बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

रविवार, 26 अप्रैल 2015

बरखा रानी
बरखा करिहैं |
खड़ा फसल के
खेत उपटिहैं |
उफर परिेहैं ;
असगुन उचरिहैं|
ना चरिहैं त
मरुस्थल में |
ना पर्वत के
आँगन में |
ना सूखल झरही
के जल में |
ना आग जरत
दहकत वन में |
ना भर हीक
पियासल के मन में |
अपने मन में
ई अगरइहैं |
कबो अइहैं ;
कबो ना अईंहैं |
अपने कुल-भतार के खईहैं |
रांड होइ
पायल झमकइहें |
अपने नांव
कुलबोरनी धरइहैं |
तब बरखा रानी
काहें कहइन्हें |
बरखा रानी !

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