बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

शनिवार, 20 सितंबर 2014

रेS , मुए वाला बिया उ बुढ़िया माई !
मोर माई ,तोर माई , जवार के माई !
ढेर दिन से रहली हा बेमार I
केहु लउकत ना रहल हा तीमारदार I
जबसे बुढ़िया के बक्सा खोलाईल हा I
नगदे लोग बिटोराईल हा I
अब तहनि के छोड़ाS सन सेवा पानी कइल I
बुढ़िया के आपन कहाये वाला लोग आ गईल I
बढ़नी मारो कु-रहनी के !
भाग सन तहनि के !
अशुद्ध ;नीच ----
तहनि के नाश करि देहला सन I
बाहर जा के चुपचाप बइठा सन I
अब बुढ़िया के घीव मलल जाइ I
रेशम के कफ़न में लपेटल जाइ I
चारि आदमी कान्हा पर उठाई I
ले जा के दफ़न करि आई ; शमशान में I
थोरे दिन खूब हो-हाला रही ; श्राद्ध के I
सब लोगन के राय होइ
त तहनियो के बोलावल जाइ I
आके खूब रोइहां सन, माई ! माई !
फेनु साल साल भर पर बरखी मेटावल जाइ I
बस ओहि दिने बुढ़िया के करनी के गावल जाइ I
तब तहनि के ना बोलावल जाइ I
अशुद्ध ! नीच !
राउर बोली चाहे भासा ,चचा,
बहुत्ते मधुर छै I
दरभंगिया के भाषा, चचा,
करइ छै , बुझइ छै I
पहिले -पहिल त कुछुओ ना बुझाउ I
छि-छा कहि के हमन के करथिन जा मज़ाक I
बाकिर जिकिर जब ---
मलदहिया आम क, रोहू क -
तीसी क, कोल्हू क -
चिउरा क, दही क -
अदौरी क, बरी क -
आवै चचा !
राउर कवित्त चचा, कुछु-किछु तS बुझाउ I
बाकिर तबहुँ एगो लमहर गैप रहि जाऊ -
भाषा के I
चचा !
जदि नागार्जुन बन के रउआ हिंदी में ना लिखले रहितीं I
त राउर भासा के सुगढ़ता के -
राउर बोली के मधुरता के -
मरम हम कैसे पइतीं ?
एही से , आज के हिंदी दिवस पर,
हे यात्री चचा ! हे नागार्जुन बाबा !हे वैद्य नाथ मिसिर जी !
रउआ के दिल से धन्यवाद !
बहुत अच्छा है अगर किसी की लाज बचा ली जाये !
पर इसके लिए क्यों किसी की पगड़ी उछाली जाये !
मनहूस शहर में एक तू ही बचा था दोस्त मेरा
चल , अब तुझसे भी अदावत पाली जाये !
 जमाना सिर्फ मेरी बुराईयों पर गौर करता है !
अच्छाई जो भी करता है कोई और करता है !
बहुत नाज़ुक हो गए आजकल रिश्तों के धागे
तुरंत ही टूट जाते है जब भी जोर पड़ता है !
बहुत गुलज़ार थी उनकी हवेली चार बच्चों से
अब सबकी हुयी शादी यहाँ पर कौन रहता है !
जब भी मिले यह शख्श जम कर पीटना इसको
पकाता है बहुत जब फेसबुक पर शेर कहता है !
कि ताकत आजमाया जा रहा है
मुझे गदहा बनाया जा रहा है I

