बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

क्रमांक -एक


अलसायी हुई धूप घास के मैदान में पसरी हुयी है | बदरी अपनी सहेलियों के संग आसमान में धमा चौकड़ी मचा रही है | परेशानी में धूप कभी इस करवट तो कभी उस करवट होकर लेटती है , बदरी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता | दुपहरी ठिठक कर कमर  सीधी करती है | वह  इस तमाशे को  थोड़ी देर और  देखना चाहती है |  पर अचानक  दिन आवाज लगा देता है| दिन को बड़ी जल्दी मची है | वह सूरज के कंधे पर सवार हो गया है | दुपहरी को भी जल्दी आने को कह वह आगे निकल जाता है | दुपहरी सरकती हुयी आगे बढ़ जाती है | धूप भी पहले पाँव समेटती है फिर अनमने ही घास के मैदान से बहार चली जाती है |
              फिर  अचानक से , हड़बड़ी में,रात आ जाती है | उसके आने का समय शायद अभी  नहीं हुआ  था |    जल्दीबाजी में  वह  गीली साड़ी ही पहन कर आ गयी  |  उसके गीले साडी से टपक कर,  पानी घास की बूंदों को नम किये देता है | ठंढ से रात भी सिहर  जाती है | हवाएँ तो बिना बताये  ही इधर उधर बेमतलब घूम रहीं हैं | रात को इससे तकलीफ तो होती है ; पर वह उलाहना नहीं देती बल्कि लज्जा से और सिकुड़  जाती है | अभी -अभी हवाओं ने शायद रात की साडी को छू  लिया है | उनके हाथ गीले हो गए हैं | 
             एकाएक घूँघट उठा कर , कनखी से, रात चाँद को  एक नज़र देखती है | चाँद अभी तक बेखटके रात के सांवले बदन को निहार रहा था | पर अब शरमा जाता है | शरम से वह  एक कोने में छुप जाता है | रात  पहले अपनी साड़ी ठीक करती है | अब तो  उसका चेहरा  बिल्कुल  दिखाई नहीं देता | अबतक हवाएँ भी  थक कर सो गयी है | चाँद भी तब छुपा तो अबतक  बाहर नहीं निकला | रात भी अकेले में  उंघने लगी  है |
              फिर धड़ाके से नए साल का आगमन होता है | रात की इन्तजार ख़त्म हुई | वह उतावली में नए साल से लिपट जाती है | हवाएँ कुनमुना कर अपनी उपस्थिति जताती हैं  | चाँद भी कहीं कोने से आँख फाड़े यह सब देख रहा हैं | पर इसका असर न ही रात पर ; न नए साल पर पड़ता हैं |वे दोनों एक दूसरे से लिपटे पड़ें हैं |
             रात के बदन में एक झुरझुरी सी उठती हैं | उसका इन्तजार अब जा कर ख़त्म हुआ हैं | वह झूमने , नाचने, गाने ,मस्ती में बहक जाने के मूड में हैं |वह नए साल को जबरदस्ती एक ओर खींचती हैं | लगभग  घसीटे जाते हुए नया साल रात के साथ जाने को तैय्यार होता हैं  | उसने आज जम कर खाया हैं | उसके मुंह से बदबू आ रही हैं | शायद उसने कुछ चढ़ा भी रखी हैं | वह रात के आगोश में सिर्फ सोना चाहता हैं | उसे नींद आ रही हैं | उसे कल दोस्तों के साथ पिकनिक भी जाना हैं | वह रात को कुछ   समझाना चाहता हैं |पर रात कहाँ मानने वाली !
                 आज वह अपने सारे अरमान पूरे  कर लेना चाहती हैं | उसे पता  हैं - आज का मिलन आखिरी है | कल फिर नयी सुबह होगी | कल नया साल  नयी सुबह के गले में गलबहियां डाले घूमता नज़र आएगा | पर उससे क्या ? आज तो वह अपना है | रात नए  साल की कलाई जोर से पकड़ कर अपनी और खींच लेती है  | नए साल ने भी नखरे  छोड़ रात के संग हो लेता है | दोनों खूब नाचते हैं , एक दूसरे से चिपक चिपक  कर | रात खिलखिला कर हंसती है तो नया साल भी ठठाकर उसका साथ देता है | रात बेतुकी गीत गाती है तो नए साल के कदम भी लड़खड़ाते हुए थिरकतें है | रात के  कपड़े नए साल के पसीने   से  भीग गएँ है | पर इसकी परवाह किसे है ? दोनों अपने आखिरी मिलन को यादगार बनाना चाहतें है | फिर रात थक जाती है | नया साल भी उसके आगोश में लुढक जाता है | दोनों ही सो जाते हैं |
              तड़के ही जग कर रात अपने कपड़े ठीक करती  है | नया साल अभी तक सोया हुआ है | रात मुस्कुराती है | उसने नए साल को नयी सुबह से मिलने में थोड़ी  देर तो रोक ही दिया ! जब नयी सुबह आएगी और नए साल को इस तरह सोते देखेगी तो नाराज नहीं होगी क्या ? - यह सोच कर रात फिर मुस्कुराती है और सोये हुए नए साल के होठों पर एक चुम्बन  देकर  चली जाती है - " अलविदा मेरे सनम ! अलविदा ! अब फिर लौटकर मैं तुम्हारे पास कभी नहीं आउंगी | नयी सुबह तुम्हें मुबारक हो ! याद रखना ! " नए साल को क्या पता कि कौन आ रहा है और कौन जा रहा है ? वह तो ऐसे समय में हमेशा सोया ही रहता है |

                बड़े जोश में नयी सुबह आती है | उसने  बड़े अच्छे बनाव सिंगार कर रखें है | पर नए साल को नींद में देखकर उसका उत्साह ठंढा पड़ जाता है | वह यूँ ही बैठकर नए साल के जागने का इन्तजार करने लगती है | काफी देर तक इन्तजार करने के बाद भी नया साल नहीं जगता है तो वह उसके कानों  में जाकर जोर से चिल्लाती है -" स्वागत है बुद्धू ! नयी सुबह के साथ स्वागत है ! अब तो उठो !”                                                [क्रमशः]

रविवार, 27 दिसंबर 2015




आओ फिर ,खुशबुओं के शहर में चलें |
रंग हँसतें जहां, फूलों के घर चलें |
********एक तितली इशारा किये देती है
*******एक कोयल भी आवाज-सी देती है
भौरें स्वागत के गीत गुनगुनाते चलें |
आओ फिर खुशबुओं के शहर में चलें |
रंग हँसतें जहां फूलों के घर चलें |





*******नर्म धूप ने चादर बिछा रक्खी है
****** धर हवाओं की उंगली बिठा रक्खी है
दिन भी पसरा हुआ है घास पर -अनमने |
आओ फिर खुशबुओं के शहर में चलें |
रंग हँसतें जहां फूलों के घर चलें |




********मन तो चाहे अभी धूप में लेटना
********* तेरी जांघो पर अपना सर टेकना
धूप चेहरे की छाया हो तेरे आँचल तले |
आओ फिर खुशबुओं के शहर में चलें |
रंग हँसतें जहां फूलों के घर चलें |

शनिवार, 26 दिसंबर 2015

साँप के जीभ लपलपाय त थुराय जास,
आदमी के जीभ पर ना कवनो लगाम बा |
जेकरा जे मन करे उहे चिल्लात रहे ,
सुने वाला के ना कवनो अख्तियार बा |
पोपट , चोपट , घोंघट , बकोटन
सभन के आपन आपन अलगा विचार बा |
रउआ काहे भाव देत बानी ई ससुरन के
राउर बिचार कहाँ परल अँचार बा |
बदनामी के डर ना ई थेंथरन के तनिको बा
एकनि के बदनामियों में छिपल प्रचार बा |

न जाने अर्थ क्या लगे 
उसे रुचे या ना रुचे
खुशामदी के दौर में
अब शब्द कहना भी कठिन है |



पहले प्रयुक्त हो क्रिया
या शुरू में सर्वनाम हो 
अनुशासनों के दौर में 
अब वाक्य गढ़ना भी कठिन है |


तलवार की झंकार हो 
या कोकिला की तान हो
विमूढ़ता के दौर में 
अब गीत गुनना भी कठिन है |


ऐश्वर्य का स्पर्श हो 
या भूख- डर -संताप हो 
निस्पंदता के दौर में 
अब संवेदना बचना भी कठिन है |


जय मिले या क्षय मिले
कोई सुने या ना सुने 
कोलाहलों के दौर में 
अब मौन रहना भी कठिन है |
दस का कडुवा तेल
माँगा हरखुआ ने |
“सूंघने को भी नहीं मिलेगा”
-सेठ ने हंसकर कहा |
“सूंघने को नहीं ,सेठ !”
-बोला सोझबक हरखुआ-
“सर में लगाने को
और थोड़ा खाने को
दस का थोड़ा कडुवा तेल
हमको चाहिए था |”
“मार ...भेंचो.. स्साले को”
-बिदक कर बोला सेठ-
“भैंचो ,इत्ती महंगाई में
कैसे मिलेगा थोड़ा भी
दस का कडुवा तेल ?”
- “अरे, सेठ यही बात
थोड़ा इज्जत से समझाता |”
-“भैंचो ...दस का इत्ता ही इज्जत आता |”
बाड़ी कली कचनार ,भँवरवा ! रस जनि चूसs हो
बाड़ी बहुत सुकुवार, पंखुरी धीरे से छुवs हो
टटका टटका निकसल बाड़ी
अटपट आँचर ओढ़ले बाड़ी
रंग चटख ललछाँह ...................
रंग चटख ललछाँह ,आपन नोह् जनि खोभs हो
बाड़ी बहुत सुकुवार, पंखुरी धीरे से छुवs हो
बाड़ी कली कचनार ,भँवरवा ! रस जनि चूसs हो

अनचिन्हार से बहत लजाली
अँगुरी देखला से डर जाली
तू मत जा उनका पास .......
तू मत जा उनका पास अउर ना पंजरा घूमs हो
बाड़ी बहुत सुकुवार, पंखुरी धीरे से छुवs हो
बाड़ी कली कचनार ,भँवरवा ! रस जनि चूसs हो

कुछु दिन आउरी समय लगइहें
अपनहिं विकसित हो जइहें
गंध रूप उजास ...............
गंध- रूप -उजास बदे तनी कुछु दिन रुकs हो
बाड़ी बहुत सुकुवार, पंखुरी धीरे से छुवs हो
बाड़ी कली कचनार ,भँवरवा ! रस जनि चूसs हो

शनिवार, 21 नवंबर 2015

राजा के नए जतन देखो !
सर के बल खड़ा वतन देखो !

एक रुपैया छत से गिर कर अटक गया है सीढ़ी पर
और तालियां पीट रहे तुम उसकी चक्कर घिन्नी पर
अरे वाह तम्हारी पसंद ,देखो !

राजा के नए जतन देखो !
सर के बल खड़ा वतन देखो !

नयी हवा कुछ अधिक सर्द है अबके साल मुंडेरों पर
तुम्हे आसरा बहुत अधिक है पश्चिम वाले डेरों पर
कभी आकर अपना घर देखो !

राजा के नए जतन देखो !
सर के बल खड़ा वतन देखो !

लोग गालियां सुना रहें हैं पीठ पीछे मुंह आगे आकर
कान उमेठे , जूते मारे ; लाज न आई तब भी जाकर
अखबारों की कतरन देखो !

राजा के नए जतन देखो !
सर के बल खड़ा वतन देखो !

राज-चिन्ह झुक गया ; और शर्म न आई तुमको अब भी
कालिख पोत के अपने मुंह में दांत चियारे खड़े हो अब भी
दिल का मलिन दर्पण देखो !

राजा के नए जतन देखो !
सर के बल खड़ा वतन देखो !

नेह पाती
रोज लिख के फार देहनी |
इयाद पर 
धुरा जमल, से झार देहनी |
रोज दुअरा-
नेह दियना बार अइनी |
अल्पना से 
कल्पना के श्रृंगार कईनी |
रोज टोहनी, 
कब बाजल कुण्डी दुआरे |
हकासल -पियासल
आँख बस रास्ता निहारे |
थथम गईल बा 
साँस ;कवनो थाह मिलित |
बा गुमस ,
केनहु से त बताश मिलित |
ऐ निदरदी,
तू ना आईला अब ले काहें ?
प्राण अटकल 
बा -तोहरे आवे के राहे |

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

 एक ध्रुव का दुसरे से वास्ता ना के बराबर |
ना हुए दोनों कभी एक- दूसरे के बिरादर |
सच तो है कि एक है, तभी दूसरा अस्तित्व में है |
खून के प्यासे है फिर भी एक दुसरे के -सनातन |

