बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

 हुनकर रसगुल्ला बड़हन बा
हुनकर कनबाली दमिल बा
हुनकर साड़ी जरी- बनारसी
आ हुनकर पायल भारी बा
आ हुनका बम में बेशी दम बा
हुनकर फुलझरिया धाँसू बा
बा हुनका लगे अनार मरिचाई
छुरछुरियो बा आकाशियो बा
हऊ हमरा घरे ना अईले
हऊ हमरा घर के ना खइले
हऊ बड़ा टेढ़ बतियावेले
जे हमारा मन के ना कईले
हर बात पर रगड़ा- झगड़ा जी
कुछ मनभीतर कुछ बहरा जी
कईसन बीतल यह साल दिवाली
दियना जरल कि जियरा जी ?

२)
चानी पर के केश
धीरे धीरे कर के सगरो झर गईल |
एगो- दुगो दाढ़ी के बाल पर
टटका सफेदी पसर गईल |
अँखियाँ के नीचे-
झुर्री पर गईल ;
चमड़ा सिकुड़ गईल |
बी ए ,भा एम ए ,भा पि एच डी -
कुल्हि पढ़ाई ,पढ़ते -पढ़त सपर गईल |
पहिले जे कहल तोहके चाचा
अबके उहो चाचा बन गईल |
ऐ भाई , गांव भर के गोधन त कुटा गईल
तोहार गोधन कहवाँ बिचिल गईल ?
सब कुछ अपने आप हो जाला | कूकर में भात-दाल बन जाला | लंच खातिर चार गो परवठा बन जाला | जब लेक उनकर मरद नहा-धोआ के निकलेले , तब ले उनकर जूता-मोजा,शॉर्ट-पाईन्ट उनका लगे पहुँच जाला | चट देना चाय बन जाला | खा -पी के उनकर मरद डियूटी चल जाले | फेन शुरू होला घर के धोवाई-पोछाई, आपन नहान - धेयान ,पूजा-पाठ भोजन-छाजन | तब तनी टाइम मिलेला त देहि के सोझ क लेली , चाहे सीरियल के रिपीट देख लेली | एही बीच में आँचार के घाम लगावल, आ कुल्हि सियन-बिनन के काम निपटा देली |सब कुछु अपने आप हो जाला ; माने बिना बिशेष परयास के | रोज रोज एके गो चीझ ....जैसे कवनो मशीन आपन काम करत होखे |तले लेक साँझ हो जाला | आँचार के घर में रख देली |सोफ़ा के सरिहार देली | रिमोट के टेबुल पर ध देली;अब उनका मरद के घरे आवे के टाइम हो गईल बा |
रोज पांच बजे लेक चलि आवे ले | आज साढ़े पांच हो गईल | कहे ना आईले अबलेक ? जाम में फंस गईल होईहें | अच्छा तलेलेक दूध में चाहपत्ती आ चीनी मिला के रख देहली ,जे अइहें त चट देनी चाय बना दीहें |बुझाता जे केहु केवाड़ी ठकठकावत बा |आ गईले का ? आ धत तेरी के , केहु ना ह | एहिंगा कान बाजत रहेला | बाक़िर छव बज गईल | हे भगवान कवनो गड़बड़ी नईखे नु भईल ? ई मुआ फोनवो नईखे लागत | यह घरी ढेरकुल्हि बम ब्लास्ट के खबर सुने में आवेला | बाक़िर आज के समाचार में त कवनो खबर नईखे | समाचार चैनल लगा देहली , कि उ आवेले त पहिले समाचार देखेले | अब बालकनी में खड़ा हो के आपन मोटर सयकिल के आवाज चिन्हे लगली |लोग आवत जात त बा |… हो गईल होइ कवनो काम |… एह घरी ऑफिस वाला खून चूस लेत बड़ेसन ओभर ड्यूटी करा के | …अच्छा अइहें त हारल-खेदायिल नु आईहें |सोचली जे तनी चिउरा मुमफली भुज लेस …. चाय के साथे खाए खातिर | किचन में गईली |अबहिन भुजते रहली कि उनका मरद के आइला के आवाज सुनाई दिहल | सब कुछ छोड़ छाड़ के केवाड़ी खोले भगली | धक –धक……. आ गईले का ? जबले उ केवाड़ी खटखटावास ओकरा से पहिलहीं खोल देहली |
कहाँ रहनी हा एतना देर ?
अरे एक जाना गांव के भेंट गईल रहलाहान |
चाय बना दी ? पीएब ?
