बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

शनिवार, 21 नवंबर 2015


नेह पाती
रोज लिख के फार देहनी |
इयाद पर 
धुरा जमल, से झार देहनी |
रोज दुअरा-
नेह दियना बार अइनी |
अल्पना से 
कल्पना के श्रृंगार कईनी |
रोज टोहनी, 
कब बाजल कुण्डी दुआरे |
हकासल -पियासल
आँख बस रास्ता निहारे |
थथम गईल बा 
साँस ;कवनो थाह मिलित |
बा गुमस ,
केनहु से त बताश मिलित |
ऐ निदरदी,
तू ना आईला अब ले काहें ?
प्राण अटकल 
बा -तोहरे आवे के राहे |

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