बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

शनिवार, 20 सितंबर 2014

लात-जूता , लाठी-घूँसा
दुलार –पुचकार, झिड़की -दुत्कार
हार-पर-हार , बिपत अपार
मिलल सब ; बाकिर हम -
उहे कइनी जवन मन में धईनी !
मन में धईनी ,मनन कइनी
सोच-विचार , क्रिया-व्यौहार
जीत चाहे हार
सगरों परिनाम-
के खाली हम जिम्मेदार !
हम जिम्मेदार ---
त गांव -समाज के का सरोकार ?
का सरोकार ?
बुद्धि -विचार , धन -व्यौपार
क्षण भर के साथ, सहारा के हाथ
समाज ना देला !
त समाज का देला ?
लात-जूता , लाठी –घूँसा
दुलार –पुचकार, झिड़की -दुत्कार
हार-पर-हार , बिपत अपार …………………….
राम-राम ! हे राम !

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