जरूरत त नईखे ; बना देबू त पी लेब | एतना कहि के उनकर मरद हाथ गोड़ धोवे चल जाले , आ उ किचन में चाय बनावे |
फेन सब कुछ अपने आप हो जाला | अपने आप चाय बन जाला |टिभी देखत उनकर मरद चाय पी लेले | उ किचन में डिनर बनावे चल जाली | जइसे कवनो मशीन होखे ......बिना परयास के काम करे......अपने आप.......रोज रोज | बाक़िर कराही में भुजे खातिर धईल चिउरा जर के खोंता हो जाला .......रोज रोज |
हम त बोलनी ढेर अब रउआ बोलीं
बोलीं , बोल के कान में मिसरी घोरीं |
नेह बा रउआ खातिर हमरा मन में
हमरा बदे रउआ मन में का बा , बोलीं |
ढेर दिन से हम अकेलहीं बोलत बानी
रउओ त आपन दिल के राज खोलीं |
प्रीत हम कइनीं,निबहनी,बोल देहनीं
मत रउआ मुड़ी झुका माटी निखोरीं |
मन ई संसय के भंवर में डूबल जाता
रउआ अब हं भा ना कुछऊ त बोलीं |
हम त बोलनी ढेर अब रउआ बोलीं |
भारी पाप….. महापराध…….. बाम्हन के मौत | दोसी बा सगरो गांव | अब केहु चैन से ना रहि पायी | गांव में कुकुर फेंकरिहेंसन; सियार बोलिहेंसन |बाम्हन के मउअत भईल बा ……….|ना ई हतिया हा ,कुल्हि गांव मिल के कईले बा |
काल्ह दुपहरिये में पंचाईत बइठल रहे | एक ओर भिरगु बाबा ; दोसर ओर रासबिहारी के लईका |भिरगु बाबा अपना माई के कजिया में करजा लेहले रहले | आजु लेक ना लौटवले | लौटावास कहाँ से ? भिरगु बाबा खानदानी भिखारी | घरे-घरे सीधा-चाउर , दान-दच्छिना माँगेले | ओहि से गरज चल जाला | घर में उ आ उनकर मेहरारू दू बेकत | एगो लईका रहे , पता ना कवन बेमारी से खतम हो गईल | ओकरो दवा -बीरो में रासबिहारी से करजा लेहले रहले भिरगु बाबा | बाकिर आपने पलानी के पीछे के खेत रास बिहारी के नावे लिख देहले | अब जर-जमा में खाली पलानी रखे भर के जमीन बाँचि गईल बा |कहाँ से करजा लउटावस भिरगु बाबा ?
आ एही बात पर रास बिहारी के लइका उनका के दू तमेचा मार देहले रहे बीच चौराहा पर | भिरगु बाबा गरीब रहलेहन बाकिर इज्जतदार | सोचले जे-- का लंगा के मुँहे लागे के हा |फरियावता पंचाईत करी |इज्जतदार बाम्हन के मुंह पर तमेचा गलत बात बा | रासबिहारी के लइका के गोड़ ध के माफ़ी मांगे के परी |बाकिर भिरगु बाबा के पहिला बेर लागल जे लोग सत्त-असत पर बिचार ना क के रुपिया पैसा पर ढेर बिचार करत बा | केहु हूँ हाँ नइखे करत | सब लोग चुप चाप बा | आ रासबिहारी के लइका कहत बा जे हमार उधारी लौटा देस हम माफ़ी मांग लेब |

पंडीजी लोग के मुंह ताकत रहले | जब केहु उनकर पक्ष ना लिहल त कहले जे हमारा लगे पैसा त नइखे बाकिर पलानी वाला जमीन हम तोरा नांवे लिख देम | तुरते कागज आईल आ बाबा तुरते साइन करि देहले |ओकरा बाद भरल सभा में बाबा के गोड़ ध के रासबिहारी के लइका माफ़ी मंगलस ---बाबा हमारा से गलती हो गईल मांफ करि दिंहिं | आ भिरगु बाबा परम प्रसन्न दुनू हाथ उठा के आशीर्वाद देहले --- विजयी होखा बेटा , यश मिलो | अपना तमेचा के बदला पंडीजी ले लेहले | सब लोग अपना अपना घरे चल गईल | जाते-जाते रासबिहारी के लईका पंडीजी से कहि गईल -- काल्ह बिहाने लेक पलानी खाली हो जाये के चाहीं , ना त घर में से घींच के बाहर करि देम |
हम रहेम कहाँ हो ? भिरगु बाबा के काठी मारि देहले रहे |
आ अजु भिरगु बाबा के देहि काठ हो गईल बा |उ अपना मेहरारू संघे माहुर खा लेहले बाड़े | लोग फूंके के काम में लागल बा | डर सबका मन में बा |बरहम पिशाच के |आ कि अपना मन के पिशाच के ? जवन छुपे छुपे भिरगु बाबा के जान ले लेहलस ? रासबिहारी के लइका जवन उनका के कहले रहे जे हमारा मुड़ी पर ना नु रहबा आजु कान्हा पर ढ़ो के ले जाता | अब उनकर पलानी के लगे उनकर किरिया करम होइ |ओहिजा मंदिर बनी |
समोसे-समोसे ,दस के चार समोसे
लय में चिल्लाते हुए ,
धनिये लहसुन की चटनी की महक
जनरल डिब्बे में फैलाते हुए ,
एक वेंडर बेंच रहा था समोसे
भटनी जंक्शन पर |
भूख तो थी नहीं
(घर से खाकर चला था)
पर अविवेकी उपभोक्ता जो हूँ
ले ही लिया पांच के दो |
(गमकती हुयी चटनी का लोभ )
परन्तु ,हुआ क्षोभ-
मिर्च ज्यादा थी समोसे में |
और पेट ख़राब होने का डर |
इसलिए समोसा -
खिड़की से बाहरटरका दिया |
समोसे के लिए
थी मेरी ऋणात्मक सीमांत उपयोगिता |
