बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

मंगलवार, 29 जुलाई 2014

"काकू है ....हो….ओ..मत छुओ .....काटेगा"
कोई बाप अपनी बेटी को इसी तरह से डाँटेगा !
बेटी भी डरने वरने का थोड़ा फ़र्ज़  निभा देगी  !
जब अकेले में होगी;   उसको छुएगी जांचेगी !
पूरी तसल्ली हो जाने पर उसको हाथ में ले करके
बापू को ही डराएगी कूका….. कूका  कह  करके!
उस डरने वाली चीज से अब हमको डरना पड़ता है!

शायद बच्चो के संग सबको बच्चा होना पड़ता है!
ख़ुशी का गुस्सा
दो नन्हें हाथ---
साधिकार उठते है !
कि हमें गोंद में उठाओ!
दुलारो पुचकारो लोरी सुनाओ!
या कोई खेल खिलाओ!
यहाँ वहां घुमाओ !
अब घर में आग लग जाये
या आसमान सर पे टूटे !
जरूरी काम हो जितना अपनी बलाय से छूटे!
मना कर देना आफत है!
समूची जान कि सांसत है !
हाथ,पैर, नाक,मुंह,  माथा --
क्या पटका जायेगा
समझ में नहीं आता ?
इतना रोना कि घर में आग लग जाये!
इतना चिल्लाना कि आसमान फट जाये!
अब देखते है कि --
कितना जरूरी काम कर लोगे !
घंटे दो घंटे तो गोंद में ही थामोगे!
पहले कहा था प्रेम से माने नहीं तब!
दिखाया रंग असली तब
समझ  आया तुम्हें सब!