इस जंग के फलतः अभी खतरे में जीवन है |
ध्रुवों से दो कदम आगे अभी हटना जरूरी है |
या तटस्थ दर्शक बने रहना जरूरी है |
दोनो तरफ कि उंगलिया "मध्य" पर इंगित भले हो
अब इस मध्य का दायरा बढ़ना जरूरी है |
बढ़ कर मध्य जतला दे कि यह ध्रुवों का समुच्चय है |
अटल ध्रुव सत्य हैं लेकिन ,ध्रुवों के मध्य जीवन है |
गतर -गतर काटल -छेदल
इंहवा उंहवा शर से बेधल
पीरा से रोवत असहाय
रावन धरती पर छटपटाय
**********नजदीक राम गईनी देखे
********** संग बानर रीछ लखन लेके
**********भईनी रावन के सोझ खाड़
**********मन में उपजल तनी दयाभाव
कहनी –दशमुख! ई गति देखs
कुकरमी के नियति देखs
जे पाप करत में अघा जाला
ओकरा अखियन चर्बी चढ़ जाला
**********उ अइसने मउअत मरेला
********** आपन हीत -नात संघे जरेला
**********रोवेला ओकर घर -परिवार
**********फेंकरेला ओकरे नांवे सियार
लंकेश बिहँस कहलस -हे राम !
अब निकले जात बा हमार प्रान
एतने हमार नियति ना हs
खलिहा हमरे गलती ना ह s
**********हंs , सीता से बरजोरी कईनी
**********इहे लमहर गलती कईनी
**********तू कटलs बहिन के नाक कान
**********उ अपराध ना रहे काs, राम ?
एगो अउरी चूक हमसे भईल
ओहि लागले हमला ना कईल
जदि खलिहा "नाक" बदे लड़ींतीं
अइसन हार हम ना हरतीं
***********खानदान के नाक के बात रहित
***********से विभीषणों के भी साथ मिलित
***********जदी केकरो नज़री से ना गिरीतीं
*********** निश्चय मानs; हम ना हरतीं
जे उच्च नैतिकता पर लडेला
जग ओकरे मदद करेला
हम आपन आदर्श गिरा देहिनी
बड़का भारी गलती कईनी
**********जदी युद्ध लंका में ना होइत
**********भलुक किष्किन्धा में होइत
**********त हमरा सेना में जोश रहित
**********इज्जत खातिर प्रतिशोध रहित
तोहरा मन के अपराध-भाव
खुदे तोहरा के करित नाश
देवता- देवी- वानर -किरात
केहु ना दिहित तोहर साथ
**********एतने कहि रावण मरि गईलस
**********बाकिर असली बतिया कहि गईलस
***********जे आदर्श बदे लडेला
**********विजय ओकरे साथे रहेला
आज फिर बरसात आई |
छनन-छन-छनन-छन
बूँदों ने पायल बजायी |
आज फिर बरसात आई |
सर -सर -सरसर भागता जल
उर्मियों की धर कलाई |
आज फिर बरसात आई |
मात्र सर ही धो रहे तरु,
तृणों ने डुबकी लगायी |
आज फिर बरसात आई |
लाज के परदे हटाकर
हवा अल्हड़ दौड़ी आई |
आज फिर बरसात आई |
चल रही पानी - हवा में ,
शर्त की भागम-भगाई |
आज फिर बरसात आई |
थिर गया मन ;थमा जीवन
फिर किसी की याद आई |
आज फिर बरसात आई |
तो ,एक गुब्बारा था -बहुत बड़ा ...| इतना बड़ा कि आजतक किसी ने भी इस तरह का कोई गुब्बारा नहीं देखा था | या जिन्होंने देख रखा था उन्हें ठीक-ठीक याद नहीं आ रहा था कि इतना बड़ा कोई गुब्बार होता भी होगा | करीब- करीब सभी लोगों ने यह मान लिया था कि वह बहुत बड़ा गुब्बारा था ;या कि सबसे बड़ा गुब्बारा था |
उस समय के किसी आर्किमिडीज ने कह रखा था कि ज्यादा बड़ा गुब्बारा ज्यादा जगह छेंकता है ;और ज्यादा जगह छेंकने के लिए आस पास की हवा को धकिया कर बाहर फेंकना पड़ता है | सो , उस बड़े गुब्बारे ने भी ऐसा ही किया |बल्कि इसी धकियाने के क्रम में उसने आस पास के कुछ गुब्बारों को भी धकिया कर बाहर कर दिया | लोगों को इसमें कुछ भी बुरा नहीं लगा |-"भई , बड़ा गुब्बारा जगह तो छेंकेगा ही | ऐसे में एक दो गुब्बारे इधर उधर होतें भी हैं तो क्या फर्क पड़ता है ?"- ऐसा लोगों ने उस आर्किमिडीज के कहने पर सोचा या खुद अपने मन से -यह बात उतने महत्व की नहीं है |
धीरे-धीरे बड़े गुब्बारे ने अपने आस पास की हवा को पूरी तरह बदल दिया | उसके आस पास इकठ्ठी हवा ने उसे ऊपर ..,और ऊपर चढ़ने में मदद किया |चढ़ते चढ़ते बड़ा गुब्बारा एकदम से आकाश पर चढ़ बैठा |लोगों ने किसी आर्किमिडीज के कहने में आकर या खुद अपने मन से ही यह सोचा लिया कि 'चलो, अच्छा ही हुआ !इतने बड़े गुब्बारे के लिए यही असली जगह है |' लोगों के लिए गुब्बारा अपने खुद के बड़प्पन का प्रतीक था |अपने खुद के बड़प्पन को इतने ऊँचे आकाश में चढ़ते देख लोग खूब खुश हुए , तालियां बजायी , और अपने घरेलू काम में लग गए |
बड़ा गुब्बारा निस्सीम आकाश में इधर उधर उड़ कर अपनी बड़प्पन का प्रचार करता रहा | लोगों को इसमें कुछ भी बुरा नहीं लगा | लोग गुब्बारे के प्रचार को अपनी बड़प्पन का प्रचार मानते थे | हालाँकि आकश में बहुत दूर निकल जाने पर बड़ा गुब्बारा कुछ कुछ छोटा दिखने लगता था , लेकिन लोगों ने इसे अपना मतिभरम माना | उन्हें गुब्बारे के बड़ापन पर कोई संदेह न था |
लोगों को यह बात बहुत पहले से पता थी कि ऊपर पहुँच कर गुब्बारे और ज्यादा बड़े हो जाते हैं ,बल्कि फूल जाते हैं | फिर धीरे धीरे उनकी हवा निकलती है और अंततः वे जमीन पर गिर जाते हैं | लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में कुछ समय लगता है | और इतनी सारी बाते उन्हें किसी आर्किमिडीज ने बिलकुल नहीं बताई , बल्कि लोगों ने इसके पहले भी कई गुब्बारे देख रखे थे | लोगों को अपने अनुभवों पर भरोसा था | और लोगों को अपने अनुभवों से ज्यादा उस गुब्बारे पर भरोसा था ,जो बहुत बड़ा था |इतना बड़ा कि जिसकी हवा निकलने में अभी बहुत समय लगता |
पर बड़ा गुब्बारा एकदम ऊपर पहुँच कर कुछ ज्यादा ही फूल गया था |कुछ लोग कहने लगे कि बड़ा गुब्बारा फूल कर सूरज से भी बड़ा हो गया है |सच जानने के लिए लोग आर्किमिडीज के पास गए | अव्वल तो वह आर्किमिडीज सूरज के बारे में कुछ भी नहीं जानता था ,लेकिन इस बार उसने गुब्बारे के बारे भी कुछ बोलने से इंकार कर दिया |उसके पास कई घरेलू काम थे जो निपटाने जरूरी थे |
बाकी लोगों के पास भी कई घरेलू काम थे ,जिनका निपटान जरूरी था |लेकिन बीच बीच में वे गुब्बार्रे कि खबर लेते रहते |ऐसे ही किसी दिन लोगों ने गुब्बारे कि हवा निकलने कि बात सुनी | फिर एक दिन गुब्बारे के जमीन पर गिरने की खबर भी मिल गयी | लोग सच जानने के लिए उस आर्किमिडीज को खोजने लगे जिसने उस गुब्बारे के बारे में इतनी सारी बातें कही थी |पर उस आर्किमिडीज की दूर दूर तक कोई खबर नहीं थी | लोगों को संदेह हुआ - ऐसा कोई आर्किमिडीज था भी या नहीं ? लोगों ने इस प्रश्न के उत्तर के लिए एक दूसरे को देखा | उन्हें कोई जवाब नहीं मिला | लोगों ने यह प्रश्न खुद से भी पूछा | इसबार भी कोई जवाब नहीं मिला | हार-पाछ कर लोगों ने यह मान लिया कि ऐसा कोई आर्किमिडीज था ही नहीं | गुब्बारे के बारे में सारी बाते लोगों ने खुद अपने मन से गढ़ी थी |
..फिर उन्हें खुद पर संदेह होने लगा ; अपने अनुभवों पर संदेह होने लगा |
झेंप मिटाने के लिए लोगों ने नए गुब्बारे कि खोज शुरू की |फिर ...एक नया गुब्बारा सामने आया | वह बड़ा तो क्या था ,बल्कि एक पुराने गुब्बारे का फटा हुआ हिस्सा था, जिसमें जबरदस्ती हवा भर कर एक "टिमकी" भर बना दिया गया था | लोगो को इससे कोई आपत्ति नहीं थी | वे बड़े गुब्बारे से सम्बंधित अपने अनुभवों से धोखा खा चुके थे |
सुना है कि वह नया गुब्बारा कई दुसरे गुब्बारे के साथ उड़ने के फिराक में है | अब तो वह आर्किमिडीज भी लौट आया है | पर गुब्बारे के बारे में उसकी जानकारी को कोई मानने को तैय्यार नहीं है | लोग पहले ही काफी धोखा खा चुके हैं | उन्होंने नए गुब्बारे को वहां तक उड़ने दिया ,जहां तक उसकी उड़ने कि औकात थी |लोगों को इसमें भी अपना बड़प्पन ही दिखा |
[नोट :- आर्किमिडीज उत्प्लावकता के सिद्धांत का आविष्कारक थे और टिमकी गुब्बारे के फ़टे हिस्से में हवा भर कर बनायीं जाती है |]

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

अटल ध्रुव सत्य हैं लेकिन ,ध्रुवों के मध्य जीवन है |
एक ध्रुव का दुसरे से वास्ता ना के बराबर |
ना हुए दोनों कभी एक- दूसरे के बिरादर |
सच तो है कि एक है, तभी दूसरा अस्तित्व में है |
खून के प्यासे है फिर भी एक दुसरे के -सनातन |

इस जंग के फलतः अभी खतरे में जीवन है |
ध्रुवों से दो कदम आगे अभी हटना जरूरी है |
या तटस्थ दर्शक बने रहना जरूरी है |
दोनो तरफ कि उंगलिया "मध्य" पर इंगित भले हो
अब इस मध्य का दायरा बढ़ना जरूरी है |
बढ़ कर मध्य जतला दे कि यह ध्रुवों का समुच्चय है |
अटल ध्रुव सत्य हैं लेकिन ,ध्रुवों के मध्य जीवन है |

सोमवार, 7 सितंबर 2015

खुंड़िआरी पर राजनीत ,
आ सड़क पर लाठा लाठी |
कान फुंकईया अन्हे-अन्हे
मुंहसोझा भतराकाटी |
हुनकर नोचल हुनकर चोथल
नेकी हुनकर इनरा डारी |
मने-मने लुत्ती लागल
मुंहझौंसा, बढ़नीमारी |
बीख चढ़ल नकिया पर
जिभीया माई बहिन के दे गारी|
बड़ा ठसक बा गांव के हमरा
रउओ कबो झाँकी पारी |
एक बकोटा माटी लेहनी
यूपी आ बिहार से |
दोसर बकोटा माटी लेहनी
आन्हकेहु के दुवार से |
कि हमर माटी - हरदम गाभिन ;
आन्ह के माटी- कबो गाभिन ; कबो बिसुकल !
तबो आन्हकेहु काँहे हरखित ;
आ हम हर दफे काँहे बिसूरत ?
-करवईया बिनु !
माटी के कोड़वईया बिनु ,
हरनधी करवईया बिनु,
मड़ई के छ्वइया बिनु,
जंगली घास गर्हवईया बिनु ,
(सबसे आगे ;सबसे बढ़के )
-गीत नया लिखवइया बिनु ,
सोहर के गवईया बिनु ,
सीख नया सिखवइया बिनु ,
आगे बढ़ के लड़वइया बिनु ,
(कँहा बा लोग उ लोग ,होs ?केने बा लोग उ लोग? )
-खेत कोड़त बा , हर जोतत बा
मड़ई छावत बा गीत गावत बा; आन्हे के
खूब लड़त बा ,खूब पढ़त बा
चमचागिरी में नाम करत बा
बाकिर सगरो कुल्हि आन्हे के
(आपन काम फलाने के)
तब काs सींकहर टाँगे के?
लमहर-लमहर मुंह बावे के
बड़हन धोंधा बान्हे के|
प्रणाम उन शिक्षकों को जिन्होंने गढ़ -गढ़ काढ़े थे खोट |
नमन उनको जो कहा करते थे -सोच ,कुछ अच्छा सोच |
अभिनंदन उनको जिनका हम हरदम खिल्ली उड़ाते थे |
वंदन उनको जो फिर भी हमें प्रेम से सिखलाते थे |
आज उनके न होने की कमी बहुत खलती है |
अब कोई नहीं बताता हमने किया कहाँ गलती है |
हे प्रगल्भ - रणछोर ,चोर-माखन के ,हे लीलाधारी
कहां गुम हुई जन्मदिवस पर सह-जन्मी वह बहन तुम्हारी
जन्मदिवस की धुमधाम बस अपने लिए आरक्षित करके
तुम कृतघ्न बैठे हो उसके अस्तित्व -मात्र को विस्मृत करके
तुम पकवानों से घिरे स्वर्ण झूलाओं पर झूले बैठे हो
अपनी बहना के हिस्से का दायभाग भी भूले बैठे हो
हे छद्म वीर रणछोर हमेशा रण में पीठ दिखानेवाले
भरमा भरमाकर लोगों के कंधे से तीर चलानेवाले
घोर विपत्ति बीच हमेशा एक ओट छुपजानेवाले
खुद कर्तव्यहीन अन्य को ज्ञान बहुत सिखलानेवाले
कुछ तो यश गाओ योगमाया के वीर इरादों के
जो सम्मुख होकर लड़ी कंस के दुर्निवार आघातों से
माँ के आँचल में छुपे हुए थे तुम जब गोकुल के राजमहल में
उसी समय से बहन तुम्हारी रहती आई विंध्याचल में
कालांतर में सम्राट हुए अपना इतिहास लिखवाया तुमने
पर बहना का एक हर्फ़ भी जिक्र कहीं ना लाया तुमने
वह आज भी कुछ गुमनाम तुम्हारे नाम से विमुख खड़ी है
माँ है ,पूजा होती है ,पर उसका जन्मदिवस ज्ञात नहीं है
लाज धरो ,केशव!यश गाओ अपनी रक्षाकरिणी बहना का
जब भी जन्म दिवस मनाओ संग मनाओ बहना का

शनिवार, 29 अगस्त 2015

आवs जम के लड़ल जाओ
ना आपसे में कपार फोरल जाओ
बम -गोला ,मारा-मारी
बेमतलब के गारा-गारी
भाई के खून के पियासल भाई
ई पुरनका लीख के पट्टीदारी

अब कुछु नवका कईल जाओ
एगो नया लड़ाई लड़ल जाओ
आवs जम के लड़ल जाओ

तू तनिका बढ़ जा हमसे आगे
कुछु बढ़िया करी जा आगे
तब हम तोहरा के पिठियाई
एही नले हमहूँ बढ़तीं आगे

हाराहुँसी में बढ़ल जाओ
ई नवका लीख धईल जाओ
आवs जम के लड़ल जाओ

तू भईलअ पाकिस्तानी
आ हम भईनी हिन्दुस्तानी
हमनी के झगड़ा मेंटी ना
झगड़ा अउरी गहिरा छानी

अब झगड़ा के रोख मोड़ल जाओ
नवका इतिहास रचल जाओ
आवs जम के लड़ल जाओ

झगड़ा अशिक्षा गरीबी से
जड़ता के जाल-फरेबी से
कहीं हम तोहरा के पिछुवायीं
कतहुँ तू बढ़ जा तेज़ी से

फेनु एक दोसरा पर हँसल जाओ
शेम-शेम कहल जाओ
आवs जम के लड़ल जाओ

केतना नीक लड़ाई होइ उ
मारकाट ना गारागारी होइ उ
पनकी-बढ़ी-फली-फूली बैर-भाव
तबो केतना बढ़िया फलदायी होइ उ

