बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

बात पिछला साल के ह |का जाने कहाँ दुनी से हमरा मन में बिचार आईल कि हमरा महापुरुष बने के चाहीं | जेतना कुल्हि किताब पढवाल गईल बा , जेतना ज्ञान के चर्चा ई दुनिया में भईल बा ; कुल्हि बात के इहे मतलब बा कि सब केहु के महापुरुष बने के चाहीं | ना त , महापुरुषों कि जीवनी -- किताब काहें पढ़ावल जाइत ? कवनों भर्तृ हरी कही गईल बाड़े कि जे महापुरष नईखे बनत , उ ई दुनिया में गदहा नियर बा |भले उ घास ना खाके ,चाउर-गेंहू खाता |त मोट बात ई कि महापुरुष बने के चाही ;आ सबका बने के चाहीं |इहे बात सोच बिचार के हम महापुरुष बने खातिर किरिया खइनीं |
अब बात आ गईल जे महापुरुष बने खातिर कईल का जाओ ? बिना कईले त ई दुनिया में भीख ले ना भेंटाला | ढेर सोच बिचार के हम फैसला कईनी जे एगो सोसाइटी बनावल जाऊ | काहें कि सभ महापुरुष लोग कवनो ना कवनो सभा भा सोसाइटी से जुडल रहे लोग | एही से हम चट देना एगो सोसाइटी बना लेहनी - महापुरुष बनाओ सोसाइटी | हमारा ई ना बुझाला जे सोसाइटी के नाम सोंस से काहें शुरू होला |सोंस त एगो मछर के नाव ह , जवन काटेलेसन त बुझाला जे खून के साथे परानो चूस लिहेंसन | जाये दिहिं, जे नाव धईले होइ उ कवनो समानता देखिये के नु धईले होइ ? एने हमार सोसाइटी तैयार त हो गईल बाकिर एहिमे अउरी लोग के जोडलो त जरूरी रहे | हम ढेर हाथ-गोड़ ध के कुछु लोग के जोवाइन करवनी | केहु के अध्यछ त केहु के सभापति बनावे के दिलासा देहनीं | हम खाली संजोजक बनि के रहि गईनी | बाकिर सब लोग से हम सकरववनीं जे हमर भाषण सुनला के बाद हमारा के महापुरुष कहे के परी | सभ लोग के माला पहिना के , बढ़िया खातिर बात निबहा के ,कुल्हि लोग के आउंज- गाउँज भासन सुनि के , कुल्हि लोग के झूठ साँच में मूड़ी डोला के जब हम हारि गईनी तब हम भासन देबे खातिर खड़ा भईनी | बाकिर ई का ? कुल्हि लोग घसक लिहल | माने हम अकेले बाँच गईनी ,अपना के महापुरुष कहे खातिर | पहिला परयास एकदमें असफल हो गईल |
बाकिर उ पहलवान कवन जवन घाव लागला पर कलपे लागे , अगिला दांव ना सीखो |चलीं , अब दोसर परयास कईल जाऊ | नया बेयार बहल रहे सफाई अभियान के | हमहूँ सोचनी जे एगो कर्मयोगी खातिर एकरा से बड़हन कवनो अवसर नईखे | अब हमरा के केहु महापुरुष बनला से नईखे रोक सकत | हम अकेलहीं नरदोह आ नाबदान के सफाई करे लगनी | हमार हित-मित्र लोग हमरा के छूतीहर कहे लागल | समाज से बायकाट के धमकी दिहल लोग | बाकिर हम सोच लेहले रहनीं जे भले हम मुड़ी कटा देंगे बाकिर निहुराएँगे नहीं |मर्द के बच्चा हैं ,महापुरुष बनिए के रहेंगे |
बाकिर पर-सुक्खे दुखी रहे वाला लोग के हमरा के महापुरुष बनत देखल नीक ना लागल | उ लोग जा के ओह जात केलोग के उकसा दिहल जवना के पुश्तैनी व्यवसाय नाली साफ कईल हा | का जे बिन्हाचल बाबा तहनी के पेट पर लात मरत बाड़े ; तहनी के रोजिगार खा जइहें |बस, ओकनी के कुल्हि टोला , मरद -जनाना ,बाल-बच्चा आके हमरा दुआर पर महाभारत ठान देहलेसन | हम समझावे के कोशिश कईनी जे संविधान हमरा के कइसनो काम करे के अधिकार देता | आ सफाई कईल खाली कवनो जात के बपौती ना हा | जबाब मिलल जे संबिधान ओहि लोग के जात के केहु बनवले रहे , जे