क्रमांक -एक
अलसायी हुई धूप घास के मैदान में पसरी हुयी है | बदरी अपनी सहेलियों
के संग आसमान में धमा चौकड़ी मचा रही है | परेशानी में धूप कभी इस करवट तो कभी उस करवट
होकर लेटती है , बदरी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता | दुपहरी ठिठक कर कमर सीधी करती है | वह इस तमाशे को
थोड़ी देर और देखना चाहती है | पर अचानक
दिन आवाज लगा देता है| दिन को बड़ी जल्दी मची है | वह सूरज के कंधे पर सवार हो
गया है | दुपहरी को भी जल्दी आने को कह वह आगे निकल जाता है | दुपहरी सरकती हुयी आगे
बढ़ जाती है | धूप भी पहले पाँव समेटती है फिर अनमने ही घास के मैदान से बहार चली जाती
है |
फिर अचानक से , हड़बड़ी में,रात आ जाती है | उसके आने
का समय शायद अभी नहीं हुआ था |
जल्दीबाजी में वह गीली साड़ी ही पहन कर आ गयी | उसके
गीले साडी से टपक कर, पानी घास की बूंदों को
नम किये देता है | ठंढ से रात भी सिहर जाती
है | हवाएँ तो बिना बताये ही इधर उधर बेमतलब
घूम रहीं हैं | रात को इससे तकलीफ तो होती है ; पर वह उलाहना नहीं देती बल्कि लज्जा
से और सिकुड़ जाती है | अभी -अभी हवाओं ने शायद
रात की साडी को छू लिया है | उनके हाथ गीले
हो गए हैं |
एकाएक घूँघट
उठा कर , कनखी से, रात चाँद को एक नज़र देखती
है | चाँद अभी तक बेखटके रात के सांवले बदन को निहार रहा था | पर अब शरमा जाता है
| शरम से वह एक कोने में छुप जाता है | रात पहले अपनी साड़ी ठीक करती है | अब तो उसका चेहरा
बिल्कुल दिखाई नहीं देता | अबतक हवाएँ
भी थक कर सो गयी है | चाँद भी तब छुपा तो अबतक बाहर नहीं निकला | रात भी अकेले में
उंघने लगी है |
फिर धड़ाके
से नए साल का आगमन होता है | रात की इन्तजार ख़त्म हुई | वह उतावली में नए साल से लिपट
जाती है | हवाएँ कुनमुना कर अपनी उपस्थिति जताती हैं | चाँद भी कहीं कोने से आँख फाड़े यह सब देख रहा
हैं | पर इसका असर न ही रात पर ; न नए साल पर पड़ता हैं |वे दोनों एक दूसरे से लिपटे
पड़ें हैं |
रात के बदन
में एक झुरझुरी सी उठती हैं | उसका इन्तजार अब जा कर ख़त्म हुआ हैं | वह झूमने , नाचने,
गाने ,मस्ती में बहक जाने के मूड में हैं |वह नए साल को जबरदस्ती एक ओर खींचती हैं
| लगभग घसीटे जाते हुए नया साल रात के साथ
जाने को तैय्यार होता हैं | उसने आज जम कर
खाया हैं | उसके मुंह से बदबू आ रही हैं | शायद उसने कुछ चढ़ा भी रखी हैं | वह रात के
आगोश में सिर्फ सोना चाहता हैं | उसे
नींद आ रही हैं | उसे कल दोस्तों के साथ पिकनिक भी जाना हैं | वह रात को कुछ समझाना चाहता हैं |पर रात कहाँ मानने वाली !
आज वह अपने
सारे अरमान पूरे कर लेना चाहती हैं | उसे पता हैं - आज का मिलन आखिरी है | कल फिर नयी सुबह होगी
| कल नया साल नयी सुबह के गले में गलबहियां
डाले घूमता नज़र आएगा | पर उससे क्या ? आज तो वह अपना है | रात नए साल की कलाई जोर से पकड़ कर अपनी और खींच लेती है | नए साल ने भी नखरे छोड़ रात के संग हो लेता है | दोनों खूब नाचते हैं
, एक दूसरे से चिपक चिपक कर | रात खिलखिला
कर हंसती है तो नया साल भी ठठाकर उसका साथ देता है | रात बेतुकी गीत गाती है तो नए
साल के कदम भी लड़खड़ाते हुए थिरकतें है | रात के
कपड़े नए साल के पसीने से भीग गएँ है | पर इसकी परवाह किसे है ? दोनों अपने
आखिरी मिलन को यादगार बनाना चाहतें है | फिर रात थक जाती है | नया साल भी उसके आगोश
में लुढक जाता है | दोनों ही सो
जाते हैं |
तड़के ही जग
कर रात अपने कपड़े ठीक करती है | नया साल अभी
तक सोया हुआ है | रात मुस्कुराती है | उसने नए साल को नयी सुबह से मिलने में थोड़ी देर तो रोक ही दिया ! जब नयी सुबह आएगी और नए साल
को इस तरह सोते देखेगी तो नाराज नहीं होगी क्या ? - यह सोच कर रात फिर मुस्कुराती है
और सोये हुए नए साल के होठों पर एक चुम्बन
देकर चली जाती है - " अलविदा मेरे
सनम ! अलविदा ! अब फिर लौटकर मैं तुम्हारे पास कभी नहीं आउंगी | नयी सुबह तुम्हें मुबारक हो ! याद रखना ! " नए साल को क्या पता कि कौन
आ रहा है और कौन जा रहा है ? वह तो ऐसे समय में हमेशा सोया ही रहता है |
बड़े जोश
में नयी सुबह आती है | उसने बड़े अच्छे बनाव
सिंगार कर रखें है | पर नए साल को नींद में देखकर उसका उत्साह ठंढा पड़ जाता है | वह
यूँ ही बैठकर नए साल के जागने का इन्तजार करने लगती है | काफी देर तक इन्तजार करने के बाद भी नया साल
नहीं जगता है तो वह उसके कानों में जाकर जोर
से चिल्लाती है -" स्वागत है बुद्धू ! नयी सुबह के साथ स्वागत है ! अब तो उठो
!” [क्रमशः]
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