कुछु एहु तरे लड़ल जाओ
अउरी बढ़-चढ़ के लड़ल जाओ
आवs जम के लड़ल जाओ

सभकर निगाह बा हमनी पर
केहु आशा धईले बा हमनी पर
केहु आग लगा माज़ा लेता
केहु खूब ठठात बा हमनी पर

चल सभकर जवाब दिहल जाओ
नवका इतिहास रचल जाओ
अउरी जम के लड़ल जाओ
आवs जम के लड़ल जाओ
एक समय छत के ऊपर नेवाड़ के खटिया डसाये हुए
हम गहिरा अंघी में सुतल थे थाकल तनी अलसाये हुए
नगदे चीकन आसमान रहा चान - जोन्हि चमकाए हुए
तनी मधिमें-मद्धिम बेयार बहे गंध चमेली नहाये हुए
तले कहाँ दूनी से बुनी पर गया हम भागे अगुताये हुए
अंघी टूटल से आलगा सगरो बिछौना भींजाए हुए
कोठरी में पहुंचे जइसे ही सुतने का मूड बनाये हुए
तइसे बरखा खत्तम् भs गया हम एतना खिसियाए हुए
कि इनर देव बूझत होइहें केतना हम गरियाये हुए
फेनु मनबढुवी कईल जाव फेनु बदमाशी के काम
चल इयारवा फेनु चलल जाव हमरा महबूबा के गांव |

फेनु से हुरदंग होखे फेनु से कुछुओ धमाल
घर के पिछुवारे चहुँप के हम करीं उनका के चाल |

उ निकल के छत पर आवस झारत आपन भींजल बाल
हम तनी सिसुकी भरीं छाती प रख के आपन हाथ |

उ देखावस जीभ हमके जइसे हमसे ना पहिचान
हम करीं अइसन इशारा जे उनका बिन निकली परान|

एके छने रंग बरसी चारू और छायी बहार
जब झटक के बान्ह लीहें केश के जुड़ा सम्हार |

दिन थथम जाइ तबे चिहुंकी तनी पुरुवा बेयार
केकरा भलुक नीक लागि दू गो प्रेमीजन के प्यार |
एक महीना से मातवा अइसन जिद पकडले रहनी जे कुल्हि घर के लोग औतियाईल रहे | आ काल्ह त एकदमे गजब करि देहुवीं | एकदम्मे अन्न जल तियाग के | का जे उहाँ के चंडीगढ़ ले जाईल जाओ | लोग लाख समुझावाल जे पुरनिया देह ट्रेन के सफर ना सह पाई | बाकिर उहाँ के जवन जिद ना धयीनी जे लोग केतनो मना के हारल गईल , बाकिर दुपहरिया से साँझ लेक अन्न के एको दाना मुंह में ना डालनी | संजय अपना आजी के दुलरुआ ह्वुआन |उनका के भेजल गईल जे एको दाना त बुढ़ियो मुंह में डालस | बाकिर ई का जे बुढ़ियो मान जास |हार पाछ के संजय कहले –“मतवा ईया ! देखीं, ट्रेन के रिजर्वेशन चार महीना पहिले करावे के परता एही घरी | बिना रिजर्बेशन के के लेखां रउआ चंडीगढ़ जाएम ?’
“हम जेनेरलो में चढ़ि के चल जाईब हो ,केहु खाली हमार देहिया सम्हारे खातिर साथ में चलो ना |”
“जेनरल में हमनी के चढ़ल मुश्किल बा | राउर त पुरनिया देह भईल |”
“ऐ संजय ! हम जेनेरल में गईल नईखी काs जे हमरा के बुरबक बनावत बाड़s लोगिन ? एही जेनरल में हम काशी मथुरा लेक घूम आयिल बानी |ई कह लोगिन जे हमार जांगर नईखे चलत त तहरा लोगिन पर बोझा भईल बानी |नाही त हम पूछे जईति कि अपनहि चल जईति चंडीगढ़ !” तनी टिहुक के मातवा बोलनिं |
अब मतवा के केs समझाओ जे ओह घरी के जमाना अलग रहे |तब ट्रेन से आवे-जाए वाला लोग कम होखे |यह घरी त स्लीपर में लेक ठकठेल लागल रहेला |खैर ,लोग बुझ गईल जे मतवा बिना चंडीगढ़ गईले ना मनिहें, त सोचल गईल जे तत्काल में टिकस लिहल जाई |छोटका बाबा आँगन में आ के कहि गईनी –“मतवा भाभी ,टाटकाल्ह में टिकस कटा दिहल जाई |परसों संजय संघे चंडीगढ़ चल जयिहs |अब मान जा | कुछु अन्न जल ग्रहन कs लs | बाकिर तहरा गईला से होइ काs ? तहार भाई के त होश हवास लेक नईखे |”
“हम नु जानत बानी कि का होइ?”- इहे कहत मतवा खटिया पर से उतर के तनी भात खईनी –“खाली हमरा के जाए ना द लोगिन हमार बबुवा हरखित नु हो जाइ हो |”
मतवा गिने लगनी -दू दिन ट्रेन के सफर ; ओकरा बाद तिसरका दिने सावन के पुनवासी ........|राखी ....| पता ना एह साले काहें उनका अपना भाई के राखी बान्हे के मन करता | आजु लेक त कब्बो भाई के राखी ना बन्हले रहली | बाकिर आजु जब उ कोमा में बाड़े चंडीगढ़ के पी जी आई में, त पता ना काहें दूनी भाई के राखी बान्हे के मन करता | मने-मन बुझाता जे बड़का बाबू हमरा गईला पर हरखित हो जइहें | राखी बन्हवाईहें,उठ के बईठ जइहें |
उनका आपन लइकाई इयाद आवे लागल |मतवा रहनीं त अपना माई बाप के पहिलका संतान -बेटी ! बाकिर मतवा के जन्म भईला पर थरिया ना बाजल –‘इनका से काs कुल उजियार होइ ? आपन ध-बान्ह के दोसरा के घरे चल दीहें|’ फेनु पांच साल बाद अईले- “बड़का बाबू” -माई बाप के दुलरुआ ! अब मतवा के कुसमय शुरू भईल | बड़का बाबू खातिर दूध रहे, घीव रहे, फल रहे, मेवा रहे | ओईमें जवन बच जाऊ तवन मतवा के हिस्सा | कबो मतवा लइकाई में चोरा के कुछु खाइयो लेस त अइसन मार पड़े जे गतर गतर दुखाये लागो –‘ई म्लेछिनी लइकवा के मुंह के कौरा छिनत बिया | चोरी जइसन कु रहन सीखतिया |’ बाद में त मार कुटाई के बेरोक टोक अधिकार बड़का बाबू के मिल गईल | खेलत-में ,कूदत-में ,सुतल-जागल-खात- पियत हर समय बड़का बाबू के मारकूट के स्वाभाविक आश्रय स्थल मतवा के शरीर रहे | बड़का बाबू के अत्याचार के खिलाफ शिकायत के कवनो उपाय ना रहे | कबो-कबो जब प्रतिकार में मातवा बाबू के ठुनकाईयो दीं त बाबू भेम्हा फोर के डहकस|एकरा बाद माई बाप से मतवा के अउरी पिटाई होखे ,एही से अपना छोट भाई के सगरो जुलुम मतवा सहि लीं |
ए माहौल में का भाई खातिर नेह छोह जागी? मतवा के नईखे इयाद जे उहाँ के कबो बड़का बाबू के प्रेम से राखी बन्हले होखेम | कबो माई बाप के बरजोरी राखी बनहईलो होइ त बड़का बाबू ठेंगा देखा के भाग जयिंहे आ तनी देर में राखी नोचा चौथा जाइ|बड़का बाबू- बड़का बाबू रहले ....आ मतवा एगो बेटी -जेकरा दोसरा के घरे जाए के रहे |आ एक दिन सांचहूं में मतवा दोसरा घरे चल गईनी -बियाह क के | आ एहिजा से मतवा के दिन बदलल शुरू भईल | एतना समझदार आ गमखोर पतोह के नाम-जस जवार में फइल गईल | लोग आदर से उहाँ के मतवा जी (महाराज जी के मेहरारू )कहे लागल |मतवा के सोर से अब बड़हन हरिहर गाछ पनप गईल बा |नाती-पोता-बेटा-बहू सब मन जोगे बा लोग |
बाकिर नईहर के मोह कहाँ मेहरारू लोग से छुटेला ? भाई से मतवा के मुंहामुँही सम्बन्ध बनले रहे |बाकिर जब लोग बतावल जे बड़का बाबू के किडनी फेल हो गईल बा आ उ चंडीगढ़ में भर्ती बाड़े तहिया से मतवा बेचैन रहनीं ह | कोमा में गईला के खबर सुन के त मतवा अन्न जल छोड़ देहनी जे चंडीगढ़ आजुवे ले चल लोगिन | ई कहs जे घरवा में अभियो मतवा के लोग बात सुनेला| अब बुझाता जे राखी के दिने चंडीगढ़ ......|-- इहे सोचत मतवा करवट बदलत रात कटनिं आ बिहाने बिहान संजय टू ए सी के तत्काल टिकस ले के आ गईले |संजय के साथे मतवा के चंडीगढ़ जाए के रहे | मतवा के पतोह -पड़पतोह लोग नीमन से तईयार क देहल लोग |मतवा ट्रेन में बईठ के चंडीगढ़ चल देहनीं अपना भाई के राखी बान्हे | राखी एक दिन पहिलहीं जीन बाबा के चढ़ा आयिल रहनीं - “जीन बाबा हमरा भाई के हरखित कs दीं |हम रोट परसाद चढ़ायेम |”
आ मद्ध (ठीक) राखिये के दिने मतवा चंडीगढ़ के पी जी आई में पहुंच गईनी -आपना बड़का बाबू के सामने | बड़का बाबू इंटेंसिव केयर यूनिट में एगो बेड पर एक महीना से पटाईल रहले -अचेत | उनकर कीटोन लेवल बढ़ गईल रहे | दुन्नु किडनी फेल हो गईल रहे | दिमाग में खून के थक्का जम गईल रहे |डाक्टर कहि देहले रहे कि बाँचल मोसकिल बा | मातवा के एतना कुल्हि बात से काs मतलब रहे ? उहाँ के त राखी बान्हे के रहे | स्टाफ केतनो रोकत रही गईले सन-“नो फॉरेन ऑब्जेक्ट प्लीज” ,बाकिर अपना हाथ में राखी के धागा लिहले मतवा भाई के बेड तक पहुंच गईनी |
“बड़का बाबू हो !दाहिना हाथ दs | राखी बान्हे के बा |”
आ जले लेक नर्स पहुँच के राखी के मरीज के हाथ से निकालs सन , बड़का बाबू अपना दोसरा हाथ से छन भर में राखी नोच देहले | ई उनकर पुरान आदत हs -ई मतवा जानत रहली |जब जब मतवा राखी बान्हेली ; बड़का बाबू नोच देले | बाकिर हॉस्पिटल वाला लोग खातिर त ई अचम्भा रहे |बड़का बाबू कोमा से बाहर आ गईल रहले |अचम्भे में हॉस्पिटल वाला लोग मतवा के बड़का बाबू के पंजरा से ना हटावल |मतवा बड़का बाबू के केश सझुरावत रहनी -“बड़का बाबू ! अबकी भईया दूज में हमरा घरे जरूर अईहs |जिन बाबा के रोट प्रसाद साथहीं चढवल जाइ |”
बड़का बाबू के सहमति में पलक झपकावल केs देखल ?केs देखल बड़का बाबू के आँख से लोर बहत? केs कहता जे भाई बहिन के नेह-छोह महतारिये के घर लेक होला ? केs कहता जे खाली बहिनिये के रक्षा खातिर राखी बान्हल जाला ? केs कहता जे भाई बहिन के रिश्ता खाली राखिये के दिन तक रहेला ? एही साल बड़का बाबू भईया दूज के दिने मतवा के घरे जरूर जइहें |