सामने की सीट पर थे एक दम्पति |
मरियल बीबी ; दुबला पति |
तीन बच्चे भी थे उनके इर्द गिर्द -
समोसे के लिए चिल्लाने लगे |
दस के चार खरीदे गए समोसे तो
छीना झपटी मचाने लगे |
मेरे अर्थशास्त्र ने गणना किया
एक-एक तीन बच्चे पाएंगे,
शेष एक में पति पत्नी खाएंगे |
जिसकी जितनी सीमांत उपयोगिता
उतने ही समोसे दिए जायेंगे |
पर माँ ने दो समोसे अलग किया ;
एक कागज पर मसल दिया |
इन दो समोसों में से तीनों बच्चों को
बराबर हिस्से दिए गए |
शेष दो समोसे बाद में खाने के लिए
झोले में रख दिए गए |
अर्थशास्त्र गलत साबित हुआ
फिर एक बार ; हमेशा की तरह |
 माने के त हम अपना के बड़का हिम्मती मानीला , बाकिर लरिकाईं में हमारा भूत से बहुते डर लागे |भूत के आतंक हमारा मन में एतना रहे जे, हम अन्हारा में गईला से डेरायीं |भूत के डर से हम बिछावना पर पेशाब करि देत रहलीं |भूत के हम देखले त ना रहनीं बाकिर कहाँ दूनी से हमारा मन में आ गईल रहे जे बड़का-बड़का मुंह--हाथ-गोड वाला आदमीं भूत होला | भूत कछुवो करी सकत बा | अन्हारा में पायी त लईकन के धs के ले जाई ,आ हाथ गोड काट दिही |एही से रात में सुतला के बेर हम कवनो न कवनो लाईट जरवाईए के सूती |
बाकिर एक बेरी भूत दिन के अंजोरा में आ गयिल | हम इस्कूल से घरे पैदल आवत रहनीं त कुछु लोग इकठा होके घूरा पर कुछु जरावत रहेलोग |पुछला पर पता लागल जे फलनवाँ मर गईल बाड़े , उनका के फूँकल जाता |मरल, फूँकल हमरा खातिर नया बात रहे | ढेर पुछला पर पता चलल जे ,लोग मर के भूत बन जाला | अब मोटा-मोटी आईडिया हो गईल ,जे भूत भूत काs होला | हम बुझानी जे, आदमी जेतना बलवान बा ,ओतने नु बलवान भूत होई | बाकिर जवाब मिलल जे ना भूत हवा-बेयार लेखन होला, एहिसे हर जगहे मिल जाला |आ चोरी छुपे काम करेला एहिसे ढेर बलवान होला | मान ल जे , तहरा के केहु पीछे से धकिया देहल ,आ उ लउकत नईखे |त केतनो बचबs बाबू बाकिर ढिमला जईबा |तब हमर समझ में आ गईल जे जेतना चोरी छुपे काम होता उ भूत करत बा | कुछु दिन पहिले जवन सुदामा के पुआरा चोरा ले गईल , उ भूते रहे |नेताजी के जे गोली मरले रहे आ लउकल ना , उ भूते रहे | अब भूत से अधिका डर लगे लागल | अब त उ दिन के अंजोरा में आ सकत बा ,एही से हम हमेशा साथी संघतिया लोग के साथे इस्कूल से आईं-जाईं |हम बूझत रहनी जे भूत कबो संघतिया लोग के सामने हमारा के ना उठा पायी | कबो उठाईयो ली त लोग हाला कs दी, आ हम बाँचि जाएम |
फेन एक दिन हमारा एकजना संघतिया के भूत धs लेहलस |कवन दूनी फेड पर उल्टा लटके वाला भूत रहे | ढेर कुल्हि ओझा गुनी से झरवावल गईल ,एगो खस्सी कटाईल तब जाके भूत भागल |अब त हमारा भरी शंका धs लेहलस | अब त साथी संघतिया के बीचो बीच रहला से भी भूत से नईखीं बांच सकत |अब भूत अन्हार में, अंजोर में ,आदमी में ,जंतु में कहीं हो सकेला |हमार डर बढ़त गईल | कबो हमारा बुझाऊ जे एगो भूत हमारा पीछे पीछे चलत बा | ओकरा मौका नईखे मिलत ना त उ अबले हमर हाथ गोड काट देहले रहित |कबो हमारा बुझाऊ जे हमारा कनवा के जरी आ के भूतवा ठठा के हँसत बा | जे भागs ना , तू केतना भगबाs ? बुझाता जे हम भागत जात बानी , आ उ पिठियावले जाता | जेहि तारे मुसवा के मुवावे से पहिले बिलरिया ओहनी से खेलेलीसन; ओहि तरे भूतवा हमारा से खेलत बा |पिछला साल हमर जवन रूपया भुला गईल रहे , उ भुतवे चोरवले बा | हमारा पट्टिदारन से मिल के उहे हमारा के केस मुकदमा में फसवले बा |बुझाता जे भूतवा हमर खेत चौपट करि दी | परसों यूरिया छिंटाले रहनी , कुल्हि गेंहू जरी गईल बा |भूतवा बेयार बहा के बरखा होखे से रोक देहले बा |काल्हि रात खान हमर भौजाई से खुसुर-पुसुर बतियावत रहुवे , एही से बिहाने बेमतलब के उ हमारा से झगड़ा क लेहलीहा |आ देखाs, ई करिका साँढ़ हमरा के मारे आवत बा , बुझाता जे भुतवे एकर मति घुमवले होइ |रेs ई भूतवा त हमरा के घेर-घार के मुवा दी |देख होsss , हमार ब्लड प्रेशर बढ़ गईल बा | आरेssss, बुझाता जे ई हमार नट्टी दबावत बा |आरेs दौड़ा लोगिन होssssss | आकि तहरो लोगिन पर भूत चढ़ गईल बा ?......? आकि तहरो लोगिन भूत से डेरात बाड़ा लोगिन ?  