आरक्षण के साथे सफाई के काम ओहि लोग खातिर रिजरब का देहल | जेह तरे पंडित लोग पंडिताई बना के पंडिताई अपने खातिर रिजरब क लिहल लोग | हम केतनो समझावे के कोशिश करीं बाकिर उ मानेके तईय्यार न भइलेसन | लोग बढ़ा-चढ़ा दिहले रहे | हम केतनो माताये -बहनें करते रही गईनी , ओकनी के महतारी -बहिन पर उतर गईलेसन |हम बुझ गईनी जे यहां न चलिहें राउर माया | हम हाथ जोरि के माफ़ी मांगनी जे फेन-फेन हम एहि तरीका से महापुरुष बने के कोशिश ना करेम | आ साफ- सफाई ओहि लोग से कराएब |भले ओह लोग के ना आईला पर घर सूअर के खोभार हो जाऊ | हमार दुसरको परयास असफल हो गईल |
अब हम सोचनी जे अब छोट मोट काम करि के महान बनल जाओ | जैसे अस्पताल में रोगी सेवा कईल ,झगरा के फरियावता कईल ,ढ़ेरी कुल्हि काम रहे जवना के कईला से आदमी महापुरुष बनि जाई आ दोसरा के आँखि में ना खटकी | हमार अधिके समय एहि कुल्हि काम में खरचा हो जाऊ | घर के कुल्हि काम हमार शिरिमति जी के करे के परि जाऊ | खाली हमरा मन में इहे रहो जे एक बेर , खाली एक बेर केहु हमरा के महापुरुष कही देऊ ; हमार सकल परयास सवारथ हो जाई | बिना तियाग के , कुछुओ ना मिलेला |
बाकिर सबसे अधिक तियाग त हमार घरनी करत रहली | गाई के दाना-पानी देहला से लेके बाल-बुतरू सरिहरला लेक | सगरो काम बेचारी बिना मुंह खोलले करि देस | आ रात बिरात घरे आईला पर हमरा के जवन भोजन पानी बनवले रहस , पिरेम से जीमा देस | फेनु बिहाने उठी के हम महापुरुष बने के फेरा में लागिये जाइ |
एहि बीच में एक दिन घरे आईला पर हम पुच्छनी जे का हो ? आज का बनल बा ?
‘ कुछऊ ना’ - उनकर जबाब रहे |
हम पूछनी जे काहें ?
उ कहली जे ढेर दिन से चाउर ओरा गईल बा आ गेंहू पिसाईले नइखे ?
हमरा इयाद परल जे चार दिन पहिले उ हमरा से गेंहू पिसवावे के कहले रहली |बाकिर हम महापुरुष बने के चक्कर में ई बात भुला गईल रहनीं | तबो, बड़ा लक्ष्य खातिर छोटा तियाग त करहिं के परी | हम चट देना जबाब देहनी जे का भईल |आटा नईखे , त गेंहू के भात बना लेहले रहितु | अब सम्बाद में अल्पविराम हो गईल बुझाइल जे शिरिमति जी कुछु सोचत बाड़ी | उ हमरा लगे आईली | कहली जे रउआ परुष ना ....... महापुरुष हई | चरनवा कहाँ बा राउर ? तनी छुए दिहिं | जवन भात गाई भैंस के खाए के दिहल जाला , अब हमार नसीब उहे खाए के हो गईल बा I बढ़नी मारो एह महापुरुष बनला के |
लिहिं, एतना दिन से हम महापुरुष कहाये खातिर खखुआइल रहनीं हा | अब तs हमार घरनिये महापुरुष कही देहली | बाकिर हमार बुझाइल नाs , जे हम महापुरुष बनला खातिर हँसी कि पुरुष पद से पदावनति खातिर रोईं | ओहि रात , हम भुखले रहि गईनी आ रात भर पुरुष आ महापुरुष के बीच में लड़ाई चलते रहि गईल | केहु कहे जे हम बड़ ,तs हम बड़ |
फेन बिहान भईल | किरिन उगल | अंजोर में सब साफ-साफ लउके लागल | हमहूँ फैसला कईनी जे हमरा के अउरी लोग त महापुरुष कही ना ; आ शिरिमति जी हमरा के पुरुष कहस -इहे हमरा खातिर जियादा जरूरी बा | एहि से हम निखालिस पुरुष बने के किरिया खईनी | आ महापुरुष बने के आशा सिकहर टाँग देहनीं | अब हम पुरुष बने के परयास करत बानी | गेंहू पिसवावत बानी | लईका खेलावत बानी |

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