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

ईश्वर बूढ़ा हो गया है ;
बहुत बूढ़ा |
शिथिल हो गए हैं -
उसके अंग प्रत्यंग |
अब वह सफेद स्याह में
अंतर नहीं कर पाता |
बल्कि जो भी करना चाहता है
ठीक से कर नहीं पाता |
कांपते हाथ- थरथराती देह और मद्धिम बुद्धि ने
सब गड़बड़ कर रक्खा है |
धूप में बारिश ;बारिश में धूप
कभी लम्बा सूखा ; कभी पानी खूब |
जाड़े का गर्मी में घालमेल
पुरवा पछुवा सब बेमेल |
फिर जिद्दी लड़के की तरह -
गुस्से में थम-थम-धम-धम
पटकता है पाँव
हिला देता है धरती और आसमान |
फिर पता नहीं क्या बोलता है -
झाँय-झाँय सांय-सांय
जो केवल उसके चमचे ही सुनते है; समझते है |
और वे भी अपनी मन की ही करते हैं -
मार-धाड़-नरसंहार;हत्या-आगजनी-बलात्कार
हाथापाई-झगड़ा-वादविवाद
मतलब वही झाँय-झाँय-सांय-सांय |
कोई किसी की नहीं सुनता |
और न ही ईश्वर ही सुनता है -
पूजन-अभ्यर्थन-चीख-पुकार
उसे मोतियाबिंद हो गया है |
उसे नहीं दीखता जरा भी -
अव्यवस्था-अराजकता-संताप |
बुढऊ ने पकड़ लिया है खाट |
पर छोड़ेगा नहीं अपना राज पाट |
इतनी जल्दी मरेगा भी नहीं बुढऊ
भले ही वह बूढ़ा हो गया है |
बहुत बूढ़ा !
झूठ फरल बा एतना कि झूठ बेंच के तेल कीनाता !
तेल मालिश करेवाला के लाज शरम तनिको ना बुझाता !
लाज धरे दोसरा के ; अपना पिछुवारी में फेड़ रोपता !
नाच-नाच पिछुवारी देखलावे, से इहे फेड़ से झूठ तुराता !
झूठ तुराता एतना कि अगल बगल में खूब बंटाता !
झूठ बंटाता दुनिया में गोतनी के हिस्से लेंढा जाता !
लेंढा के पेंड़ा जोहत गोतनी के उलटी हो जाता !
उलटी से लोगवा बुझात बा पूत-जनम हाले नियराता !
शर्त लगी आदमखोरों में
किससे कौन अधिक जन खाय !
मंज़र-मंज़र मातम फैला
कहीं हुआँ -हुआँ; कहीं हाय- हाय !
बैताल बिराजे राजभवन में ,
सबकी एकमत हुई राय !
खून बहे नदियों में अविरल
धरती का जी तिरपित हो जाय !
गली गली सन्नाटा फैले ;
विकराल पवन बहे सायं-सायं !
बड़ी उमस है घर के बाहर
कौन मचाये हाय - हाय !
जबतक गर्दन रहे सलामत ,
तबतक हलवा पूरी खाय !
भले आग लगे छप्पर में ,
घर में घुसे गए रामसुभाय !
माथे सेनुर लाल ;
साड़ी लाल ;
साड़ी के किनारी-
जरीवाली ;
नाक में के ठोप -
चानी के ;
कान में -सोना के बाली
हाथ में –मेंहदी- टटका ,
नेलपालिश ;
गोड़ में- महावर ,
पायल घुंघरूवाली;
देह चिक्कन-
टटके में आबटन लगावल ;
मन चिरईया-
हुलसत आकाशे ;
जे काल्ह राति खान -
उनकर सोहागऱात रहे !
मिलन के रात रहे !
आज-भोरे-भोर-
रमुआ के मेहर -
धान के रोपनी बदे-
खेत में आईल बाड़ी |
लोग बा निरखत,
तनी लजाईल बाड़ी |
मजूर के मेहर -
ना लजाईला से
कवनो काम चली |
रानी -पतुरिया ना हई
जे घर में रहींहै |
काम करिहैं |
धान रोपीहैं |
तनिका निहुरि के
धान के कोठी रोपत
गीत गईंहै |
ननदी जब बोली टीबोली
तब लजईहें |
देख लीहें कनखी से
रमुआ के मुस्की |
तब अपनहिं करीहें ठिठोली |
बीग दीहें जान के -
एगो बोझि धान ,रमुआ के ओरि |
अकबका के -
लपक ना पायी रमुआ |
आहि रे बबुवा !
मेहर बिया चोख
ई भोथर रमुआ !
मने मन हो जायी
निहाल रमुआ |
उलीच दिही
अंजुरी भर पानी उठाके |
“धत्त”-
कही मेहर लजाके-
“लोग देखत बा लुकाके” |
“देखे द”-
रमुवा सुनाई
“आज सुहागदिन हउवे” |
काल्ह सुहागरात रहे;
मिलन के रात रहे !
जो कुछ बातें सच्ची हैं; वे सारी बातें झूठी हैं
देश भले आजाद हो गया सारी जनता भूखी है|
भूखी जनता नंगी होकर भीषण लूट मचाये है
जिसके हिस्से जो भी आया लूट खसोट के खाए है|
हवा को खाया कुछ लोगों ने ,अब पानी की बारी है
मिट्टी कौन ग्रसेगा इसकी मारामारी जारी है|
कुछ लोगों ने औरत खाया ; बच्चे खाए औरों ने
सरहद पर के फौजी को खाया नरभक्षी सिरमौरों ने|
बड़े घाघ निकले जिन्होंने हड्डी खाया -खून पचाया
जिसके हिस्से इज्जत आई उसको भी धोधोकर खाया |
कुछ ऐसे भी थे जो अपना ही हाड-मांस खा गए
जिनके हिस्से कुछ ना आया वे गोली सल्फास खा गए
***********शान बढे, कुछ काम दिखाओ ऐसा
***********एक तिरंगा फहराने से क्या होता है ?
बीत गए युग नव आशाओं वाले
दूर क्षितिज पर घुमड़ रहें है बादल काले
अन्न -प्रसवा धरती ही अब डायन बन गयी
निगल रही है खुद ही वह जीवन के दाने !
**********फूल खिले ,तुम बीज लगाओ ऐसा
***********टूटे फूलों को छितराने से क्या होता है !
***********शान बढे ,कुछ काम दिखाओ ऐसा
***********एक तिरंगा फहराने से क्या होता है ?

कहाँ गयी वह ओज पुरानी वाली
पत्थर पिघलाकर नीर बनानेवाली
घोष गूंजता था जिसका कोने कोने में
कहाँ गयी वह मुखरित वाणी हमारी !
***********तन झूम उठे ,तुम गीत सुनाओ ऐसा
***********मुर्दा भाषण पढ़ जाने से क्या होता है ?
***********शान बढे ,कुछ काम दिखाओ ऐसा
***********एक तिरंगा फहराने से क्या होता है ?
पत्थर के हुए श्रमिक रोज ही कारखानो में घिसकर,
सांस टंगी है मज़दूरों की अट्टालिका पर चढ़कर,
शीश विहीन पड़े हैं रक्षक घर-भीतर या बाहर
अन्न प्रदाता जान गंवाते कर्ज- जाल में फंसकर |
***********सब सधे स्वयं ही; जुगत लगाओ ऐसा ,
***********विधवा विलाप बस कर जाने से क्या होता है ?
***********शान बढे, कुछ काम दिखाओ ऐसा
***********एक तिरंगा फहराने से क्या होता है ?
एक तृण भी खुद से नहीं हिलाया तुमने ,
कोरे-सिद्धांत -पोंगा -पुराण ही रोया -गाया तुमने ,
अस्थि-मज्जा-लोहू की जब दरकार हुई धरती को
खुद हुए ओट में ,औरों की गर्दन कटवाई तुमने |
***********उऋण होओ ,धरती का तुम कर्ज चुकाओ ऐसा
***********नाखून कटाकर वीर कहाने से क्या होता है ?
*********शान बढे कुछ काम दिखाओ ऐसा
*********एक तिरंगा फहराने से क्या होता है ?

रविवार, 26 अप्रैल 2015

बरखा रानी
बरखा करिहैं |
खड़ा फसल के
खेत उपटिहैं |
उफर परिेहैं ;
असगुन उचरिहैं|
ना चरिहैं त
मरुस्थल में |
ना पर्वत के
आँगन में |
ना सूखल झरही
के जल में |
ना आग जरत
दहकत वन में |
ना भर हीक
पियासल के मन में |
अपने मन में
ई अगरइहैं |
कबो अइहैं ;
कबो ना अईंहैं |
अपने कुल-भतार के खईहैं |
रांड होइ
पायल झमकइहें |
अपने नांव
कुलबोरनी धरइहैं |
तब बरखा रानी
काहें कहइन्हें |
बरखा रानी !

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

आँचरा से अंग-अंग आपन तोप ढांक के
मुड़ी निहुरा के, लमहर घूंघटा निकारि के
नवही कनियवा जब नापे ले डगरिया
नगरिया सगरो अचके में जाग गईल बा |

अलसात-पगुरात पाड़ी-पाड़ा बोले लागल
दायें-बाएं-आगे-पीछे खौरा कुकुर घूमें लागल
चुप भईल तनी देर कुहुकत कोयलिया
रुनक-झुनुक बाजे उनकर कंगन पायलिया
नगरिया सगरो अचके में जाग गईल बा |

खेलत-कूदत लईका मुंह बा के देखे लगले
घास गरहत बुढऊ हीक भर निरेखे लगले
मेहर सब झांके लगली खोली के केवड़िया
नवही कनियवा जब हेले ले दुअरिया
नगरिया सगरो अचके में जाग गईल बा |

खेतवा में सुतल सरसों नज़र परते नाचे लागल
जेने-जेने जाए दुल्हिन ओने-ओने ताके लागल
ढांक लेहलस घाम के नेहगर बदरिया
सांय-सांय पूछे पुरुवा तू केकर दुलहिनिया ?
नगरिया सगरो अचके में जाग गईल बा |
उबल रहा था दर्द
ह्रृदय में धीमे - धीमें |
संपीड़ित कर दिया गया था
कई महीने |
आँखें नम होती थी जब
तनिक भाप रिसती थी |
खदबद -खदबद की आवाजें
निकली बनकर सिसकी थी |
कुछ अंदर ही अंदर
राख हुआ जाता था |
जो कुछ रसमय था
ख़ाक हुआ जाता था |
फिर दर्द को भी तब
कहाँ शेष बचना है ?
बर्तन ढक्कन सब
तहस नहस होना है |
दर्द उबलकर जभी
भाप बन जाए |
तभी कहीं वह
खुलकर बाहर आये |
 अलस्सुबह जब तुम नहाकर केश को फटकारती हो
बून्द मेरे तन - बदन को झकझोर कर यह पूछतें हैं
आज भी बरसात है क्या ? आज भी बरसात है क्या?
और तुम परदे हटाकर गीत कोई टेरती हो
कूकती कोयल अचानक आके मुझसे पूछती है
आज भी मधुमास है क्या ? आज भी मधुमास है क्या ?
फूल की खुशबू हवाओं में बिखर कर घूमती है
बोल पूजा के तुम्हारे , आके मुझसे पूछतें है
आज उत्सव खास है क्या ? आज उत्सव खास है क्या ?
दूर रहने पर भी तुम्हारे स्पर्श की अनुभूति होना
और पुलकित मन का मेरे से उलट कर पूछना यह
आज तुम उदास हो क्या ? आज तुम उदास हो क्या ?
पत्नी के प्रति
अभी कुछ ही दिन हुए
हमारी शादी को ,
जब एक ही गाँठ से
बंधे थे हम दोनों |
मैं बारात लेकर गया था
तुम्हारे घर |
और लगभग
अपहरण करता हुआ
लाया था तुम्हे
अपने घर |
फिर खोल दी गयी गांठे
कि मैं निस्सीम आकाश में
उड़ सकूँ ; कर सकूँ
जो भी करना है मुझे |
पर शायद ठीक से
गिरह खुली नहीं थी ,
क्योंकि आज भी
महसूस करता हूँ -
एक खिंचाव
तुम्हारी ओर |
शायद यही प्रेम है
जो आरक्षित रहेगा
सिर्फ तुम्हारे लिए |
बहुते नीक लागे तोरा मुंह से गारी रे , गुजरिया !
देखते रहि गईनी होठवा के लाली रे , गुजरिया !
देखते रहि गईनी होठवा के लाली रे , गुजरिया !
कबो भनभनालु , कबो जोर से कढावेलु
गारी भले कहs बाकिर गीत नियर गावेलु
सुरताल में सधल बाs , हो ओ ओ ओsss
सुरताल में सधल बा तोर गारी रे , गुजरिया !
देखते रहि गईनी होठवा के लाली रे , गुजरिया !

गारी संघे नीमन-नीमन नाच तू देखावेलु
चोना बढ़ावs कबो हाथ झमकावेलु
अचके में तनिका साs हो ओ ओ ओsss
अचके में तनिका सा हिलावेलु कमरिया !
देखते रहि गईनी होठवा के लाली रे गुजरिया !
जानतानी गारी तुहूँ झूठहिं सुनावेलु
मन में बा प्रीत तु हमसे छुपावेलु
ई गारी ना ह तोरs , हो ओ ओ ओsss
ई गारी ना ह तोर पर्दादारी हs गुजरिया !
देखते रहि गईनी होठवा के लाली रे गुजरिया !
बहुते नीक लागे तोरा मुंह से गारी रे , गुजरिया !
देखते रहि गईनी होठवा के लाली रे , गुजरिया !
देखते रहि गईनी होठवा के लाली रे , गुजरिया !

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

 हुनकर रसगुल्ला बड़हन बा
हुनकर कनबाली दमिल बा
हुनकर साड़ी जरी- बनारसी
आ हुनकर पायल भारी बा
आ हुनका बम में बेशी दम बा
हुनकर फुलझरिया धाँसू बा
बा हुनका लगे अनार मरिचाई
छुरछुरियो बा आकाशियो बा
हऊ हमरा घरे ना अईले
हऊ हमरा घर के ना खइले
हऊ बड़ा टेढ़ बतियावेले
जे हमारा मन के ना कईले
हर बात पर रगड़ा- झगड़ा जी
कुछ मनभीतर कुछ बहरा जी
कईसन बीतल यह साल दिवाली
दियना जरल कि जियरा जी ?