पत्नी के प्रति
अभी कुछ ही दिन हुए
हमारी शादी को ,
जब एक ही गाँठ से
बंधे थे हम दोनों |
मैं बारात लेकर गया था
तुम्हारे घर |
और लगभग
अपहरण करता हुआ
लाया था तुम्हे
अपने घर |
फिर खोल दी गयी गांठे
कि मैं निस्सीम आकाश में
उड़ सकूँ ; कर सकूँ
जो भी करना है मुझे |
पर शायद ठीक से
गिरह खुली नहीं थी ,
क्योंकि आज भी
महसूस करता हूँ -
एक खिंचाव
तुम्हारी ओर |
शायद यही प्रेम है
जो आरक्षित रहेगा
सिर्फ तुम्हारे लिए |
आज कैलाश पर्वत पर अलगे नज़ारा बा | शिवजी एगो पहाड़ पर मुड़ी टिका के आसमान निहारत बानी | हाव-भाव से बुझाता जे बड़ा दुखी बानी | महशिवरात्रि के दिन हs , आज समूचा बरमांड में शिवजी के जय जयकार होला | आज के दिन शिवजी काहें दुखी बानी ? कवनो गहिर बात बा |
अर्धांगिनी पार्वतीजी पूजा के तइयारी करत बाड़ी ; बाकिर शिव जी के मन के बात नईखी बुझ पावत |सोलहो सिंगार कईले माँ पार्वती भांग के गिलास शिव जी के थमावत बाड़ी , तनी मुस्किया के… |बाकिर शिवजी मुड़ी घुमा के देखतो नईखीं ; भांग के गिलास टरका देत बानी | ई का भईल ? “तवगुणनिर्जीदासोअहम्” कहेवाला स्वामी हमारा से आ अपना प्रिय पेय से एतना विरक्त काहें ? कवनो गहिर बात बा | आजुलेक स्वामीं के सगरो गुपुत रहस्य ना जान पवली पार्वती माता |
स्वामिभक्त बंसहा बैल कौड़ी-जड़ल गुदरी ओढले शिवजी के लगे खड़ा हो गईले ; उछाह में | आजु के दिने भोलबाबा नंदी पर विराजमान होके तीनो लोक के भ्रमण करेनी , लोग के चढ़ावा स्वीकार करेनी आ आशीर्वाद देनी |एहिमें लोग नंदी के भी तनी परसादी चढ़ा देला |शिवजी के ध्यान खींचे खातिर गर्दन में बान्हल घंटी के हिलवले......एक बेर ...दू बेर |शिवजी के अंतरिक्ष में तकला पर कवनो फरक ना पड़ल | बुईझ गईले जे कवनो गहिर बात बा |
पुत्र गणेश जी मूंस के सवारी करत ,लड्डू खात सीधे अपना महतारी के लगे घुस गईले | एहुतरे जबसे बाबूजी से झगड़ा भईल आ मुड़ी कटा गईल ,तबसे बाबूजी के पंजरा जाये से डेराले | एहतरे आज बाबूजी के सोच में डूबल देख के बुझ गईलेहान जे कवनो गहिर बात बा | फरके रहला में भलाई बा |
“ नारायण ,नारायण” कहत नारद जी जैसेहीं कैलाश पर अईले उनका मन पड़ल कि आज शिवरात्रि हs | तुरंते “नमः शिवाय -नमः शिवाय” बोले लगले | शिवजी के तन्द्रा टूटल |
“नारद जी , आज नमः शिवाय काहें हो ?”
“भोलेबाबा, आज शिवरात्रि हा | सगरो दुनिया नमः शिवाय हो गईल बा त हम काहें ना ?बाकिर रउआ घर में उदासी काहे बा ?”
