आज कैलाश पर्वत पर अलगे नज़ारा बा | शिवजी एगो पहाड़ पर मुड़ी टिका के
आसमान निहारत बानी | हाव-भाव से बुझाता जे बड़ा दुखी बानी | महशिवरात्रि के
दिन हs , आज समूचा बरमांड में शिवजी के जय जयकार होला | आज के दिन शिवजी काहें दुखी बानी ? कवनो गहिर बात बा |
अर्धांगिनी पार्वतीजी पूजा के तइयारी करत बाड़ी ; बाकिर शिव जी के मन के
बात नईखी बुझ पावत |सोलहो सिंगार कईले माँ पार्वती भांग के गिलास शिव जी के
थमावत बाड़ी , तनी मुस्किया के… |बाकिर शिवजी मुड़ी घुमा के देखतो नईखीं ;
भांग के गिलास टरका देत बानी | ई का भईल ? “तवगुणनिर्जीदासोअहम्” कहेवाला
स्वामी हमारा से आ अपना प्रिय पेय से एतना विरक्त काहें ? कवनो गहिर बात बा
| आजुलेक स्वामीं के सगरो गुपुत रहस्य ना जान पवली पार्वती माता |
स्वामिभक्त बंसहा बैल कौड़ी-जड़ल गुदरी ओढले शिवजी के लगे खड़ा हो गईले ; उछाह में | आजु के दिने भोलबाबा नंदी पर विराजमान होके तीनो लोक के भ्रमण करेनी , लोग के चढ़ावा स्वीकार करेनी आ आशीर्वाद देनी |एहिमें लोग नंदी के भी तनी परसादी चढ़ा देला |शिवजी के ध्यान खींचे खातिर गर्दन में बान्हल घंटी के हिलवले......एक बेर ...दू बेर |शिवजी के अंतरिक्ष में तकला पर कवनो फरक ना पड़ल | बुईझ गईले जे कवनो गहिर बात बा |
पुत्र गणेश जी मूंस के सवारी करत ,लड्डू खात सीधे अपना महतारी के लगे घुस गईले | एहुतरे जबसे बाबूजी से झगड़ा भईल आ मुड़ी कटा गईल ,तबसे बाबूजी के पंजरा जाये से डेराले | एहतरे आज बाबूजी के सोच में डूबल देख के बुझ गईलेहान जे कवनो गहिर बात बा | फरके रहला में भलाई बा |
“ नारायण ,नारायण” कहत नारद जी जैसेहीं कैलाश पर अईले उनका मन पड़ल कि आज शिवरात्रि हs | तुरंते “नमः शिवाय -नमः शिवाय” बोले लगले | शिवजी के तन्द्रा टूटल |
“नारद जी , आज नमः शिवाय काहें हो ?”
“भोलेबाबा, आज शिवरात्रि हा | सगरो दुनिया नमः शिवाय हो गईल बा त हम काहें ना ?बाकिर रउआ घर में उदासी काहे बा ?”
“कुछुओ ना |” - आँख के लोर सम्हारत शिवजी पूछ देहनी ---- “कार्तिकेय के कवनो पता ठेकान मालूम भईल हा , नारद जी ? जबसे घर छोड़ के गईल बाड़े हमरा कवनो खोज खबर नईखे मिलत |”
“एकदम चउकस !” --- नारद जी जवाब देहले --- “कार्तिकेय बाबू आजकल मल्लिकार्जुन पर्वत पर डेरा जमा लेहले बाड़े | तमाम दखिन के लोग उनका के आपन मालिक मान लेहले बा | इन्द्र के बेटी देवसेना से बियाह क के मजे में बाड़े राउर बड़का लईका |चिंता के कवनो बात नईखे |अच्छा हमरा के चले के आज्ञा दिहिं |”
नारद जी “नारायण-नारायण” कहत प्रस्थान क गईले |
‘‘नारद जी घरियो छन खातिर एक जगहे ना टिकेले | तनी रुकते तs बड़का लइकवा के अउरी कुल्हि हाल चाल सवाच लीति |” --शंकर जी के ई सोचला में उनकर अंदर के बाप के दरद साफ़ छलकत रहे |
कहे खातिर शंकर जी के दू गो लईका , बात मानेवाली मेहरारू , छोटमोट नौकर-चाकर आ गृहस्थी----सब कुछु रहे |बाकिर बड़का लईका माई बाप से खिसिया के अलगा रहे लागल | शिवजी के पुरान बात इयाद परि गईल |
