बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

शनिवार, 20 सितंबर 2014

जिंदगी अब तो दोराहे पर खड़ी है I
किस तरफ जाएँ यही दुविधा बड़ी है I
इस डगर का लक्ष्य से रिश्ता नहीं है ;
और दूसरी मुश्किलों से भरी पड़ी है I
वक्त है कि सोचने तक भी न रूकता
और हमको सोचने की जल्दी पड़ी है I
क्या करें ?जाएँ कहाँ ?-यह है समस्या
किंकर्तव्यविमूढ़ता सम्मुख खड़ी है I
हे प्रभु! संत्रास हरो ! अवलम्ब तुम हो !
सिवा तेरे संभावना अब तो नहीं है !


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