“कुछुओ ना |” - आँख के लोर सम्हारत शिवजी पूछ देहनी ---- “कार्तिकेय के कवनो पता ठेकान मालूम भईल हा , नारद जी ? जबसे घर छोड़ के गईल बाड़े हमरा कवनो खोज खबर नईखे मिलत |”
“एकदम चउकस !” --- नारद जी जवाब देहले --- “कार्तिकेय बाबू आजकल मल्लिकार्जुन पर्वत पर डेरा जमा लेहले बाड़े | तमाम दखिन के लोग उनका के आपन मालिक मान लेहले बा | इन्द्र के बेटी देवसेना से बियाह क के मजे में बाड़े राउर बड़का लईका |चिंता के कवनो बात नईखे |अच्छा हमरा के चले के आज्ञा दिहिं |”
नारद जी “नारायण-नारायण” कहत प्रस्थान क गईले |
‘‘नारद जी घरियो छन खातिर एक जगहे ना टिकेले | तनी रुकते तs बड़का लइकवा के अउरी कुल्हि हाल चाल सवाच लीति |” --शंकर जी के ई सोचला में उनकर अंदर के बाप के दरद साफ़ छलकत रहे |
कहे खातिर शंकर जी के दू गो लईका , बात मानेवाली मेहरारू , छोटमोट नौकर-चाकर आ गृहस्थी----सब कुछु रहे |बाकिर बड़का लईका माई बाप से खिसिया के अलगा रहे लागल | शिवजी के पुरान बात इयाद परि गईल |
हेतिचुकी बात लमहर हो गईल आ शिवजी के गरदन के फँसरी बन गईल | हाराहुशी में दुनू लईका लड़ पडलेसन जे केकर पहिले पूजा होइ |कायदे से त जेठ लईका के ई अधिकार मिले के चाही , बाकिर छोटका रहे माई के दुलरुआ | आ शंकरो जी कवनो पक्षपात में ना पड़े के चहनी | रास्ता निकालल गईल जे पहिले ओकर पूजा होइ जे धरती के चक्कर पहिले लगा के आई | कार्तिकेय बबुआ बड़ा हुशियार रहे | चट देना अपना असवारी पर बईठल आ धरती के चक्कर लगावे निकल गईल | आखिर काबिल सवांग रहे उ | गणेश बबुआ भारी देह - आ मूंस सवारी | बुझ गईले जे अब हारेवाला बानी | एही से दोसर जुगुति निकलले | आ खाली माई बाबू के प्रदक्षिणा कर के पहिले पूजे के वरदान ले लेहले | तब जाके कहीं हारल-पाछल बड़का बबुआ आयिल | एने फैसला हो गईल रहे | ई सुन के ओकरा बड़ा दुःख भईल | न्याय खातिर अरदास कईलस |
फेनु शिवजी सोचे लगनी | “मन में दुविधा ओहु बेरा रहे | न्याय के स्पष्ट परिभासा के अनुसार बात गलत रहे | अगर जुगुति से फरियावता होखे के रहल हा त उ खड़े खाड़ी प्रदक्षिणा क के जीत गईल रहित | आखिर एहुंगा त प्रदक्षिणा के नियम शास्त्र में बतावल गईल बा | एगो लईका के पक्ष खातिर दोसर लईका के हक़ मारल साफ़ लउकत रहे | बाकिर हम कुछुओ ना करि पवनीं | कुछु पार्वतीजी के तरफ से दवाब रहे आ कुछु बिधना के इहे मंजूर रहे |बाकिर अफ़सोस एह बात के होला जे जब बड़का लईका घर छोड़ के जाये लागल त हम दाढ़ी ध के निहोरा काहें ना कईनी ? ….. मना काहें ना लेहनी ? …….काहें ना अँकवारी में भर के रोवे लगनी ?..........जे ना बबुआ जवन भईल तवन भईल बाकिर तहरा के अलगा ना जाये देम |……. काहे ना ओकर गोड़ छान लेहनी ? ………..आखिर अपने जमलका नु रहे ?"