हेतिचुकी बात लमहर हो गईल आ शिवजी के गरदन के फँसरी बन गईल | हाराहुशी में दुनू लईका लड़ पडलेसन जे केकर पहिले पूजा होइ |कायदे से त जेठ लईका के ई अधिकार मिले के चाही , बाकिर छोटका रहे माई के दुलरुआ | आ शंकरो जी कवनो पक्षपात में ना पड़े के चहनी | रास्ता निकालल गईल जे पहिले ओकर पूजा होइ जे धरती के चक्कर पहिले लगा के आई | कार्तिकेय बबुआ बड़ा हुशियार रहे | चट देना अपना असवारी पर बईठल आ धरती के चक्कर लगावे निकल गईल | आखिर काबिल सवांग रहे उ | गणेश बबुआ भारी देह - आ मूंस सवारी | बुझ गईले जे अब हारेवाला बानी | एही से दोसर जुगुति निकलले | आ खाली माई बाबू के प्रदक्षिणा कर के पहिले पूजे के वरदान ले लेहले | तब जाके कहीं हारल-पाछल बड़का बबुआ आयिल | एने फैसला हो गईल रहे | ई सुन के ओकरा बड़ा दुःख भईल | न्याय खातिर अरदास कईलस |
फेनु शिवजी सोचे लगनी | “मन में दुविधा ओहु बेरा रहे | न्याय के स्पष्ट परिभासा के अनुसार बात गलत रहे | अगर जुगुति से फरियावता होखे के रहल हा त उ खड़े खाड़ी प्रदक्षिणा क के जीत गईल रहित | आखिर एहुंगा त प्रदक्षिणा के नियम शास्त्र में बतावल गईल बा | एगो लईका के पक्ष खातिर दोसर लईका के हक़ मारल साफ़ लउकत रहे | बाकिर हम कुछुओ ना करि पवनीं | कुछु पार्वतीजी के तरफ से दवाब रहे आ कुछु बिधना के इहे मंजूर रहे |बाकिर अफ़सोस एह बात के होला जे जब बड़का लईका घर छोड़ के जाये लागल त हम दाढ़ी ध के निहोरा काहें ना कईनी ? ….. मना काहें ना लेहनी ? …….काहें ना अँकवारी में भर के रोवे लगनी ?..........जे ना बबुआ जवन भईल तवन भईल बाकिर तहरा के अलगा ना जाये देम |……. काहे ना ओकर गोड़ छान लेहनी ? ………..आखिर अपने जमलका नु रहे ?"
शिवजी के भीतर के बाप जाग जाला हर शिवरात्रि में |
“ एतना कुल्हि मर-मिठाई में बड़को के नु हिस्सा बाटे |”
स्वामिभक्त बंसहा बैल कौड़ी-जड़ल गुदरी ओढले शिवजी के लगे खड़ा हो गईले ; उछाह में | आजु के दिने भोलबाबा नंदी पर विराजमान होके तीनो लोक के भ्रमण करेनी , लोग के चढ़ावा स्वीकार करेनी आ आशीर्वाद देनी |एहिमें लोग नंदी के भी तनी परसादी चढ़ा देला |शिवजी के ध्यान खींचे खातिर गर्दन में बान्हल घंटी के हिलवले......एक बेर ...दू बेर |शिवजी के अंतरिक्ष में तकला पर कवनो फरक ना पड़ल | बुईझ गईले जे कवनो गहिर बात बा |
पुत्र गणेश जी मूंस के सवारी करत ,लड्डू खात सीधे अपना महतारी के लगे घुस गईले | एहुतरे जबसे बाबूजी से झगड़ा भईल आ मुड़ी कटा गईल ,तबसे बाबूजी के पंजरा जाये से डेराले | एहतरे आज बाबूजी के सोच में डूबल देख के बुझ गईलेहान जे कवनो गहिर बात बा | फरके रहला में भलाई बा |
“ नारायण ,नारायण” कहत नारद जी जैसेहीं कैलाश पर अईले उनका मन पड़ल कि आज शिवरात्रि हs | तुरंते “नमः शिवाय -नमः शिवाय” बोले लगले | शिवजी के तन्द्रा टूटल |
“नारद जी , आज नमः शिवाय काहें हो ?”