२)
चानी पर के केश
धीरे धीरे कर के सगरो झर गईल |
एगो- दुगो दाढ़ी के बाल पर
टटका सफेदी पसर गईल |
अँखियाँ के नीचे-
झुर्री पर गईल ;
चमड़ा सिकुड़ गईल |
बी ए ,भा एम ए ,भा पि एच डी -
कुल्हि पढ़ाई ,पढ़ते -पढ़त सपर गईल |
पहिले जे कहल तोहके चाचा
अबके उहो चाचा बन गईल |
ऐ भाई , गांव भर के गोधन त कुटा गईल
तोहार गोधन कहवाँ बिचिल गईल ?
सब कुछ अपने आप हो जाला | कूकर में भात-दाल बन जाला | लंच खातिर चार गो परवठा बन जाला | जब लेक उनकर मरद नहा-धोआ के निकलेले , तब ले उनकर जूता-मोजा,शॉर्ट-पाईन्ट उनका लगे पहुँच जाला | चट देना चाय बन जाला | खा -पी के उनकर मरद डियूटी चल जाले | फेन शुरू होला घर के धोवाई-पोछाई, आपन नहान - धेयान ,पूजा-पाठ भोजन-छाजन | तब तनी टाइम मिलेला त देहि के सोझ क लेली , चाहे सीरियल के रिपीट देख लेली | एही बीच में आँचार के घाम लगावल, आ कुल्हि सियन-बिनन के काम निपटा देली |सब कुछु अपने आप हो जाला ; माने बिना बिशेष परयास के | रोज रोज एके गो चीझ ....जैसे कवनो मशीन आपन काम करत होखे |तले लेक साँझ हो जाला | आँचार के घर में रख देली |सोफ़ा के सरिहार देली | रिमोट के टेबुल पर ध देली;अब उनका मरद के घरे आवे के टाइम हो गईल बा |
रोज पांच बजे लेक चलि आवे ले | आज साढ़े पांच हो गईल | कहे ना आईले अबलेक ? जाम में फंस गईल होईहें | अच्छा तलेलेक दूध में चाहपत्ती आ चीनी मिला के रख देहली ,जे अइहें त चट देनी चाय बना दीहें |बुझाता जे केहु केवाड़ी ठकठकावत बा |आ गईले का ? आ धत तेरी के , केहु ना ह | एहिंगा कान बाजत रहेला | बाक़िर छव बज गईल | हे भगवान कवनो गड़बड़ी नईखे नु भईल ? ई मुआ फोनवो नईखे लागत | यह घरी ढेरकुल्हि बम ब्लास्ट के खबर सुने में आवेला | बाक़िर आज के समाचार में त कवनो खबर नईखे | समाचार चैनल लगा देहली , कि उ आवेले त पहिले समाचार देखेले | अब बालकनी में खड़ा हो के आपन मोटर सयकिल के आवाज चिन्हे लगली |लोग आवत जात त बा |… हो गईल होइ कवनो काम |… एह घरी ऑफिस वाला खून चूस लेत बड़ेसन ओभर ड्यूटी करा के | …अच्छा अइहें त हारल-खेदायिल नु आईहें |सोचली जे तनी चिउरा मुमफली भुज लेस …. चाय के साथे खाए खातिर | किचन में गईली |अबहिन भुजते रहली कि उनका मरद के आइला के आवाज सुनाई दिहल | सब कुछ छोड़ छाड़ के केवाड़ी खोले भगली | धक –धक……. आ गईले का ? जबले उ केवाड़ी खटखटावास ओकरा से पहिलहीं खोल देहली |
कहाँ रहनी हा एतना देर ?
अरे एक जाना गांव के भेंट गईल रहलाहान |
चाय बना दी ? पीएब ?
जरूरत त नईखे ; बना देबू त पी लेब | एतना कहि के उनकर मरद हाथ गोड़ धोवे चल जाले , आ उ किचन में चाय बनावे |
फेन सब कुछ अपने आप हो जाला | अपने आप चाय बन जाला |टिभी देखत उनकर मरद चाय पी लेले | उ किचन में डिनर बनावे चल जाली | जइसे कवनो मशीन होखे ......बिना परयास के काम करे......अपने आप.......रोज रोज | बाक़िर कराही में भुजे खातिर धईल चिउरा जर के खोंता हो जाला .......रोज रोज |
हम त बोलनी ढेर अब रउआ बोलीं
बोलीं , बोल के कान में मिसरी घोरीं |
नेह बा रउआ खातिर हमरा मन में
हमरा बदे रउआ मन में का बा , बोलीं |
ढेर दिन से हम अकेलहीं बोलत बानी
रउओ त आपन दिल के राज खोलीं |
प्रीत हम कइनीं,निबहनी,बोल देहनीं
मत रउआ मुड़ी झुका माटी निखोरीं |
मन ई संसय के भंवर में डूबल जाता
रउआ अब हं भा ना कुछऊ त बोलीं |
हम त बोलनी ढेर अब रउआ बोलीं |
भारी पाप….. महापराध…….. बाम्हन के मौत | दोसी बा सगरो गांव | अब केहु चैन से ना रहि पायी | गांव में कुकुर फेंकरिहेंसन; सियार बोलिहेंसन |बाम्हन के मउअत भईल बा ……….|ना ई हतिया हा ,कुल्हि गांव मिल के कईले बा |
काल्ह दुपहरिये में पंचाईत बइठल रहे | एक ओर भिरगु बाबा ; दोसर ओर रासबिहारी के लईका |भिरगु बाबा अपना माई के कजिया में करजा लेहले रहले | आजु लेक ना लौटवले | लौटावास कहाँ से ? भिरगु बाबा खानदानी भिखारी | घरे-घरे सीधा-चाउर , दान-दच्छिना माँगेले | ओहि से गरज चल जाला | घर में उ आ उनकर मेहरारू दू बेकत | एगो लईका रहे , पता ना कवन बेमारी से खतम हो गईल | ओकरो दवा -बीरो में रासबिहारी से करजा लेहले रहले भिरगु बाबा | बाकिर आपने पलानी के पीछे के खेत रास बिहारी के नावे लिख देहले | अब जर-जमा में खाली पलानी रखे भर के जमीन बाँचि गईल बा |कहाँ से करजा लउटावस भिरगु बाबा ?
आ एही बात पर रास बिहारी के लइका उनका के दू तमेचा मार देहले रहे बीच चौराहा पर | भिरगु बाबा गरीब रहलेहन बाकिर इज्जतदार | सोचले जे-- का लंगा के मुँहे लागे के हा |फरियावता पंचाईत करी |इज्जतदार बाम्हन के मुंह पर तमेचा गलत बात बा | रासबिहारी के लइका के गोड़ ध के माफ़ी मांगे के परी |बाकिर भिरगु बाबा के पहिला बेर लागल जे लोग सत्त-असत पर बिचार ना क के रुपिया पैसा पर ढेर बिचार करत बा | केहु हूँ हाँ नइखे करत | सब लोग चुप चाप बा | आ रासबिहारी के लइका कहत बा जे हमार उधारी लौटा देस हम माफ़ी मांग लेब |

