बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

शनिवार, 20 सितंबर 2014

राउर बोली चाहे भासा ,चचा,
बहुत्ते मधुर छै I
दरभंगिया के भाषा, चचा,
करइ छै , बुझइ छै I
पहिले -पहिल त कुछुओ ना बुझाउ I
छि-छा कहि के हमन के करथिन जा मज़ाक I
बाकिर जिकिर जब ---
मलदहिया आम क, रोहू क -
तीसी क, कोल्हू क -
चिउरा क, दही क -
अदौरी क, बरी क -
आवै चचा !
राउर कवित्त चचा, कुछु-किछु तS बुझाउ I
बाकिर तबहुँ एगो लमहर गैप रहि जाऊ -
भाषा के I
चचा !
जदि नागार्जुन बन के रउआ हिंदी में ना लिखले रहितीं I
त राउर भासा के सुगढ़ता के -
राउर बोली के मधुरता के -
मरम हम कैसे पइतीं ?
एही से , आज के हिंदी दिवस पर,
हे यात्री चचा ! हे नागार्जुन बाबा !हे वैद्य नाथ मिसिर जी !
रउआ के दिल से धन्यवाद !

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