“भोलेबाबा, आज शिवरात्रि हा | सगरो दुनिया नमः शिवाय हो गईल बा त हम काहें ना ?बाकिर रउआ घर में उदासी काहे बा ?”
“कुछुओ ना |” - आँख के लोर सम्हारत शिवजी पूछ देहनी ---- “कार्तिकेय के कवनो पता ठेकान मालूम भईल हा , नारद जी ? जबसे घर छोड़ के गईल बाड़े हमरा कवनो खोज खबर नईखे मिलत |”
“एकदम चउकस !” --- नारद जी जवाब देहले --- “कार्तिकेय बाबू आजकल मल्लिकार्जुन पर्वत पर डेरा जमा लेहले बाड़े | तमाम दखिन के लोग उनका के आपन मालिक मान लेहले बा | इन्द्र के बेटी देवसेना से बियाह क के मजे में बाड़े राउर बड़का लईका |चिंता के कवनो बात नईखे |अच्छा हमरा के चले के आज्ञा दिहिं |”
नारद जी “नारायण-नारायण” कहत प्रस्थान क गईले |
‘‘नारद जी घरियो छन खातिर एक जगहे ना टिकेले | तनी रुकते तs बड़का लइकवा के अउरी कुल्हि हाल चाल सवाच लीति |” --शंकर जी के ई सोचला में उनकर अंदर के बाप के दरद साफ़ छलकत रहे |
कहे खातिर शंकर जी के दू गो लईका , बात मानेवाली मेहरारू , छोटमोट नौकर-चाकर आ गृहस्थी----सब कुछु रहे |बाकिर बड़का लईका माई बाप से खिसिया के अलगा रहे लागल | शिवजी के पुरान बात इयाद परि गईल |
हेतिचुकी बात लमहर हो गईल आ शिवजी के गरदन के फँसरी बन गईल | हाराहुशी में दुनू लईका लड़ पडलेसन जे केकर पहिले पूजा होइ |कायदे से त जेठ लईका के ई अधिकार मिले के चाही , बाकिर छोटका रहे माई के दुलरुआ | आ शंकरो जी कवनो पक्षपात में ना पड़े के चहनी | रास्ता निकालल गईल जे पहिले ओकर पूजा होइ जे धरती के चक्कर पहिले लगा के आई | कार्तिकेय बबुआ बड़ा हुशियार रहे | चट देना अपना असवारी पर बईठल आ धरती के चक्कर लगावे निकल गईल | आखिर काबिल सवांग रहे उ | गणेश बबुआ भारी देह - आ मूंस सवारी | बुझ गईले जे अब हारेवाला बानी | एही से दोसर जुगुति निकलले | आ खाली माई बाबू के प्रदक्षिणा कर के पहिले पूजे के वरदान ले लेहले | तब जाके कहीं हारल-पाछल बड़का बबुआ आयिल | एने फैसला हो गईल रहे | ई सुन के ओकरा बड़ा दुःख भईल | न्याय खातिर अरदास कईलस |
फेनु शिवजी सोचे लगनी | “मन में दुविधा ओहु बेरा रहे | न्याय के स्पष्ट परिभासा के अनुसार बात गलत रहे | अगर जुगुति से फरियावता होखे के रहल हा त उ खड़े खाड़ी प्रदक्षिणा क के जीत गईल रहित | आखिर एहुंगा त प्रदक्षिणा के नियम शास्त्र में बतावल गईल बा | एगो लईका के पक्ष खातिर दोसर लईका के हक़ मारल साफ़ लउकत रहे | बाकिर हम कुछुओ ना करि पवनीं | कुछु पार्वतीजी के तरफ से दवाब रहे आ कुछु बिधना के इहे मंजूर रहे |बाकिर अफ़सोस एह बात के होला जे जब बड़का लईका घर छोड़ के जाये लागल त हम दाढ़ी ध के निहोरा काहें ना कईनी ? ….. मना काहें ना लेहनी ? …….काहें ना अँकवारी में भर के रोवे लगनी ?..........जे ना बबुआ जवन भईल तवन भईल बाकिर तहरा के अलगा ना जाये देम |……. काहे ना ओकर गोड़ छान लेहनी ? ………..आखिर अपने जमलका नु रहे ?"
शिवजी के भीतर के बाप जाग जाला हर शिवरात्रि में |
“ एतना कुल्हि मर-मिठाई में बड़को के नु हिस्सा बाटे |”
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