फकत घास है किस्मत में मेरे
मुझे ये भी सिखाया जा रहा है I

अंगूर मेरी नज़रों से हटाकर
उसे खट्टा बताया जा रहा है I
ख़बर है कि मेरे पीठ पीछे
कोई खिचड़ी पकाया जा रहा है I
उसे मालूम है वो पहले कटेगा
जो बकरा ज्यादा खिलाया जा रह है I
वो भी हंस रहा है आज सब पर
जिसकी खिल्ली उड़ाया जा रहा है I
रात होने तो दे उसे सब दिखेगा
जिसे उल्लू बनाया जा रहा है I
कहीं से तर्ज़ कहीं से हर्फ़ लेकर
इस ग़ज़ल को बनाया जा रहा हैI
फिर से वही कहानी मैं सुनाये जा रहा हूँ I
पुरानी गलतियों को ही दुहराये जा रहा हूँ I
जानता हूँ जेब में खंजर लिए हुवे है
उन दुश्मनों को भी गले लगाये जा रहा हूँ I
मुफलिसी में काम आएगी जो मेरी दौलत
दोनों ही हाथों से उसे लुटाए जा रहा हूँ I
यूं तो मेरे जिगर में हैं जख्म बड़े गहरे
दुनिया के लिए ही सही मुस्कुराये जा रहा हूँ I
तुम भी पीठ पीछे मुझे उल्लू ही कहोगे
जो अपने सारे ऐब मैं बताये जा रहा हूँ I
जिंदगी अब तो दोराहे पर खड़ी है I
किस तरफ जाएँ यही दुविधा बड़ी है I
इस डगर का लक्ष्य से रिश्ता नहीं है ;
और दूसरी मुश्किलों से भरी पड़ी है I
वक्त है कि सोचने तक भी न रूकता
और हमको सोचने की जल्दी पड़ी है I
क्या करें ?जाएँ कहाँ ?-यह है समस्या
किंकर्तव्यविमूढ़ता सम्मुख खड़ी है I
हे प्रभु! संत्रास हरो ! अवलम्ब तुम हो !
सिवा तेरे संभावना अब तो नहीं है !


लात-जूता , लाठी-घूँसा
दुलार –पुचकार, झिड़की -दुत्कार
हार-पर-हार , बिपत अपार
मिलल सब ; बाकिर हम -
उहे कइनी जवन मन में धईनी !
मन में धईनी ,मनन कइनी
सोच-विचार , क्रिया-व्यौहार
जीत चाहे हार
सगरों परिनाम-
के खाली हम जिम्मेदार !
हम जिम्मेदार ---
त गांव -समाज के का सरोकार ?
का सरोकार ?
बुद्धि -विचार , धन -व्यौपार
क्षण भर के साथ, सहारा के हाथ
समाज ना देला !
त समाज का देला ?
लात-जूता , लाठी –घूँसा
दुलार –पुचकार, झिड़की -दुत्कार
हार-पर-हार , बिपत अपार …………………….
राम-राम ! हे राम !

बुधवार, 3 सितंबर 2014

जो बीत गये कुछ साल बिना कुछ किये हुये ही......
जो रीते-से कुछ पल गुजरे है,बिना ह्रुदय छुये ही....
जो स्व्प्न अधूरे छूट गये क्या उनसे मिलने जाऊ मै
य़ा नये सपनो की दुनिया की ओर घूमने जाऊ मै
यह जन्मदिवस का द्व्न्द्व हमेशा आ जा ता है
कुछ खुशियो का उपहार भी लिये आता है
युग बीते करते प्रयास
पुरे न हुए मन के आश
जीवन पथ का पिछला वर्ष
थोड़े गम तो थोड़े हर्ष
कुछ मस्त फूल कुछ त्रस्त शूल
कुछ नए सबक कुछ नयी भूल
हे, जीवन पथके गत साल
लू विदा मै तुमसे अब सोल्लास
पुनः कुछ करने है प्रयास
पूरे करने है कुछ आश
ये दीपों का त्योहार , बंधु !
लाये जीवन में प्यार ,बंधु !
फैले चहुँ ओर उजास ,बंधु !
सफल हों सबके प्रयास , बंधु !
घर भरा रहे खुशियों से , मित्र !
बर्फी ,मोदक , गुझियों से ,मित्र !
भस्म हो सारे दुर्योग , मित्र !
पुष्पित हो सुखद सुयोग , मित्र!
बस यही दुआ है -
जल उठे सब झालरों की लाईटे
जो कल लिया था आपने बाज़ार से !
और कमतर ही मिले मिलावटें
उन लड्डुओं में -
जो मिले थे पास की दुकान से !
और फुस्स स न बजे धम्म से बजे
वो चाइनीज़ पटाखे
जो खूब महंगा जानकर आपने लियाथा !
औए सबकुछ ठीक वैसे ही चले
जैसा की प्लानिंग आपने पहले किया था !
आपको दीपोत्सव की मेरी शुभ कामना है !
बस यही दुआ है !!!!!!
गत वर्ष सहर्ष सोल्लास गया
अब नूतन वर्ष का स्वागत कीजिये
इस वर्ष करेंगे नया कुछ ही
नये इस साल में यह प्रण लीजिये
जो प्राप्त हुए अक्षुण्ण रहे
अप्राप्त फलों को भी हस्तगत कीजिये
क्षमा हो, विलम्ब हुआ है मगर
नव वर्ष कि मेरी शुभकामना लीजिये
दाढ़ी के दो पके बाल !
काले बालों से अधिक प्रखर श्वेताभ छटा,
युवा तन के परदे को एक ओर हटा,
करने आये प्रौढ़ावस्था को स्वागत प्रणाम !
दाढ़ी के दो पके बाल !
" क्या अब से ही गत यौवन" कर लूँ स्वीकार ?
कदापि नहीं इतनी जल्दी मानूंगा हार ,
अब तक किया केश रञ्जित अबकी बार ,
नहीं बचेंगे दाढ़ी के दो पके बाल !!!!!
दाढ़ी के दो पके बाल !
एगो चप्पल नया किनाइल पिछला खिचड़ी के मेला में !
अबले धईले बाड़े काका पैकिंग सहित्ते झोरा में !
जब जइहें ससुरारी ओहिदिन पैकिंग उ खोलिहें !
भले पैकिंग खोल दीन्हे बाकिर गोड़ में न डलिहें !
हाथ में चप्पल कान्हे कुरता ससुरारी टांगले जइहें !
जब सीवान नियराई देह में कुरता तब डलिहें !
चप्पल के त पारी आई ससुर जी के दुअरा पर !
हाथ के चप्पल गोड़ में जाई सरहज के पाँव छूवला पर !
बहुते नया चप्पल बा पाहून सारिन सारहा जब कहिहैं !
फाटल गोड़ के पीर भुला खूब ठठा के काका हसिहें !
फेन बिदाई के बेरा हाथे चप्पल कान्हे कुरता !
घरे वापस अइहें काका खेते खेते घूमता फिरता !
कुरता खूँटी पर टाँगल जाई चप्पल जाई बक्सा में!
दुन्नु के फेर नंबर आई अगिला ससुरारी जात्रा में !
शहर के एक कोने मेरी एक दुकान थी !
इसकी अपनी उम्दा आन बान शान थी !
न अपना धंधा मंदा था न कोई काम गन्दा था!
बड़ी शोहरत थी मेरी कि मै एक नेक बंदा था !
न दोयम कभी बेंचा न लूटा किसी को !
न ही एक रत्ती कम कभी तौला किसी को !
शहर के लोग मुझसे खुशनुमा व्यवहार रखते थे!
मेरी तारीफ करके मुफ्त में प्रचार करते थे !

मेरे बेटे ने संभाली है गद्दी आजकल में !
बड़ा तब्दील अाया है मेरे खुद के चलन में !
अब मै झूठ को भी सच ही कह कर बेंचता हूँ!
जितना झींट सकता हूँ किसी से ;झींटता हूँ !
मेरी इज्जत को बेटे ने सरेआम फींच कर !
बैनर बना कर टांग दी है चौक पर !
इसकी उसकी इज्ज़तों में अब न कोई फर्क है!
साथ वाले बैनरों के एक जैसे हर्फ़ है!
जिनकी सोहबत में मसें भींगी, जवान हुए .
ऐसे दोस्त तो रोज़ी रोटी में परेशान हुए .
बेडा गर्क तो साथ की लड़कियों ने किया
जब उनको शौहर मिलें तो हम भाईजान हुए .
अपनी नाकामियों का इल्म तब पेश्तर हुआ
कुछ के गोद में बच्चे थे हम उनके मामूजान हुए !
दरवाजा खुलेगा एक - ब - एक ,तुम भीतर खींचे जाओगे !
उस लड़की के घर पर तुम पुरकस पीटे जाओगे !
जिन हांथों को गए मांगने अब्बा की जागीर समझ
उन हाथों की नेमत होंगी जूते चप्पल खाओगे !
अकड़ू बन कर घूम रहे हो जिस सरकारी नौकरी पर
बेवजह मुकदमा ले करके नौकरी अपनी छुड़वाओगे !
साथ जिएंगे साथ मरेंगे ये सब फिल्मी बातें है
लड़की ही ना कह देगी तुम चु ..(उल्लू )बन जाओगे !
चलो मिया अब जिद छोडो ये नौटंकी बहुत हो गयी
रिश्तेदार जान गए तो शादी भी न कर पाओगे !
जब मैं---
सबसे ज्यादा थका हुआ था !
असफलता के बड़े बोझ से
दबा हुआ था !
खैरियत तुमने
उसी समय पूछा था -
बड़े ही कुटिल अंदाज़ से !
मैं बिलबिला उठा ,मानों -
किसी ने जख्म कुरेद दिए हो,
हाथ से!
और मल रहा हो नोन उसपर
ठाट से !
चार पैसे हाथ में ला पाये तो तुम आज़ाद हो
कल के लिए दो रोटियां भी बचाये तो तुम आज़ाद हो
देह से पहले तुम्हारे स्वप्न बूढ़े हो गए
उनको मरने से बचा पाये तो तुम आज़ाद हो
रेत बनती जा रही है भाई चारे की जमीन
फूल कोई उसमे खिला पाये तो तुम आज़ाद हो
हर तरफ से लुट रही दौलते -हिन्दोस्तान
एक मुट्ठी तुम उड़ा लए तो तुम आज़ाद हो
हशिए से भी बहुत दूर बैठे हैं कई
हाशिये के भी करीब आये तो तुम आज़ाद हो
आत्महत्या के इरादों ने किया भरी सितम
ज़िंदा अगर खुद को बचा पाये तो तुम आज़ाद हो
चौराहे पर नंगी होकर
एक औरत रोज़ नहाती है !
पानी की पाइप केवल
चौराहे तक जाती है !
बेशर्म भीड़ की नज़रों में
न खून है, ना ही पानी है !
यह आज़ादी का नव
अर्थशास्त्र है ,समाजशास्त्र है !
दबे कुचले सिर्फ
दया के पात्र हैं !
यह भारत के ट्रांजीशन का
बर्निंग फैक्ट हैं !
यह सत्ता का जनता से
कॉन्सील्ड पैक्ट हैं !
यह नूतन समाजवाद हैं
ट्रिकल डाउन इफ़ेक्ट हैं !
शान बढे कुछ काम दिखाओ ऐसा
एक तिरंगा फहराने से क्या होता है !
बीत गए युग नव आशाओं वाले !
दूर क्षितिज पर घुमड़ रहें है बादल काले !
अन्न -प्रसवा धरती ही अब डायन बन गयी
निगल रही है खुद ही वह जीवन के दाने !

