बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

बुधवार, 3 सितंबर 2014

चौराहे पर नंगी होकर
एक औरत रोज़ नहाती है !
पानी की पाइप केवल
चौराहे तक जाती है !
बेशर्म भीड़ की नज़रों में
न खून है, ना ही पानी है !
यह आज़ादी का नव
अर्थशास्त्र है ,समाजशास्त्र है !
दबे कुचले सिर्फ
दया के पात्र हैं !
यह भारत के ट्रांजीशन का
बर्निंग फैक्ट हैं !
यह सत्ता का जनता से
कॉन्सील्ड पैक्ट हैं !
यह नूतन समाजवाद हैं
ट्रिकल डाउन इफ़ेक्ट हैं !

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