शिवजी के भीतर के बाप जाग जाला हर शिवरात्रि में |
“ एतना कुल्हि मर-मिठाई में बड़को के नु हिस्सा बाटे |”
बात पिछला साल के ह |का जाने कहाँ दुनी से हमरा मन में बिचार आईल कि हमरा महापुरुष बने के चाहीं | जेतना कुल्हि किताब पढवाल गईल बा , जेतना ज्ञान के चर्चा ई दुनिया में भईल बा ; कुल्हि बात के इहे मतलब बा कि सब केहु के महापुरुष बने के चाहीं | ना त , महापुरुषों कि जीवनी -- किताब काहें पढ़ावल जाइत ? कवनों भर्तृ हरी कही गईल बाड़े कि जे महापुरष नईखे बनत , उ ई दुनिया में गदहा नियर बा |भले उ घास ना खाके ,चाउर-गेंहू खाता |त मोट बात ई कि महापुरुष बने के चाही ;आ सबका बने के चाहीं |इहे बात सोच बिचार के हम महापुरुष बने खातिर किरिया खइनीं |
अब बात आ गईल जे महापुरुष बने खातिर कईल का जाओ ? बिना कईले त ई दुनिया में भीख ले ना भेंटाला | ढेर सोच बिचार के हम फैसला कईनी जे एगो सोसाइटी बनावल जाऊ | काहें कि सभ महापुरुष लोग कवनो ना कवनो सभा भा सोसाइटी से जुडल रहे लोग | एही से हम चट देना एगो सोसाइटी बना लेहनी - महापुरुष बनाओ सोसाइटी | हमारा ई ना बुझाला जे सोसाइटी के नाम सोंस से काहें शुरू होला |सोंस त एगो मछर के नाव ह , जवन काटेलेसन त बुझाला जे खून के साथे परानो चूस लिहेंसन | जाये दिहिं, जे नाव धईले होइ उ कवनो समानता देखिये के नु धईले होइ ? एने हमार सोसाइटी तैयार त हो गईल बाकिर एहिमे अउरी लोग के जोडलो त जरूरी रहे | हम ढेर हाथ-गोड़ ध के कुछु लोग के जोवाइन करवनी | केहु के अध्यछ त केहु के सभापति बनावे के दिलासा देहनीं | हम खाली संजोजक बनि के रहि गईनी | बाकिर सब लोग से हम सकरववनीं जे हमर भाषण सुनला के बाद हमारा के महापुरुष कहे के परी | सभ लोग के माला पहिना के , बढ़िया खातिर बात निबहा के ,कुल्हि लोग के आउंज- गाउँज भासन सुनि के , कुल्हि लोग के झूठ साँच में मूड़ी डोला के जब हम हारि गईनी तब हम भासन देबे खातिर खड़ा भईनी | बाकिर ई का ? कुल्हि लोग घसक लिहल | माने हम अकेले बाँच गईनी ,अपना के महापुरुष कहे खातिर | पहिला परयास एकदमें असफल हो गईल |
बाकिर उ पहलवान कवन जवन घाव लागला पर कलपे लागे , अगिला दांव ना सीखो |चलीं , अब दोसर परयास कईल जाऊ | नया बेयार बहल रहे सफाई अभियान के | हमहूँ सोचनी जे एगो कर्मयोगी खातिर एकरा से बड़हन कवनो अवसर नईखे | अब हमरा के केहु महापुरुष बनला से नईखे रोक सकत | हम अकेलहीं नरदोह आ नाबदान के सफाई करे लगनी | हमार हित-मित्र लोग हमरा के छूतीहर कहे लागल | समाज से बायकाट के धमकी दिहल लोग | बाकिर हम सोच लेहले रहनीं जे भले हम मुड़ी कटा देंगे बाकिर निहुराएँगे नहीं |मर्द के बच्चा हैं ,महापुरुष बनिए के रहेंगे |
बाकिर पर-सुक्खे दुखी रहे वाला लोग के हमरा के महापुरुष बनत देखल नीक ना लागल | उ लोग जा के ओह जात केलोग के उकसा दिहल जवना के पुश्तैनी व्यवसाय नाली साफ कईल हा | का जे बिन्हाचल बाबा तहनी के पेट पर लात मरत बाड़े ; तहनी के रोजिगार खा जइहें |बस, ओकनी के कुल्हि टोला , मरद -जनाना ,बाल-बच्चा आके हमरा दुआर पर महाभारत ठान देहलेसन | हम समझावे के कोशिश कईनी जे संविधान हमरा के कइसनो काम करे के अधिकार देता | आ सफाई कईल खाली कवनो जात के बपौती ना हा | जबाब मिलल जे संबिधान ओहि लोग के जात के केहु बनवले रहे , जे आरक्षण के साथे सफाई के काम ओहि लोग खातिर रिजरब का देहल | जेह तरे पंडित लोग पंडिताई बना के पंडिताई अपने खातिर रिजरब क लिहल लोग | हम केतनो समझावे के कोशिश करीं बाकिर उ मानेके तईय्यार न भइलेसन | लोग बढ़ा-चढ़ा दिहले रहे | हम केतनो माताये -बहनें करते रही गईनी , ओकनी के महतारी -बहिन पर उतर गईलेसन |हम बुझ गईनी जे यहां न चलिहें राउर माया | हम हाथ जोरि के माफ़ी मांगनी जे फेन-फेन हम एहि तरीका से महापुरुष बने के कोशिश ना करेम | आ साफ- सफाई ओहि लोग से कराएब |भले ओह लोग के ना आईला पर घर सूअर के खोभार हो जाऊ | हमार दुसरको परयास असफल हो गईल |
अब हम सोचनी जे अब छोट मोट काम करि के महान बनल जाओ | जैसे अस्पताल में रोगी सेवा कईल ,झगरा के फरियावता कईल ,ढ़ेरी कुल्हि काम रहे जवना के कईला से आदमी महापुरुष बनि जाई आ दोसरा के आँखि में ना खटकी | हमार अधिके समय एहि कुल्हि काम में खरचा हो जाऊ | घर के कुल्हि काम हमार शिरिमति जी के करे के परि जाऊ | खाली हमरा मन में इहे रहो जे एक बेर , खाली एक बेर केहु हमरा के महापुरुष कही देऊ ; हमार सकल परयास सवारथ हो जाई | बिना तियाग के , कुछुओ ना मिलेला |
बाकिर सबसे अधिक तियाग त हमार घरनी करत रहली | गाई के दाना-पानी देहला से लेके बाल-बुतरू सरिहरला लेक | सगरो काम बेचारी बिना मुंह खोलले करि देस | आ रात बिरात घरे आईला पर हमरा के जवन भोजन पानी बनवले रहस , पिरेम से जीमा देस | फेनु बिहाने उठी के हम महापुरुष बने के फेरा में लागिये जाइ |
एहि बीच में एक दिन घरे आईला पर हम पुच्छनी जे का हो ? आज का बनल बा ?
