बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

बुधवार, 3 सितंबर 2014

शान बढे कुछ काम दिखाओ ऐसा
एक तिरंगा फहराने से क्या होता है !
बीत गए युग नव आशाओं वाले !
दूर क्षितिज पर घुमड़ रहें है बादल काले !
अन्न -प्रसवा धरती ही अब डायन बन गयी
निगल रही है खुद ही वह जीवन के दाने !

फूल खिले तुम बीज लगाओ ऐसा
टूटे फूलों को छितराने से क्या होता है !
शान बढे कुछ काम दिखाओ ऐसा
एक तिरंगा फहराने से क्या होता है !
कहाँ गयी वह ओज पुरानी वाली !
पत्थर पिघलाकर नीर बनानेवाली !
घोष गूंजता था जिसका कोने कोने में
कहाँ गयी वह मुखरित वाणी हमारी !
तन झूम उठे तुम गीत सुनाओ ऐसा
मुर्दा भाषण पढ़ जाने से क्या होता है !
शान बढे कुछ काम दिखाओ ऐसा
एक तिरंगा फहराने से क्या होता है !

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें