बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

समोसे-समोसे ,दस के चार समोसे
लय में चिल्लाते हुए ,
धनिये लहसुन की चटनी की महक
जनरल डिब्बे में फैलाते हुए ,
एक वेंडर बेंच रहा था समोसे
भटनी जंक्शन पर |
भूख तो थी नहीं
(घर से खाकर चला था)
पर अविवेकी उपभोक्ता जो हूँ
ले ही लिया पांच के दो |
(गमकती हुयी चटनी का लोभ )
परन्तु ,हुआ क्षोभ-
मिर्च ज्यादा थी समोसे में |
और पेट ख़राब होने का डर |
इसलिए समोसा -
खिड़की से बाहरटरका दिया |
समोसे के लिए
थी मेरी ऋणात्मक सीमांत उपयोगिता |
सामने की सीट पर थे एक दम्पति |
मरियल बीबी ; दुबला पति |
तीन बच्चे भी थे उनके इर्द गिर्द -
समोसे के लिए चिल्लाने लगे |
दस के चार खरीदे गए समोसे तो
छीना झपटी मचाने लगे |
मेरे अर्थशास्त्र ने गणना किया
एक-एक तीन बच्चे पाएंगे,
शेष एक में पति पत्नी खाएंगे |
जिसकी जितनी सीमांत उपयोगिता
उतने ही समोसे दिए जायेंगे |
पर माँ ने दो समोसे अलग किया ;
एक कागज पर मसल दिया |
इन दो समोसों में से तीनों बच्चों को
बराबर हिस्से दिए गए |
शेष दो समोसे बाद में खाने के लिए
झोले में रख दिए गए |
अर्थशास्त्र गलत साबित हुआ
फिर एक बार ; हमेशा की तरह |

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