‘ कुछऊ ना’ - उनकर जबाब रहे |
हम पूछनी जे काहें ?
उ कहली जे ढेर दिन से चाउर ओरा गईल बा आ गेंहू पिसाईले नइखे ?
हमरा इयाद परल जे चार दिन पहिले उ हमरा से गेंहू पिसवावे के कहले रहली |बाकिर हम महापुरुष बने के चक्कर में ई बात भुला गईल रहनीं | तबो, बड़ा लक्ष्य खातिर छोटा तियाग त करहिं के परी | हम चट देना जबाब देहनी जे का भईल |आटा नईखे , त गेंहू के भात बना लेहले रहितु | अब सम्बाद में अल्पविराम हो गईल बुझाइल जे शिरिमति जी कुछु सोचत बाड़ी | उ हमरा लगे आईली | कहली जे रउआ परुष ना ....... महापुरुष हई | चरनवा कहाँ बा राउर ? तनी छुए दिहिं | जवन भात गाई भैंस के खाए के दिहल जाला , अब हमार नसीब उहे खाए के हो गईल बा I बढ़नी मारो एह महापुरुष बनला के |
लिहिं, एतना दिन से हम महापुरुष कहाये खातिर खखुआइल रहनीं हा | अब तs हमार घरनिये महापुरुष कही देहली | बाकिर हमार बुझाइल नाs , जे हम महापुरुष बनला खातिर हँसी कि पुरुष पद से पदावनति खातिर रोईं | ओहि रात , हम भुखले रहि गईनी आ रात भर पुरुष आ महापुरुष के बीच में लड़ाई चलते रहि गईल | केहु कहे जे हम बड़ ,तs हम बड़ |
फेन बिहान भईल | किरिन उगल | अंजोर में सब साफ-साफ लउके लागल | हमहूँ फैसला कईनी जे हमरा के अउरी लोग त महापुरुष कही ना ; आ शिरिमति जी हमरा के पुरुष कहस -इहे हमरा खातिर जियादा जरूरी बा | एहि से हम निखालिस पुरुष बने के किरिया खईनी | आ महापुरुष बने के आशा सिकहर टाँग देहनीं | अब हम पुरुष बने के परयास करत बानी | गेंहू पिसवावत बानी | लईका खेलावत बानी |

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

समोसे-समोसे ,दस के चार समोसे
लय में चिल्लाते हुए ,
धनिये लहसुन की चटनी की महक
जनरल डिब्बे में फैलाते हुए ,
एक वेंडर बेंच रहा था समोसे
भटनी जंक्शन पर |
भूख तो थी नहीं
(घर से खाकर चला था)
पर अविवेकी उपभोक्ता जो हूँ
ले ही लिया पांच के दो |
(गमकती हुयी चटनी का लोभ )
परन्तु ,हुआ क्षोभ-
मिर्च ज्यादा थी समोसे में |
और पेट ख़राब होने का डर |
इसलिए समोसा -
खिड़की से बाहरटरका दिया |
समोसे के लिए
थी मेरी ऋणात्मक सीमांत उपयोगिता |
सामने की सीट पर थे एक दम्पति |
मरियल बीबी ; दुबला पति |
तीन बच्चे भी थे उनके इर्द गिर्द -
समोसे के लिए चिल्लाने लगे |
दस के चार खरीदे गए समोसे तो
छीना झपटी मचाने लगे |
मेरे अर्थशास्त्र ने गणना किया
एक-एक तीन बच्चे पाएंगे,
शेष एक में पति पत्नी खाएंगे |
जिसकी जितनी सीमांत उपयोगिता
उतने ही समोसे दिए जायेंगे |
पर माँ ने दो समोसे अलग किया ;
एक कागज पर मसल दिया |
इन दो समोसों में से तीनों बच्चों को
बराबर हिस्से दिए गए |
शेष दो समोसे बाद में खाने के लिए
झोले में रख दिए गए |
अर्थशास्त्र गलत साबित हुआ
फिर एक बार ; हमेशा की तरह |
भूत के डर
माने के त हम अपना के बड़का हिम्मती मानीला , बाकिर लरिकाईं में हमारा भूत से बहुते डर लागे |भूत के आतंक हमारा मन में एतना रहे जे, हम अन्हारा में गईला से डेरायीं |भूत के डर से हम बिछावना पर पेशाब करि देत रहलीं |भूत के हम देखले त ना रहनीं बाकिर कहाँ दूनी से हमारा मन में आ गईल रहे जे बड़का-बड़का मुंह--हाथ-गोड वाला आदमीं भूत होला | भूत कछुवो करी सकत बा | अन्हारा में पायी त लईकन के धs के ले जाई ,आ हाथ गोड काट दिही |एही से रात में सुतला के बेर हम कवनो न कवनो लाईट जरवाईए के सूती |
