बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

उबल रहा था दर्द
ह्रृदय में धीमे - धीमें |
संपीड़ित कर दिया गया था
कई महीने |
आँखें नम होती थी जब
तनिक भाप रिसती थी |
खदबद -खदबद की आवाजें
निकली बनकर सिसकी थी |
कुछ अंदर ही अंदर
राख हुआ जाता था |
जो कुछ रसमय था
ख़ाक हुआ जाता था |
फिर दर्द को भी तब
कहाँ शेष बचना है ?
बर्तन ढक्कन सब
तहस नहस होना है |
दर्द उबलकर जभी
भाप बन जाए |
तभी कहीं वह
खुलकर बाहर आये |

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