पंडीजी लोग के मुंह ताकत रहले | जब केहु उनकर पक्ष ना लिहल त कहले जे हमारा लगे पैसा त नइखे बाकिर पलानी वाला जमीन हम तोरा नांवे लिख देम | तुरते कागज आईल आ बाबा तुरते साइन करि देहले |ओकरा बाद भरल सभा में बाबा के गोड़ ध के रासबिहारी के लइका माफ़ी मंगलस ---बाबा हमारा से गलती हो गईल मांफ करि दिंहिं | आ भिरगु बाबा परम प्रसन्न दुनू हाथ उठा के आशीर्वाद देहले --- विजयी होखा बेटा , यश मिलो | अपना तमेचा के बदला पंडीजी ले लेहले | सब लोग अपना अपना घरे चल गईल | जाते-जाते रासबिहारी के लईका पंडीजी से कहि गईल -- काल्ह बिहाने लेक पलानी खाली हो जाये के चाहीं , ना त घर में से घींच के बाहर करि देम |
हम रहेम कहाँ हो ? भिरगु बाबा के काठी मारि देहले रहे |
आ अजु भिरगु बाबा के देहि काठ हो गईल बा |उ अपना मेहरारू संघे माहुर खा लेहले बाड़े | लोग फूंके के काम में लागल बा | डर सबका मन में बा |बरहम पिशाच के |आ कि अपना मन के पिशाच के ? जवन छुपे छुपे भिरगु बाबा के जान ले लेहलस ? रासबिहारी के लइका जवन उनका के कहले रहे जे हमारा मुड़ी पर ना नु रहबा आजु कान्हा पर ढ़ो के ले जाता | अब उनकर पलानी के लगे उनकर किरिया करम होइ |ओहिजा मंदिर बनी |
समोसे-समोसे ,दस के चार समोसे
लय में चिल्लाते हुए ,
धनिये लहसुन की चटनी की महक
जनरल डिब्बे में फैलाते हुए ,
एक वेंडर बेंच रहा था समोसे
भटनी जंक्शन पर |
भूख तो थी नहीं
(घर से खाकर चला था)
पर अविवेकी उपभोक्ता जो हूँ
ले ही लिया पांच के दो |
(गमकती हुयी चटनी का लोभ )
परन्तु ,हुआ क्षोभ-
मिर्च ज्यादा थी समोसे में |
और पेट ख़राब होने का डर |
इसलिए समोसा -
खिड़की से बाहरटरका दिया |
समोसे के लिए
थी मेरी ऋणात्मक सीमांत उपयोगिता |
सामने की सीट पर थे एक दम्पति |
मरियल बीबी ; दुबला पति |
तीन बच्चे भी थे उनके इर्द गिर्द -
समोसे के लिए चिल्लाने लगे |
दस के चार खरीदे गए समोसे तो
छीना झपटी मचाने लगे |
मेरे अर्थशास्त्र ने गणना किया
एक-एक तीन बच्चे पाएंगे,
शेष एक में पति पत्नी खाएंगे |
जिसकी जितनी सीमांत उपयोगिता
उतने ही समोसे दिए जायेंगे |
पर माँ ने दो समोसे अलग किया ;
एक कागज पर मसल दिया |
इन दो समोसों में से तीनों बच्चों को
बराबर हिस्से दिए गए |
शेष दो समोसे बाद में खाने के लिए
झोले में रख दिए गए |
अर्थशास्त्र गलत साबित हुआ
फिर एक बार ; हमेशा की तरह |
 माने के त हम अपना के बड़का हिम्मती मानीला , बाकिर लरिकाईं में हमारा भूत से बहुते डर लागे |भूत के आतंक हमारा मन में एतना रहे जे, हम अन्हारा में गईला से डेरायीं |भूत के डर से हम बिछावना पर पेशाब करि देत रहलीं |भूत के हम देखले त ना रहनीं बाकिर कहाँ दूनी से हमारा मन में आ गईल रहे जे बड़का-बड़का मुंह--हाथ-गोड वाला आदमीं भूत होला | भूत कछुवो करी सकत बा | अन्हारा में पायी त लईकन के धs के ले जाई ,आ हाथ गोड काट दिही |एही से रात में सुतला के बेर हम कवनो न कवनो लाईट जरवाईए के सूती |
बाकिर एक बेरी भूत दिन के अंजोरा में आ गयिल | हम इस्कूल से घरे पैदल आवत रहनीं त कुछु लोग इकठा होके घूरा पर कुछु जरावत रहेलोग |पुछला पर पता लागल जे फलनवाँ मर गईल बाड़े , उनका के फूँकल जाता |मरल, फूँकल हमरा खातिर नया बात रहे | ढेर पुछला पर पता चलल जे ,लोग मर के भूत बन जाला | अब मोटा-मोटी आईडिया हो गईल ,जे भूत भूत काs होला | हम बुझानी जे, आदमी जेतना बलवान बा ,ओतने नु बलवान भूत होई | बाकिर जवाब मिलल जे ना भूत हवा-बेयार लेखन होला, एहिसे हर जगहे मिल जाला |आ चोरी छुपे काम करेला एहिसे ढेर बलवान होला | मान ल जे , तहरा के केहु पीछे से धकिया देहल ,आ उ लउकत नईखे |त केतनो बचबs बाबू बाकिर ढिमला जईबा |तब हमर समझ में आ गईल जे जेतना चोरी छुपे काम होता उ भूत करत बा | कुछु दिन पहिले जवन सुदामा के पुआरा चोरा ले गईल , उ भूते रहे |नेताजी के जे गोली मरले रहे आ लउकल ना , उ भूते रहे | अब भूत से अधिका डर लगे लागल | अब त उ दिन के अंजोरा में आ सकत बा ,एही से हम हमेशा साथी संघतिया लोग के साथे इस्कूल से आईं-जाईं |हम बूझत रहनी जे भूत कबो संघतिया लोग के सामने हमारा के ना उठा पायी | कबो उठाईयो ली त लोग हाला कs दी, आ हम बाँचि जाएम |
फेन एक दिन हमारा एकजना संघतिया के भूत धs लेहलस |कवन दूनी फेड पर उल्टा लटके वाला भूत रहे | ढेर कुल्हि ओझा गुनी से झरवावल गईल ,एगो खस्सी कटाईल तब जाके भूत भागल |अब त हमारा भरी शंका धs लेहलस | अब त साथी संघतिया के बीचो बीच रहला से भी भूत से नईखीं बांच सकत |अब भूत अन्हार में, अंजोर में ,आदमी में ,जंतु में कहीं हो सकेला |हमार डर बढ़त गईल | कबो हमारा बुझाऊ जे एगो भूत हमारा पीछे पीछे चलत बा | ओकरा मौका नईखे मिलत ना त उ अबले हमर हाथ गोड काट देहले रहित |कबो हमारा बुझाऊ जे हमारा कनवा के जरी आ के भूतवा ठठा के हँसत बा | जे भागs ना , तू केतना भगबाs ? बुझाता जे हम भागत जात बानी , आ उ पिठियावले जाता | जेहि तारे मुसवा के मुवावे से पहिले बिलरिया ओहनी से खेलेलीसन; ओहि तरे भूतवा हमारा से खेलत बा |पिछला साल हमर जवन रूपया भुला गईल रहे , उ भुतवे चोरवले बा | हमारा पट्टिदारन से मिल के उहे हमारा के केस मुकदमा में फसवले बा |बुझाता जे भूतवा हमर खेत चौपट करि दी | परसों यूरिया छिंटाले रहनी , कुल्हि गेंहू जरी गईल बा |भूतवा बेयार बहा के बरखा होखे से रोक देहले बा |काल्हि रात खान हमर भौजाई से खुसुर-पुसुर बतियावत रहुवे , एही से बिहाने बेमतलब के उ हमारा से झगड़ा क लेहलीहा |आ देखाs, ई करिका साँढ़ हमरा के मारे आवत बा , बुझाता जे भुतवे एकर मति घुमवले होइ |रेs ई भूतवा त हमरा के घेर-घार के मुवा दी |देख होsss , हमार ब्लड प्रेशर बढ़ गईल बा | आरेssss, बुझाता जे ई हमार नट्टी दबावत बा |आरेs दौड़ा लोगिन होssssss | आकि तहरो लोगिन पर भूत चढ़ गईल बा ?......? आकि तहरो लोगिन भूत से डेरात बाड़ा लोगिन ?  
पत्नी के प्रति
अभी कुछ ही दिन हुए
हमारी शादी को ,
जब एक ही गाँठ से
बंधे थे हम दोनों |
मैं बारात लेकर गया था
तुम्हारे घर |
और लगभग
अपहरण करता हुआ
लाया था तुम्हे
अपने घर |
फिर खोल दी गयी गांठे
कि मैं निस्सीम आकाश में
उड़ सकूँ ; कर सकूँ
जो भी करना है मुझे |
पर शायद ठीक से
गिरह खुली नहीं थी ,
क्योंकि आज भी
महसूस करता हूँ -
एक खिंचाव
तुम्हारी ओर |
शायद यही प्रेम है
जो आरक्षित रहेगा
सिर्फ तुम्हारे लिए |
आज कैलाश पर्वत पर अलगे नज़ारा बा | शिवजी एगो पहाड़ पर मुड़ी टिका के आसमान निहारत बानी | हाव-भाव से बुझाता जे बड़ा दुखी बानी | महशिवरात्रि के दिन हs , आज समूचा बरमांड में शिवजी के जय जयकार होला | आज के दिन शिवजी काहें दुखी बानी ? कवनो गहिर बात बा |
अर्धांगिनी पार्वतीजी पूजा के तइयारी करत बाड़ी ; बाकिर शिव जी के मन के बात नईखी बुझ पावत |सोलहो सिंगार कईले माँ पार्वती भांग के गिलास शिव जी के थमावत बाड़ी , तनी मुस्किया के… |बाकिर शिवजी मुड़ी घुमा के देखतो नईखीं ; भांग के गिलास टरका देत बानी | ई का भईल ? “तवगुणनिर्जीदासोअहम्” कहेवाला स्वामी हमारा से आ अपना प्रिय पेय से एतना विरक्त काहें ? कवनो गहिर बात बा | आजुलेक स्वामीं के सगरो गुपुत रहस्य ना जान पवली पार्वती माता |
स्वामिभक्त बंसहा बैल कौड़ी-जड़ल गुदरी ओढले शिवजी के लगे खड़ा हो गईले ; उछाह में | आजु के दिने भोलबाबा नंदी पर विराजमान होके तीनो लोक के भ्रमण करेनी , लोग के चढ़ावा स्वीकार करेनी आ आशीर्वाद देनी |एहिमें लोग नंदी के भी तनी परसादी चढ़ा देला |शिवजी के ध्यान खींचे खातिर गर्दन में बान्हल घंटी के हिलवले......एक बेर ...दू बेर |शिवजी के अंतरिक्ष में तकला पर कवनो फरक ना पड़ल | बुईझ गईले जे कवनो गहिर बात बा |
पुत्र गणेश जी मूंस के सवारी करत ,लड्डू खात सीधे अपना महतारी के लगे घुस गईले | एहुतरे जबसे बाबूजी से झगड़ा भईल आ मुड़ी कटा गईल ,तबसे बाबूजी के पंजरा जाये से डेराले | एहतरे आज बाबूजी के सोच में डूबल देख के बुझ गईलेहान जे कवनो गहिर बात बा | फरके रहला में भलाई बा |
“ नारायण ,नारायण” कहत नारद जी जैसेहीं कैलाश पर अईले उनका मन पड़ल कि आज शिवरात्रि हs | तुरंते “नमः शिवाय -नमः शिवाय” बोले लगले | शिवजी के तन्द्रा टूटल |
“नारद जी , आज नमः शिवाय काहें हो ?”
“भोलेबाबा, आज शिवरात्रि हा | सगरो दुनिया नमः शिवाय हो गईल बा त हम काहें ना ?बाकिर रउआ घर में उदासी काहे बा ?”
“कुछुओ ना |” - आँख के लोर सम्हारत शिवजी पूछ देहनी ---- “कार्तिकेय के कवनो पता ठेकान मालूम भईल हा , नारद जी ? जबसे घर छोड़ के गईल बाड़े हमरा कवनो खोज खबर नईखे मिलत |”
“एकदम चउकस !” --- नारद जी जवाब देहले --- “कार्तिकेय बाबू आजकल मल्लिकार्जुन पर्वत पर डेरा जमा लेहले बाड़े | तमाम दखिन के लोग उनका के आपन मालिक मान लेहले बा | इन्द्र के बेटी देवसेना से बियाह क के मजे में बाड़े राउर बड़का लईका |चिंता के कवनो बात नईखे |अच्छा हमरा के चले के आज्ञा दिहिं |”
नारद जी “नारायण-नारायण” कहत प्रस्थान क गईले |
‘‘नारद जी घरियो छन खातिर एक जगहे ना टिकेले | तनी रुकते तs बड़का लइकवा के अउरी कुल्हि हाल चाल सवाच लीति |” --शंकर जी के ई सोचला में उनकर अंदर के बाप के दरद साफ़ छलकत रहे |
कहे खातिर शंकर जी के दू गो लईका , बात मानेवाली मेहरारू , छोटमोट नौकर-चाकर आ गृहस्थी----सब कुछु रहे |बाकिर बड़का लईका माई बाप से खिसिया के अलगा रहे लागल | शिवजी के पुरान बात इयाद परि गईल |
हेतिचुकी बात लमहर हो गईल आ शिवजी के गरदन के फँसरी बन गईल | हाराहुशी में दुनू लईका लड़ पडलेसन जे केकर पहिले पूजा होइ |कायदे से त जेठ लईका के ई अधिकार मिले के चाही , बाकिर छोटका रहे माई के दुलरुआ | आ शंकरो जी कवनो पक्षपात में ना पड़े के चहनी | रास्ता निकालल गईल जे पहिले ओकर पूजा होइ जे धरती के चक्कर पहिले लगा के आई | कार्तिकेय बबुआ बड़ा हुशियार रहे | चट देना अपना असवारी पर बईठल आ धरती के चक्कर लगावे निकल गईल | आखिर काबिल सवांग रहे उ | गणेश बबुआ भारी देह - आ मूंस सवारी | बुझ गईले जे अब हारेवाला बानी | एही से दोसर जुगुति निकलले | आ खाली माई बाबू के प्रदक्षिणा कर के पहिले पूजे के वरदान ले लेहले | तब जाके कहीं हारल-पाछल बड़का बबुआ आयिल | एने फैसला हो गईल रहे | ई सुन के ओकरा बड़ा दुःख भईल | न्याय खातिर अरदास कईलस |
फेनु शिवजी सोचे लगनी | “मन में दुविधा ओहु बेरा रहे | न्याय के स्पष्ट परिभासा के अनुसार बात गलत रहे | अगर जुगुति से फरियावता होखे के रहल हा त उ खड़े खाड़ी प्रदक्षिणा क के जीत गईल रहित | आखिर एहुंगा त प्रदक्षिणा के नियम शास्त्र में बतावल गईल बा | एगो लईका के पक्ष खातिर दोसर लईका के हक़ मारल साफ़ लउकत रहे | बाकिर हम कुछुओ ना करि पवनीं | कुछु पार्वतीजी के तरफ से दवाब रहे आ कुछु बिधना के इहे मंजूर रहे |बाकिर अफ़सोस एह बात के होला जे जब बड़का लईका घर छोड़ के जाये लागल त हम दाढ़ी ध के निहोरा काहें ना कईनी ? ….. मना काहें ना लेहनी ? …….काहें ना अँकवारी में भर के रोवे लगनी ?..........जे ना बबुआ जवन भईल तवन भईल बाकिर तहरा के अलगा ना जाये देम |……. काहे ना ओकर गोड़ छान लेहनी ? ………..आखिर अपने जमलका नु रहे ?"
शिवजी के भीतर के बाप जाग जाला हर शिवरात्रि में |
“ एतना कुल्हि मर-मिठाई में बड़को के नु हिस्सा बाटे |”
बात पिछला साल के ह |का जाने कहाँ दुनी से हमरा मन में बिचार आईल कि हमरा महापुरुष बने के चाहीं | जेतना कुल्हि किताब पढवाल गईल बा , जेतना ज्ञान के चर्चा ई दुनिया में भईल बा ; कुल्हि बात के इहे मतलब बा कि सब केहु के महापुरुष बने के चाहीं | ना त , महापुरुषों कि जीवनी -- किताब काहें पढ़ावल जाइत ? कवनों भर्तृ हरी कही गईल बाड़े कि जे महापुरष नईखे बनत , उ ई दुनिया में गदहा नियर बा |भले उ घास ना खाके ,चाउर-गेंहू खाता |त मोट बात ई कि महापुरुष बने के चाही ;आ सबका बने के चाहीं |इहे बात सोच बिचार के हम महापुरुष बने खातिर किरिया खइनीं |
अब बात आ गईल जे महापुरुष बने खातिर कईल का जाओ ? बिना कईले त ई दुनिया में भीख ले ना भेंटाला | ढेर सोच बिचार के हम फैसला कईनी जे एगो सोसाइटी बनावल जाऊ | काहें कि सभ महापुरुष लोग कवनो ना कवनो सभा भा सोसाइटी से जुडल रहे लोग | एही से हम चट देना एगो सोसाइटी बना लेहनी - महापुरुष बनाओ सोसाइटी | हमारा ई ना बुझाला जे सोसाइटी के नाम सोंस से काहें शुरू होला |सोंस त एगो मछर के नाव ह , जवन काटेलेसन त बुझाला जे खून के साथे परानो चूस लिहेंसन | जाये दिहिं, जे नाव धईले होइ उ कवनो समानता देखिये के नु धईले होइ ? एने हमार सोसाइटी तैयार त हो गईल बाकिर एहिमे अउरी लोग के जोडलो त जरूरी रहे | हम ढेर हाथ-गोड़ ध के कुछु लोग के जोवाइन करवनी | केहु के अध्यछ त केहु के सभापति बनावे के दिलासा देहनीं | हम खाली संजोजक बनि के रहि गईनी | बाकिर सब लोग से हम सकरववनीं जे हमर भाषण सुनला के बाद हमारा के महापुरुष कहे के परी | सभ लोग के माला पहिना के , बढ़िया खातिर बात निबहा के ,कुल्हि लोग के आउंज- गाउँज भासन सुनि के , कुल्हि लोग के झूठ साँच में मूड़ी डोला के जब हम हारि गईनी तब हम भासन देबे खातिर खड़ा भईनी | बाकिर ई का ? कुल्हि लोग घसक लिहल | माने हम अकेले बाँच गईनी ,अपना के महापुरुष कहे खातिर | पहिला परयास एकदमें असफल हो गईल |
बाकिर उ पहलवान कवन जवन घाव लागला पर कलपे लागे , अगिला दांव ना सीखो |चलीं , अब दोसर परयास कईल जाऊ | नया बेयार बहल रहे सफाई अभियान के | हमहूँ सोचनी जे एगो कर्मयोगी खातिर एकरा से बड़हन कवनो अवसर नईखे | अब हमरा के केहु महापुरुष बनला से नईखे रोक सकत | हम अकेलहीं नरदोह आ नाबदान के सफाई करे लगनी | हमार हित-मित्र लोग हमरा के छूतीहर कहे लागल | समाज से बायकाट के धमकी दिहल लोग | बाकिर हम सोच लेहले रहनीं जे भले हम मुड़ी कटा देंगे बाकिर निहुराएँगे नहीं |मर्द के बच्चा हैं ,महापुरुष बनिए के रहेंगे |
बाकिर पर-सुक्खे दुखी रहे वाला लोग के हमरा के महापुरुष बनत देखल नीक ना लागल | उ लोग जा के ओह जात केलोग के उकसा दिहल जवना के पुश्तैनी व्यवसाय नाली साफ कईल हा | का जे बिन्हाचल बाबा तहनी के पेट पर लात मरत बाड़े ; तहनी के रोजिगार खा जइहें |बस, ओकनी के कुल्हि टोला , मरद -जनाना ,बाल-बच्चा आके हमरा दुआर पर महाभारत ठान देहलेसन | हम समझावे के कोशिश कईनी जे संविधान हमरा के कइसनो काम करे के अधिकार देता | आ सफाई कईल खाली कवनो जात के बपौती ना हा | जबाब मिलल जे संबिधान ओहि लोग के जात के केहु बनवले रहे , जे आरक्षण के साथे सफाई के काम ओहि लोग खातिर रिजरब का देहल | जेह तरे पंडित लोग पंडिताई बना के पंडिताई अपने खातिर रिजरब क लिहल लोग | हम केतनो समझावे के कोशिश करीं बाकिर उ मानेके तईय्यार न भइलेसन | लोग बढ़ा-चढ़ा दिहले रहे | हम केतनो माताये -बहनें करते रही गईनी , ओकनी के महतारी -बहिन पर उतर गईलेसन |हम बुझ गईनी जे यहां न चलिहें राउर माया | हम हाथ जोरि के माफ़ी मांगनी जे फेन-फेन हम एहि तरीका से महापुरुष बने के कोशिश ना करेम | आ साफ- सफाई ओहि लोग से कराएब |भले ओह लोग के ना आईला पर घर सूअर के खोभार हो जाऊ | हमार दुसरको परयास असफल हो गईल |
अब हम सोचनी जे अब छोट मोट काम करि के महान बनल जाओ | जैसे अस्पताल में रोगी सेवा कईल ,झगरा के फरियावता कईल ,ढ़ेरी कुल्हि काम रहे जवना के कईला से आदमी महापुरुष बनि जाई आ दोसरा के आँखि में ना खटकी | हमार अधिके समय एहि कुल्हि काम में खरचा हो जाऊ | घर के कुल्हि काम हमार शिरिमति जी के करे के परि जाऊ | खाली हमरा मन में इहे रहो जे एक बेर , खाली एक बेर केहु हमरा के महापुरुष कही देऊ ; हमार सकल परयास सवारथ हो जाई | बिना तियाग के , कुछुओ ना मिलेला |
बाकिर सबसे अधिक तियाग त हमार घरनी करत रहली | गाई के दाना-पानी देहला से लेके बाल-बुतरू सरिहरला लेक | सगरो काम बेचारी बिना मुंह खोलले करि देस | आ रात बिरात घरे आईला पर हमरा के जवन भोजन पानी बनवले रहस , पिरेम से जीमा देस | फेनु बिहाने उठी के हम महापुरुष बने के फेरा में लागिये जाइ |
एहि बीच में एक दिन घरे आईला पर हम पुच्छनी जे का हो ? आज का बनल बा ?
‘ कुछऊ ना’ - उनकर जबाब रहे |
हम पूछनी जे काहें ?
उ कहली जे ढेर दिन से चाउर ओरा गईल बा आ गेंहू पिसाईले नइखे ?
हमरा इयाद परल जे चार दिन पहिले उ हमरा से गेंहू पिसवावे के कहले रहली |बाकिर हम महापुरुष बने के चक्कर में ई बात भुला गईल रहनीं | तबो, बड़ा लक्ष्य खातिर छोटा तियाग त करहिं के परी | हम चट देना जबाब देहनी जे का भईल |आटा नईखे , त गेंहू के भात बना लेहले रहितु | अब सम्बाद में अल्पविराम हो गईल बुझाइल जे शिरिमति जी कुछु सोचत बाड़ी | उ हमरा लगे आईली | कहली जे रउआ परुष ना ....... महापुरुष हई | चरनवा कहाँ बा राउर ? तनी छुए दिहिं | जवन भात गाई भैंस के खाए के दिहल जाला , अब हमार नसीब उहे खाए के हो गईल बा I बढ़नी मारो एह महापुरुष बनला के |
लिहिं, एतना दिन से हम महापुरुष कहाये खातिर खखुआइल रहनीं हा | अब तs हमार घरनिये महापुरुष कही देहली | बाकिर हमार बुझाइल नाs , जे हम महापुरुष बनला खातिर हँसी कि पुरुष पद से पदावनति खातिर रोईं | ओहि रात , हम भुखले रहि गईनी आ रात भर पुरुष आ महापुरुष के बीच में लड़ाई चलते रहि गईल | केहु कहे जे हम बड़ ,तs हम बड़ |
फेन बिहान भईल | किरिन उगल | अंजोर में सब साफ-साफ लउके लागल | हमहूँ फैसला कईनी जे हमरा के अउरी लोग त महापुरुष कही ना ; आ शिरिमति जी हमरा के पुरुष कहस -इहे हमरा खातिर जियादा जरूरी बा | एहि से हम निखालिस पुरुष बने के किरिया खईनी | आ महापुरुष बने के आशा सिकहर टाँग देहनीं | अब हम पुरुष बने के परयास करत बानी | गेंहू पिसवावत बानी | लईका खेलावत बानी |