बाकिर एक बेरी भूत दिन के अंजोरा में आ गयिल | हम इस्कूल से घरे पैदल आवत रहनीं त कुछु लोग इकठा होके घूरा पर कुछु जरावत रहेलोग |पुछला पर पता लागल जे फलनवाँ मर गईल बाड़े , उनका के फूँकल जाता |मरल, फूँकल हमरा खातिर नया बात रहे | ढेर पुछला पर पता चलल जे ,लोग मर के भूत बन जाला | अब मोटा-मोटी आईडिया हो गईल ,जे भूत भूत काs होला | हम बुझानी जे, आदमी जेतना बलवान बा ,ओतने नु बलवान भूत होई | बाकिर जवाब मिलल जे ना भूत हवा-बेयार लेखन होला, एहिसे हर जगहे मिल जाला |आ चोरी छुपे काम करेला एहिसे ढेर बलवान होला | मान ल जे , तहरा के केहु पीछे से धकिया देहल ,आ उ लउकत नईखे |त केतनो बचबs बाबू बाकिर ढिमला जईबा |तब हमर समझ में आ गईल जे जेतना चोरी छुपे काम होता उ भूत करत बा | कुछु दिन पहिले जवन सुदामा के पुआरा चोरा ले गईल , उ भूते रहे |नेताजी के जे गोली मरले रहे आ लउकल ना , उ भूते रहे | अब भूत से अधिका डर लगे लागल | अब त उ दिन के अंजोरा में आ सकत बा ,एही से हम हमेशा साथी संघतिया लोग के साथे इस्कूल से आईं-जाईं |हम बूझत रहनी जे भूत कबो संघतिया लोग के सामने हमारा के ना उठा पायी | कबो उठाईयो ली त लोग हाला कs दी, आ हम बाँचि जाएम |
फेन एक दिन हमारा एकजना संघतिया के भूत धs लेहलस |कवन दूनी फेड पर उल्टा लटके वाला भूत रहे | ढेर कुल्हि ओझा गुनी से झरवावल गईल ,एगो खस्सी कटाईल तब जाके भूत भागल |अब त हमारा भरी शंका धs लेहलस | अब त साथी संघतिया के बीचो बीच रहला से भी भूत से नईखीं बांच सकत |अब भूत अन्हार में, अंजोर में ,आदमी में ,जंतु में कहीं हो सकेला |हमार डर बढ़त गईल | कबो हमारा बुझाऊ जे एगो भूत हमारा पीछे पीछे चलत बा | ओकरा मौका नईखे मिलत ना त उ अबले हमर हाथ गोड काट देहले रहित |कबो हमारा बुझाऊ जे हमारा कनवा के जरी आ के भूतवा ठठा के हँसत बा | जे भागs ना , तू केतना भगबाs ? बुझाता जे हम भागत जात बानी , आ उ पिठियावले जाता | जेहि तारे मुसवा के मुवावे से पहिले बिलरिया ओहनी से खेलेलीसन; ओहि तरे भूतवा हमारा से खेलत बा |पिछला साल हमर जवन रूपया भुला गईल रहे , उ भुतवे चोरवले बा | हमारा पट्टिदारन से मिल के उहे हमारा के केस मुकदमा में फसवले बा |बुझाता जे भूतवा हमर खेत चौपट करि दी | परसों यूरिया छिंटाले रहनी , कुल्हि गेंहू जरी गईल बा |भूतवा बेयार बहा के बरखा होखे से रोक देहले बा |काल्हि रात खान हमर भौजाई से खुसुर-पुसुर बतियावत रहुवे , एही से बिहाने बेमतलब के उ हमारा से झगड़ा क लेहलीहा |आ देखाs, ई करिका साँढ़ हमरा के मारे आवत बा , बुझाता जे भुतवे एकर मति घुमवले होइ |रेs ई भूतवा त हमरा के घेर-घार के मुवा दी |देख होsss , हमार ब्लड प्रेशर बढ़ गईल बा | आरेssss, बुझाता जे ई हमार नट्टी दबावत बा |आरेs दौड़ा लोगिन होssssss | आकि तहरो लोगिन पर भूत चढ़ गईल बा ?......? आकि तहरो लोगिन भूत से डेरात बाड़ा लोगिन ?

पत्नी के प्रति
अभी कुछ ही दिन हुए
हमारी शादी को ,
जब एक ही गाँठ से
बंधे थे हम दोनों |
मैं बारात लेकर गया था
तुम्हारे घर |
और लगभग
अपहरण करता हुआ
लाया था तुम्हे
अपने घर |
फिर खोल दी गयी गांठे
कि मैं निस्सीम आकाश में
उड़ सकूँ ; कर सकूँ
जो भी करना है मुझे |
पर शायद ठीक से
गिरह खुली नहीं थी ,
क्योंकि आज भी
महसूस करता हूँ -
एक खिंचाव
तुम्हारी ओर |
शायद यही प्रेम है
जो आरक्षित रहेगा
सिर्फ तुम्हारे लिए |