बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

शनिवार, 21 नवंबर 2015

राजा के नए जतन देखो !
सर के बल खड़ा वतन देखो !

एक रुपैया छत से गिर कर अटक गया है सीढ़ी पर
और तालियां पीट रहे तुम उसकी चक्कर घिन्नी पर
अरे वाह तम्हारी पसंद ,देखो !

राजा के नए जतन देखो !
सर के बल खड़ा वतन देखो !

नयी हवा कुछ अधिक सर्द है अबके साल मुंडेरों पर
तुम्हे आसरा बहुत अधिक है पश्चिम वाले डेरों पर
कभी आकर अपना घर देखो !

राजा के नए जतन देखो !
सर के बल खड़ा वतन देखो !

लोग गालियां सुना रहें हैं पीठ पीछे मुंह आगे आकर
कान उमेठे , जूते मारे ; लाज न आई तब भी जाकर
अखबारों की कतरन देखो !

राजा के नए जतन देखो !
सर के बल खड़ा वतन देखो !

राज-चिन्ह झुक गया ; और शर्म न आई तुमको अब भी
कालिख पोत के अपने मुंह में दांत चियारे खड़े हो अब भी
दिल का मलिन दर्पण देखो !

राजा के नए जतन देखो !
सर के बल खड़ा वतन देखो !

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