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

समोसे-समोसे ,दस के चार समोसे
लय में चिल्लाते हुए ,
धनिये लहसुन की चटनी की महक
जनरल डिब्बे में फैलाते हुए ,
एक वेंडर बेंच रहा था समोसे
भटनी जंक्शन पर |
भूख तो थी नहीं
(घर से खाकर चला था)
पर अविवेकी उपभोक्ता जो हूँ
ले ही लिया पांच के दो |
(गमकती हुयी चटनी का लोभ )
परन्तु ,हुआ क्षोभ-
मिर्च ज्यादा थी समोसे में |
और पेट ख़राब होने का डर |
इसलिए समोसा -
खिड़की से बाहरटरका दिया |
समोसे के लिए
थी मेरी ऋणात्मक सीमांत उपयोगिता |
सामने की सीट पर थे एक दम्पति |
मरियल बीबी ; दुबला पति |
तीन बच्चे भी थे उनके इर्द गिर्द -
समोसे के लिए चिल्लाने लगे |
दस के चार खरीदे गए समोसे तो
छीना झपटी मचाने लगे |
मेरे अर्थशास्त्र ने गणना किया
एक-एक तीन बच्चे पाएंगे,
शेष एक में पति पत्नी खाएंगे |
जिसकी जितनी सीमांत उपयोगिता
उतने ही समोसे दिए जायेंगे |
पर माँ ने दो समोसे अलग किया ;
एक कागज पर मसल दिया |
इन दो समोसों में से तीनों बच्चों को
बराबर हिस्से दिए गए |
शेष दो समोसे बाद में खाने के लिए
झोले में रख दिए गए |
अर्थशास्त्र गलत साबित हुआ
फिर एक बार ; हमेशा की तरह |
भूत के डर
माने के त हम अपना के बड़का हिम्मती मानीला , बाकिर लरिकाईं में हमारा भूत से बहुते डर लागे |भूत के आतंक हमारा मन में एतना रहे जे, हम अन्हारा में गईला से डेरायीं |भूत के डर से हम बिछावना पर पेशाब करि देत रहलीं |भूत के हम देखले त ना रहनीं बाकिर कहाँ दूनी से हमारा मन में आ गईल रहे जे बड़का-बड़का मुंह--हाथ-गोड वाला आदमीं भूत होला | भूत कछुवो करी सकत बा | अन्हारा में पायी त लईकन के धs के ले जाई ,आ हाथ गोड काट दिही |एही से रात में सुतला के बेर हम कवनो न कवनो लाईट जरवाईए के सूती |
बाकिर एक बेरी भूत दिन के अंजोरा में आ गयिल | हम इस्कूल से घरे पैदल आवत रहनीं त कुछु लोग इकठा होके घूरा पर कुछु जरावत रहेलोग |पुछला पर पता लागल जे फलनवाँ मर गईल बाड़े , उनका के फूँकल जाता |मरल, फूँकल हमरा खातिर नया बात रहे | ढेर पुछला पर पता चलल जे ,लोग मर के भूत बन जाला | अब मोटा-मोटी आईडिया हो गईल ,जे भूत भूत काs होला | हम बुझानी जे, आदमी जेतना बलवान बा ,ओतने नु बलवान भूत होई | बाकिर जवाब मिलल जे ना भूत हवा-बेयार लेखन होला, एहिसे हर जगहे मिल जाला |आ चोरी छुपे काम करेला एहिसे ढेर बलवान होला | मान ल जे , तहरा के केहु पीछे से धकिया देहल ,आ उ लउकत नईखे |त केतनो बचबs बाबू बाकिर ढिमला जईबा |तब हमर समझ में आ गईल जे जेतना चोरी छुपे काम होता उ भूत करत बा | कुछु दिन पहिले जवन सुदामा के पुआरा चोरा ले गईल , उ भूते रहे |नेताजी के जे गोली मरले रहे आ लउकल ना , उ भूते रहे | अब भूत से अधिका डर लगे लागल | अब त उ दिन के अंजोरा में आ सकत बा ,एही से हम हमेशा साथी संघतिया लोग के साथे इस्कूल से आईं-जाईं |हम बूझत रहनी जे भूत कबो संघतिया लोग के सामने हमारा के ना उठा पायी | कबो उठाईयो ली त लोग हाला कs दी, आ हम बाँचि जाएम |
फेन एक दिन हमारा एकजना संघतिया के भूत धs लेहलस |कवन दूनी फेड पर उल्टा लटके वाला भूत रहे | ढेर कुल्हि ओझा गुनी से झरवावल गईल ,एगो खस्सी कटाईल तब जाके भूत भागल |अब त हमारा भरी शंका धs लेहलस | अब त साथी संघतिया के बीचो बीच रहला से भी भूत से नईखीं बांच सकत |अब भूत अन्हार में, अंजोर में ,आदमी में ,जंतु में कहीं हो सकेला |हमार डर बढ़त गईल | कबो हमारा बुझाऊ जे एगो भूत हमारा पीछे पीछे चलत बा | ओकरा मौका नईखे मिलत ना त उ अबले हमर हाथ गोड काट देहले रहित |कबो हमारा बुझाऊ जे हमारा कनवा के जरी आ के भूतवा ठठा के हँसत बा | जे भागs ना , तू केतना भगबाs ? बुझाता जे हम भागत जात बानी , आ उ पिठियावले जाता | जेहि तारे मुसवा के मुवावे से पहिले बिलरिया ओहनी से खेलेलीसन; ओहि तरे भूतवा हमारा से खेलत बा |पिछला साल हमर जवन रूपया भुला गईल रहे , उ भुतवे चोरवले बा | हमारा पट्टिदारन से मिल के उहे हमारा के केस मुकदमा में फसवले बा |बुझाता जे भूतवा हमर खेत चौपट करि दी | परसों यूरिया छिंटाले रहनी , कुल्हि गेंहू जरी गईल बा |भूतवा बेयार बहा के बरखा होखे से रोक देहले बा |काल्हि रात खान हमर भौजाई से खुसुर-पुसुर बतियावत रहुवे , एही से बिहाने बेमतलब के उ हमारा से झगड़ा क लेहलीहा |आ देखाs, ई करिका साँढ़ हमरा के मारे आवत बा , बुझाता जे भुतवे एकर मति घुमवले होइ |रेs ई भूतवा त हमरा के घेर-घार के मुवा दी |देख होsss , हमार ब्लड प्रेशर बढ़ गईल बा | आरेssss, बुझाता जे ई हमार नट्टी दबावत बा |आरेs दौड़ा लोगिन होssssss | आकि तहरो लोगिन पर भूत चढ़ गईल बा ?......? आकि तहरो लोगिन भूत से डेरात बाड़ा लोगिन ?

पत्नी के प्रति
अभी कुछ ही दिन हुए
हमारी शादी को ,
जब एक ही गाँठ से
बंधे थे हम दोनों |
मैं बारात लेकर गया था
तुम्हारे घर |
और लगभग
अपहरण करता हुआ
लाया था तुम्हे
अपने घर |
फिर खोल दी गयी गांठे
कि मैं निस्सीम आकाश में
उड़ सकूँ ; कर सकूँ
जो भी करना है मुझे |
पर शायद ठीक से
गिरह खुली नहीं थी ,
क्योंकि आज भी
महसूस करता हूँ -
एक खिंचाव
तुम्हारी ओर |
शायद यही प्रेम है
जो आरक्षित रहेगा
सिर्फ तुम्हारे लिए |

रविवार, 11 जनवरी 2015

हम त बोलनी ढेर अब रउआ बोलीं
बोलीं , बोल के कान में मिसरी घोरीं |

नेह बा रउआ खातिर हमरा मन में
हमरा बदे रउआ मन में का बा , बोलीं  |

ढेर दिन से हम अकेलहीं बोलत बानी
रउओ त आपन दिल के राज खोलीं  |

प्रीत हम कइनीं,निबहनी,बोल देहनीं
मत रउआ मुड़ी झुका माटी निखोरीं |

मन ई संसय के भंवर में डूबल जाता
रउआ अब हं भा ना कुछऊ त बोलीं |

हम त बोलनी  ढेर अब रउआ बोलीं |     
भारी पाप….. महापराध…….. बाम्हन के मौत | दोसी बा सगरो गांव | अब केहु चैन से ना रहि पायी | गांव में कुकुर फेंकरिहेंसन; सियार बोलिहेंसन |बाम्हन के मउअत भईल बा ……….|ना ई हतिया हा ,कुल्हि गांव मिल के कईले बा |
काल्ह दुपहरिये में पंचाईत बइठल रहे | एक ओर भिरगु बाबा ; दोसर ओर रासबिहारी के लईका |भिरगु बाबा अपना माई के कजिया में करजा लेहले रहले | आजु लेक ना लौटवले | लौटावास कहाँ से ? भिरगु बाबा खानदानी भिखारी | घरे-घरे सीधा-चाउर , दान-दच्छिना माँगेले | ओहि से गरज चल जाला | घर में उ आ उनकर मेहरारू दू बेकत | एगो लईका रहे , पता ना कवन बेमारी से खतम हो गईल | ओकरो दवा -बीरो में रासबिहारी से करजा लेहले रहले भिरगु बाबा | बाकिर आपने पलानी के पीछे के खेत रास बिहारी के नावे लिख देहले | अब जर-जमा में खाली पलानी रखे भर के जमीन बाँचि गईल बा |कहाँ से करजा लउटावस भिरगु बाबा ?
आ एही बात पर रास बिहारी के लइका उनका के दू तमेचा मार देहले रहे बीच चौराहा पर | भिरगु बाबा गरीब रहलेहन बाकिर इज्जतदार | सोचले जे-- का लंगा के मुँहे लागे के हा |फरियावता पंचाईत करी |इज्जतदार बाम्हन के मुंह पर तमेचा गलत बात बा | रासबिहारी के लइका के गोड़ ध के माफ़ी मांगे के परी |बाकिर भिरगु बाबा के पहिला बेर लागल जे लोग सत्त-असत पर बिचार ना क के रुपिया पैसा पर ढेर बिचार करत बा | केहु हूँ हाँ नइखे करत | सब लोग चुप चाप बा | आ रासबिहारी के लइका कहत बा जे हमार उधारी लौटा देस हम माफ़ी मांग लेब |
पंडीजी लोग के मुंह ताकत रहले | जब केहु उनकर पक्ष ना लिहल त कहले जे हमारा लगे पैसा त नइखे बाकिर पलानी वाला जमीन हम तोरा नांवे लिख देम | तुरते कागज आईल आ बाबा तुरते साइन करि देहले |ओकरा बाद भरल सभा में बाबा के गोड़ ध के रासबिहारी के लइका माफ़ी मंगलस ---बाबा हमारा से गलती हो गईल मांफ करि दिंहिं | आ भिरगु बाबा परम प्रसन्न दुनू हाथ उठा के आशीर्वाद देहले --- विजयी होखा बेटा , यश मिलो | अपना तमेचा के बदला पंडीजी ले लेहले | सब लोग अपना अपना घरे चल गईल | जाते-जाते रासबिहारी के लईका पंडीजी से कहि गईल -- काल्ह बिहाने लेक पलानी खाली हो जाये के चाहीं , ना त घर में से घींच के बाहर करि देम |
हम रहेम कहाँ हो ? भिरगु बाबा के काठी मारि देहले रहे |
आ अजु भिरगु बाबा के देहि काठ हो गईल बा |उ अपना मेहरारू संघे माहुर खा लेहले बाड़े | लोग फूंके के काम में लागल बा | डर सबका मन में बा |बरहम पिशाच के |आ कि अपना मन के पिशाच के ? जवन छुपे छुपे भिरगु बाबा के जान ले लेहलस ? रासबिहारी के लइका जवन उनका के कहले रहे जे हमारा मुड़ी पर ना नु रहबा आजु कान्हा पर ढ़ो के ले जाता | अब उनकर पलानी के लगे उनकर किरिया करम होइ |ओहिजा मंदिर बनी |

बुधवार, 7 जनवरी 2015

ए  हवा ! जनि तू हमरा के डोलावSS |
 मत छुवS तू देह, धोती मत हिलावSS |
आज हम संसार से परेशान बानी
 सुत गईल बा दर्द ओहिके मत जगावSS |
 प्रीत कईनी हम जहाँ :घात मिलल
 पीठ पर ना हाथ मिलल : लात मिलल
 दुश्मनों  से घटिया  रिश्ता - नात मिलल
 मत तू हमके प्रेम से आपन बोलावSS |
 ए हवा, जनि छुवS तू देह धोती मत हिलावSS |
 जे सटल लगे :आपन लाभ खातिर
 हं-में-हं कईल, अपना स्वार्थ खातिर
गरज पडला पर भईल  कबो ना हाज़िर
 मत तुहु एतना अब नजदीक आवSS |
 ए हवा, जनि छुवS तू देह धोती मत हिलावSS
 मन ह कुकुरपोंछी : ई ना  सुधरिहैं
भले आग में ई फतिंगा जरि के मरिहैं
फेनु से ई प्रीत करिहैं : फेनु से उफर परिहैं
देह के छूवलुS त अब जियरा में आवSS |

