भायँ - भायँ
अपना कमीनी के करीं जयगान भारत देश में
धरीं, तनी धीरा धरीं , आपन काम नीके करीं
आपनहूँ दिहिं जोगदान भारत देश में |
देश के प्रशासन ,संविधान विधान के
दिल के भीतर से करीं समान भारत  देश में |
आईं, रउओ साथे आईं , एके सुर में गीत गाईं

देश महान जनता महान भारत देश में |

शनिवार, 23 जनवरी 2016

सावधान !
बामुलाहिजा होशियार !
बीच समर में
रुदालियों के दल बुलाये गए हैं |
दायें- बाएं -आगे -पीछे -
यहां तक कि हरावल दस्तों के बीच
छुपाये गए हैं |
वे जंग नहीं लड़ते
केवल मर्सिया पढ़ते हैं |
रोने को मिले ;कोई मरे तो-
यही कामना करते है |
योद्धाओं !
जंग जरूरी है
पर इससे ज्यादा जरूरी है-
इन रुदालियों को पहचानना |
ये पिछले जंग की विधवाएं हैं,
जिन्होंने जौहर नहीं किया था |
ये कल भी रोई थी ;
आज भी कलपती हैं |
रोज नए-नए शहीद हड़पती हैं |
शहीदों !
जंग जरूरी हैं -
पर इससे ज्यादा जरूरी हैं
जंग के लिए मरना ;
रुदालियों के लिए नहीं |
ये अपने बच्चे खाती हैं |
साधो गज़ब तमाशा देखा
गदह-पूंछ पकड़े है धोबी पीछे-पीछे जाए
दुलत्ती खाए कितना भी पर पूंछ नहीं बिलगाये
यह मंद बुद्धि का लेखा
साधो गज़ब तमाशा देखा


चाम जीभ की बजै निरंतर जब-जब निकसे बोली
मरे चाम का ढोल बना कर पुरकस पिटे ढोली
झूठा -सच - अशुद्ध -मटमैला
साधो गज़ब तमाशा देखा


सबके सर में भुस भरे है सुलग रहे है भीतर
अपनी कुंठा जग को दे गए लेक्चर दिए फटीचर
बातें बड़े गुड़ का भेला
साधो गज़ब तमाशा देखा


क्या कहिये, क्या सुनन-जोग है ,किसकी बात बिचारें
सब के सब हैं मतिभ्रमित, ये अंधे भक्त बेचारे
सबको बूझो यहां गपेड़ा
साधो गज़ब तमाशा देखा
एक दिन के बात हवे की हम गईनी ससुरारी
पहिला पहिला बेर रहे जब से भईल रहे शादी
ससुरारी गईला से पहिले करिया केश रंगवनी
दुइ हज़ार के जूता कीननी दस के कोट सियवनी
असली में ई बात झूठ बा रउवा बुझीं सहीं
पैंतीस किलो चिउरा कीननी दस तौला के दही
सारिन खातिर जींस खरीदनी सरहज खातिर साड़ी
एक दिन के बात हवे की हम गईनी ससुरारी
तीन कोस जाए खातिर काका के सायकिल लेहनीं
पावडिल दाब के सीट चहड़ के इलू इलू गाना गवनीं
बहरिये ससुर भेंटाइल रहले राम-राम हम कहनी
उनका पुछला पर हम घर के खबर-दबर सब कहनीं
जाके खटिया पर बइठनी मिसरी से पियनीं पानी
एक दिन के बात हवे की हम गईनी ससुरारी
सारिन सारवा सब आइलैं सं अवुरी अईली सरहज
हमरा के अइसन घेरले सं बुझीं जइसे अलवंज
उ सभन के हंसी ठिठोली हमरा मने ना भावे
छव बजे मुक्ति मिलल जब भईंस लागल रम्भावें
सारवा सब छोट रहले सं ससुरा रहे लापाता
भईंस हमरे दूहे के परल टूटल दामाद ससुर के नाता
खोल के मोजा –जूता- कोट के भितरे देहनी गारी
एक दिन के बात हवे की हम गईनी ससुरारी
कान पकड़ के उठक बईठक तब हम उहँवे कईनी
ओकरा बाद से ना कबो हम ससुरारी के गईनी
चाह-
तिलकुट के रहे :
धोंधा मिलल |
सुख- दुख मिलल
खिचड़ी के
चाउर दाल जइसन | घीव जइसन, अनासहूँ कबो - उपरे से मिलल, उनकर अनुग्रह | धरम- दही ; पापड़ -वैभव ; अंचार के मत्सर्ग से पहिचान तनिका बढ़ गईल बा | जिंदगी अब - संकरात हो गईल बा |