बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

तथ्य सारे
हो गए हैं दोगले |
परिभाषाएँ समूची
अपवादकारी हो गयी हैं |
नियम सभी
विपथन ग्रसित हैं |
अबोध हैं विवेक -
निष्क्रिय पड़ा-सा |
ज्ञानचक्षु चुंधिया गए हैं;
दिग्भ्रमित |
शेष केवल चेतना हैं
जिसके सहारे जी रहा हूँ !
झुक जाने से
अधिक सरल है
गिर जाना / टूट जाना
नन्ही घास ने
तब जाना
जब समूल उंखाड़ी गयी
आपादमस्तक
झुक जाने के बाद
पास खड़ा था
पेड़ ताड़ का
आधा टूट जाने के बाद
अइसन हँसी हँसs तू बाबू
झर के जवन ग़ज़ल बन जाय |

अइसन गीत कढ़ावs जवन
सारंगी के स्वर बन जाय |

अइसन बात कहs तू लय से
जइसन कोइलर गीत सुनाय |

अइसन चुप्पी साधs जे
बहत बेयार थथमिए जाय |

जबले जियs, जियs तू अइसन
ढेला-माटी धड़कन बन जाय |

जदि मरs , मरs तू अइसन
जइसन दरिया लहर समाय |