ए हवा,जनि छुवS तू देह धोती मत हिलावSS |
सब कुछ अपने आप हो जाला | कूकर में भात-दाल बन जाला | लंच खातिर चार गो परवठा बन जाला | जब लेक उनकर मरद नहा-धोआ के निकलेले , तब ले उनकर जूता-मोजा,शॉर्ट-पाईन्ट उनका लगे पहुँच जाला | चट देना चाय बन जाला | खा -पी के उनकर मरद डियूटी चल जाले | फेन शुरू होला घर के धोवाई-पोछाई, आपन नहान - धेयान ,पूजा-पाठ भोजन-छाजन | तब तनी टाइम मिलेला त देहि के सोझ क लेली , चाहे सीरियल के रिपीट देख लेली | एही बीच में आँचार के घाम लगावल, आ कुल्हि सियन-बिनन के काम निपटा देली |सब कुछु अपने आप हो जाला ; माने बिना बिशेष परयास के | रोज रोज एके गो चीझ ....जैसे कवनो मशीन आपन काम करत होखे |तले लेक साँझ हो जाला | आँचार के घर में रख देली |सोफ़ा के सरिहार देली | रिमोट के टेबुल पर ध देली;अब उनका मरद के घरे आवे के टाइम हो गईल बा |
रोज पांच बजे लेक चलि आवे ले | आज साढ़े पांच हो गईल | कहे ना आईले अबलेक ? जाम में फंस गईल होईहें | अच्छा तलेलेक दूध में चाहपत्ती आ चीनी मिला के रख देहली ,जे अइहें त चट देनी चाय बना दीहें |बुझाता जे केहु केवाड़ी ठकठकावत बा |आ गईले का ? आ धत तेरी के , केहु ना ह | एहिंगा कान बाजत रहेला | बाक़िर छव बज गईल | हे भगवान कवनो गड़बड़ी नईखे नु भईल ? ई मुआ फोनवो नईखे लागत | यह घरी ढेरकुल्हि बम ब्लास्ट के खबर सुने में आवेला | बाक़िर आज के समाचार में त कवनो खबर नईखे | समाचार चैनल लगा देहली , कि उ आवेले त पहिले समाचार देखेले | अब बालकनी में खड़ा हो के आपन मोटर सयकिल के आवाज चिन्हे लगली |लोग आवत जात त बा |… हो गईल होइ कवनो काम |… एह घरी ऑफिस वाला खून चूस लेत बड़ेसन ओभर ड्यूटी करा के | …अच्छा अइहें त हारल-खेदायिल नु आईहें |सोचली जे तनी चिउरा मुमफली भुज लेस …. चाय के साथे खाए खातिर | किचन में गईली |अबहिन भुजते रहली कि उनका मरद के आइला के आवाज सुनाई दिहल | सब कुछ छोड़ छाड़ के केवाड़ी खोले भगली | धक –धक……. आ गईले का ? जबले उ केवाड़ी खटखटावास ओकरा से पहिलहीं खोल देहली |
कहाँ रहनी हा एतना देर ?
अरे एक जाना गांव के भेंट गईल रहलाहान |
चाय बना दी ? पीएब ?
जरूरत त नईखे ; बना देबू त पी लेब | एतना कहि के उनकर मरद हाथ गोड़ धोवे चल जाले , आ उ किचन में चाय बनावे |
फेन सब कुछ अपने आप हो जाला | अपने आप चाय बन जाला |टिभी देखत उनकर मरद चाय पी लेले | उ किचन में डिनर बनावे चल जाली | जइसे कवनो मशीन होखे ......बिना परयास के काम करे......अपने आप.......रोज रोज | बाक़िर कराही में भुजे खातिर धईल चिउरा जर के खोंता हो जाला .......रोज रोज |
हंडिया - पतुकी - बटुली - खोरा
निकलल ढिंढ आ बबुआ कोरा
मरियल देंह आ माँगे सेनुर
मन पसंगा भर, मन -भर सबुर
बियहुति साड़ी में छप्पन पेवन
लड़िकयिएँ में बुढाईल जोबन
चूल्हा- चौकी बर्तन - बासन
छोड़ल-छाड़ल उनकर अगरासन
बाहरो- भितरो घरवो -दुअरोँ
सास- ससुर- देयादीन - देवरो
एतना सगरो के मलिकाइन
गरीब "टहलुआ "के मलिकाइन

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

बात पिछला साल के ह |का जाने कहाँ दुनी से हमरा मन में बिचार आईल कि हमरा महापुरुष बने के चाहीं | जेतना कुल्हि किताब पढवाल गईल बा , जेतना ज्ञान के चर्चा ई दुनिया में भईल बा ; कुल्हि बात के इहे मतलब बा कि सब केहु के महापुरुष बने के चाहीं | ना त , महापुरुषों कि जीवनी -- किताब काहें पढ़ावल जाइत ? कवनों भर्तृ हरी कही गईल बाड़े कि जे महापुरष नईखे बनत , उ ई दुनिया में गदहा नियर बा |भले उ घास ना खाके ,चाउर-गेंहू खाता |त मोट बात ई कि महापुरुष बने के चाही ;आ सबका बने के चाहीं |इहे बात सोच बिचार के हम महापुरुष बने खातिर किरिया खइनीं |
अब बात आ गईल जे महापुरुष बने खातिर कईल का जाओ ? बिना कईले त ई दुनिया में भीख ले ना भेंटाला | ढेर सोच बिचार के हम फैसला कईनी जे एगो सोसाइटी बनावल जाऊ | काहें कि सभ महापुरुष लोग कवनो ना कवनो सभा भा सोसाइटी से जुडल रहे लोग | एही से हम चट देना एगो सोसाइटी बना लेहनी - महापुरुष बनाओ सोसाइटी | हमारा ई ना बुझाला जे सोसाइटी के नाम सोंस से काहें शुरू होला |सोंस त एगो मछर के नाव ह , जवन काटेलेसन त बुझाला जे खून के साथे परानो चूस लिहेंसन | जाये दिहिं, जे नाव धईले होइ उ कवनो समानता देखिये के नु धईले होइ ? एने हमार सोसाइटी तैयार त हो गईल बाकिर एहिमे अउरी लोग के जोडलो त जरूरी रहे | हम ढेर हाथ-गोड़ ध के कुछु लोग के जोवाइन करवनी | केहु के अध्यछ त केहु के सभापति बनावे के दिलासा देहनीं | हम खाली संजोजक बनि के रहि गईनी | बाकिर सब लोग से हम सकरववनीं जे हमर भाषण सुनला के बाद हमारा के महापुरुष कहे के परी | सभ लोग के माला पहिना के , बढ़िया खातिर बात निबहा के ,कुल्हि लोग के आउंज- गाउँज भासन सुनि के , कुल्हि लोग के झूठ साँच में मूड़ी डोला के जब हम हारि गईनी तब हम भासन देबे खातिर खड़ा भईनी | बाकिर ई का ? कुल्हि लोग घसक लिहल | माने हम अकेले बाँच गईनी ,अपना के महापुरुष कहे खातिर | पहिला परयास एकदमें असफल हो गईल |
बाकिर उ पहलवान कवन जवन घाव लागला पर कलपे लागे , अगिला दांव ना सीखो |चलीं , अब दोसर परयास कईल जाऊ | नया बेयार बहल रहे सफाई अभियान के | हमहूँ सोचनी जे एगो कर्मयोगी खातिर एकरा से बड़हन कवनो अवसर नईखे | अब हमरा के केहु महापुरुष बनला से नईखे रोक सकत | हम अकेलहीं नरदोह आ नाबदान के सफाई करे लगनी | हमार हित-मित्र लोग हमरा के छूतीहर कहे लागल | समाज से बायकाट के धमकी दिहल लोग | बाकिर हम सोच लेहले रहनीं जे भले हम मुड़ी कटा देंगे बाकिर निहुराएँगे नहीं |मर्द के बच्चा हैं ,महापुरुष बनिए के रहेंगे |
बाकिर पर-सुक्खे दुखी रहे वाला लोग के हमरा के महापुरुष बनत देखल नीक ना लागल | उ लोग जा के ओह जात केलोग के उकसा दिहल जवना के पुश्तैनी व्यवसाय नाली साफ कईल हा | का जे बिन्हाचल बाबा तहनी के पेट पर लात मरत बाड़े ; तहनी के रोजिगार खा जइहें |बस, ओकनी के कुल्हि टोला , मरद -जनाना ,बाल-बच्चा आके हमरा दुआर पर महाभारत ठान देहलेसन | हम समझावे के कोशिश कईनी जे संविधान हमरा के कइसनो काम करे के अधिकार देता | आ सफाई कईल खाली कवनो जात के बपौती ना हा | जबाब मिलल जे संबिधान ओहि लोग के जात के केहु बनवले रहे , जे आरक्षण के साथे सफाई के काम ओहि लोग खातिर रिजरब का देहल | जेह तरे पंडित लोग पंडिताई बना के पंडिताई अपने खातिर रिजरब क लिहल लोग | हम केतनो समझावे के कोशिश करीं बाकिर उ मानेके तईय्यार न भइलेसन | लोग बढ़ा-चढ़ा दिहले रहे | हम केतनो माताये -बहनें करते रही गईनी , ओकनी के महतारी -बहिन पर उतर गईलेसन |हम बुझ गईनी जे यहां न चलिहें राउर माया | हम हाथ जोरि के माफ़ी मांगनी जे फेन-फेन हम एहि तरीका से महापुरुष बने के कोशिश ना करेम | आ साफ- सफाई ओहि लोग से कराएब |भले ओह लोग के ना आईला पर घर सूअर के खोभार हो जाऊ | हमार दुसरको परयास असफल हो गईल |
अब हम सोचनी जे अब छोट मोट काम करि के महान बनल जाओ | जैसे अस्पताल में रोगी सेवा कईल ,झगरा के फरियावता कईल ,ढ़ेरी कुल्हि काम रहे जवना के कईला से आदमी महापुरुष बनि जाई आ दोसरा के आँखि में ना खटकी | हमार अधिके समय एहि कुल्हि काम में खरचा हो जाऊ | घर के कुल्हि काम हमार शिरिमति जी के करे के परि जाऊ | खाली हमरा मन में इहे रहो जे एक बेर , खाली एक बेर केहु हमरा के महापुरुष कही देऊ ; हमार सकल परयास सवारथ हो जाई | बिना तियाग के , कुछुओ ना मिलेला |
बाकिर सबसे अधिक तियाग त हमार घरनी करत रहली | गाई के दाना-पानी देहला से लेके बाल-बुतरू सरिहरला लेक | सगरो काम बेचारी बिना मुंह खोलले करि देस | आ रात बिरात घरे आईला पर हमरा के जवन भोजन पानी बनवले रहस , पिरेम से जीमा देस | फेनु बिहाने उठी के हम महापुरुष बने के फेरा में लागिये जाइ |
एहि बीच में एक दिन घरे आईला पर हम पुच्छनी जे का हो ? आज का बनल बा ?
‘ कुछऊ ना’ - उनकर जबाब रहे |
हम पूछनी जे काहें ?
उ कहली जे ढेर दिन से चाउर ओरा गईल बा आ गेंहू पिसाईले नइखे ?
हमरा इयाद परल जे चार दिन पहिले उ हमरा से गेंहू पिसवावे के कहले रहली |बाकिर हम महापुरुष बने के चक्कर में ई बात भुला गईल रहनीं | तबो, बड़ा लक्ष्य खातिर छोटा तियाग त करहिं के परी | हम चट देना जबाब देहनी जे का भईल |आटा नईखे , त गेंहू के भात बना लेहले रहितु | अब सम्बाद में अल्पविराम हो गईल बुझाइल जे शिरिमति जी कुछु सोचत बाड़ी | उ हमरा लगे आईली | कहली जे रउआ परुष ना ....... महापुरुष हई | चरनवा कहाँ बा राउर ? तनी छुए दिहिं | जवन भात गाई भैंस के खाए के दिहल जाला , अब हमार नसीब उहे खाए के हो गईल बा I बढ़नी मारो एह महापुरुष बनला के |
लिहिं, एतना दिन से हम महापुरुष कहाये खातिर खखुआइल रहनीं हा | अब तs हमार घरनिये महापुरुष कही देहली | बाकिर हमार बुझाइल नाs , जे हम महापुरुष बनला खातिर हँसी कि पुरुष पद से पदावनति खातिर रोईं | ओहि रात , हम भुखले रहि गईनी आ रात भर पुरुष आ महापुरुष के बीच में लड़ाई चलते रहि गईल | केहु कहे जे हम बड़ ,तs हम बड़ |
फेन बिहान भईल | किरिन उगल | अंजोर में सब साफ-साफ लउके लागल | हमहूँ फैसला कईनी जे हमरा के अउरी लोग त महापुरुष कही ना ; आ शिरिमति जी हमरा के पुरुष कहस -इहे हमरा खातिर जियादा जरूरी बा | एहि से हम निखालिस पुरुष बने के किरिया खईनी | आ महापुरुष बने के आशा सिकहर टाँग देहनीं | अब हम पुरुष बने के परयास करत बानी | गेंहू पिसवावत बानी | लईका खेलावत बानी |
सब कुछ अपने आप हो जाला | कूकर में भात-दाल बन जाला | लंच खातिर चार गो परवठा बन जाला | जब लेक उनकर मरद नहा-धोआ के निकलेले , तब ले उनकर जूता-मोजा,शॉर्ट-पाईन्ट उनका लगे पहुँच जाला | चट देना चाय बन जाला | खा -पी के उनकर मरद डियूटी चल जाले | फेन शुरू होला घर के धोवाई-पोछाई, आपन नहान - धेयान ,पूजा-पाठ भोजन-छाजन | तब तनी टाइम मिलेला त देहि के सोझ क लेली , चाहे सीरियल के रिपीट देख लेली | एही बीच में आँचार के घाम लगावल, आ कुल्हि सियन-बिनन के काम निपटा देली |सब कुछु अपने आप हो जाला ; माने बिना बिशेष परयास के | रोज रोज एके गो चीझ ....जैसे कवनो मशीन आपन काम करत होखे |तले लेक साँझ हो जाला | आँचार के घर में रख देली |सोफ़ा के सरिहार देली | रिमोट के टेबुल पर ध देली;अब उनका मरद के घरे आवे के टाइम हो गईल बा |
रोज पांच बजे लेक चलि आवे ले | आज साढ़े पांच हो गईल | कहे ना आईले अबलेक ? जाम में फंस गईल होईहें | अच्छा तलेलेक दूध में चाहपत्ती आ चीनी मिला के रख देहली ,जे अइहें त चट देनी चाय बना दीहें |बुझाता जे केहु केवाड़ी ठकठकावत बा |आ गईले का ? आ धत तेरी के , केहु ना ह | एहिंगा कान बाजत रहेला | बाक़िर छव बज गईल | हे भगवान कवनो गड़बड़ी नईखे नु भईल ? ई मुआ फोनवो नईखे लागत | यह घरी ढेरकुल्हि बम ब्लास्ट के खबर सुने में आवेला | बाक़िर आज के समाचार में त कवनो खबर नईखे | समाचार चैनल लगा देहली , कि उ आवेले त पहिले समाचार देखेले | अब बालकनी में खड़ा हो के आपन मोटर सयकिल के आवाज चिन्हे लगली |लोग आवत जात त बा |… हो गईल होइ कवनो काम |… एह घरी ऑफिस वाला खून चूस लेत बड़ेसन ओभर ड्यूटी करा के | …अच्छा अइहें त हारल-खेदायिल नु आईहें |सोचली जे तनी चिउरा मुमफली भुज लेस …. चाय के साथे खाए खातिर | किचन में गईली |अबहिन भुजते रहली कि उनका मरद के आइला के आवाज सुनाई दिहल | सब कुछ छोड़ छाड़ के केवाड़ी खोले भगली | धक –धक……. आ गईले का ? जबले उ केवाड़ी खटखटावास ओकरा से पहिलहीं खोल देहली |
कहाँ रहनी हा एतना देर ?
अरे एक जाना गांव के भेंट गईल रहलाहान |
चाय बना दी ? पीएब ?
जरूरत त नईखे ; बना देबू त पी लेब | एतना कहि के उनकर मरद हाथ गोड़ धोवे चल जाले , आ उ किचन में चाय बनावे |
फेन सब कुछ अपने आप हो जाला | अपने आप चाय बन जाला |टिभी देखत उनकर मरद चाय पी लेले | उ किचन में डिनर बनावे चल जाली | जइसे कवनो मशीन होखे ......बिना परयास के काम करे......अपने आप.......रोज रोज | बाक़िर कराही में भुजे खातिर धईल चिउरा जर के खोंता हो जाला .......रोज रोज |