बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

रविवार, 27 दिसंबर 2015




आओ फिर ,खुशबुओं के शहर में चलें |
रंग हँसतें जहां, फूलों के घर चलें |
********एक तितली इशारा किये देती है
*******एक कोयल भी आवाज-सी देती है
भौरें स्वागत के गीत गुनगुनाते चलें |
आओ फिर खुशबुओं के शहर में चलें |
रंग हँसतें जहां फूलों के घर चलें |





*******नर्म धूप ने चादर बिछा रक्खी है
****** धर हवाओं की उंगली बिठा रक्खी है
दिन भी पसरा हुआ है घास पर -अनमने |
आओ फिर खुशबुओं के शहर में चलें |
रंग हँसतें जहां फूलों के घर चलें |




********मन तो चाहे अभी धूप में लेटना
********* तेरी जांघो पर अपना सर टेकना
धूप चेहरे की छाया हो तेरे आँचल तले |
आओ फिर खुशबुओं के शहर में चलें |
रंग हँसतें जहां फूलों के घर चलें |

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