फूल खिले तुम बीज लगाओ ऐसा
टूटे फूलों को छितराने से क्या होता है !
शान बढे कुछ काम दिखाओ ऐसा
एक तिरंगा फहराने से क्या होता है !
कहाँ गयी वह ओज पुरानी वाली !
पत्थर पिघलाकर नीर बनानेवाली !
घोष गूंजता था जिसका कोने कोने में
कहाँ गयी वह मुखरित वाणी हमारी !
तन झूम उठे तुम गीत सुनाओ ऐसा
मुर्दा भाषण पढ़ जाने से क्या होता है !
शान बढे कुछ काम दिखाओ ऐसा
एक तिरंगा फहराने से क्या होता है !
सहारा छोड़ दो साहिल पे आओ सबने मुझसे ये कहा
कैसे बताऊँ मुझसे जुदा होकर सहारा डूब जायेगा
बहुत अच्छा है अगर किसी की लाज बचा ली जाये !
पर इसके लिए क्यों किसी की पगड़ी उछाली जाये !
मनहूस शहर में एक तू ही बचा था दोस्त मेरा
चल , अब तुझसे भी अदावत पाली जाये !
रउआ देखनी ह ;मुँहवा- साँच के ?
पुरनका ना ; टटका ,आज के ?
करिया बा ?
आ कइसन ओकर बाबडिया बा ?
लोग कहत रहल हा गोर बा
झुलुफियो मुड़िया पर थोर बा !
रउआ देखनी हा कपडा लत्ता ?
आ लोगवा देखल हा लंगटा !
लोग लाबजा बा की रउआ जी ?
रउआ साँच बोलतानी की बनौआ जी ?
अब एकर कवन परमान हा :कवन जाँच हा ?
जाये दी ! सभकर आपन आपन साँच हा !
 जमाना सिर्फ मेरी बुराईयों पर गौर करता है !
अच्छाई जो भी करता है कोई और करता है !
बहुत नाज़ुक हो गए आजकल रिश्तों के धागे
तुरंत ही टूट जाते है जब भी जोर पड़ता है !
बहुत गुलज़ार थी उनकी हवेली चार बच्चों से
अब सबकी हुयी शादी यहाँ पर कौन रहता है !
जब भी मिले यह शख्श जम कर पीटना इसको
पकाता है बहुत जब फेसबुक पर शेर कहता है !
तुमने कल जो बात कही थी ,अच्छी थी !
कुछ बातें तो उनमें बिलकुल सच्ची थी !
ऐब ज़माने भर के मुझमें है लेकिन
कल तुमने कुछ ज्यादा ही पी रक्खी थी !