बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

क्रमांक -एक


अलसायी हुई धूप घास के मैदान में पसरी हुयी है | बदरी अपनी सहेलियों के संग आसमान में धमा चौकड़ी मचा रही है | परेशानी में धूप कभी इस करवट तो कभी उस करवट होकर लेटती है , बदरी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता | दुपहरी ठिठक कर कमर  सीधी करती है | वह  इस तमाशे को  थोड़ी देर और  देखना चाहती है |  पर अचानक  दिन आवाज लगा देता है| दिन को बड़ी जल्दी मची है | वह सूरज के कंधे पर सवार हो गया है | दुपहरी को भी जल्दी आने को कह वह आगे निकल जाता है | दुपहरी सरकती हुयी आगे बढ़ जाती है | धूप भी पहले पाँव समेटती है फिर अनमने ही घास के मैदान से बहार चली जाती है |
              फिर  अचानक से , हड़बड़ी में,रात आ जाती है | उसके आने का समय शायद अभी  नहीं हुआ  था |    जल्दीबाजी में  वह  गीली साड़ी ही पहन कर आ गयी  |  उसके गीले साडी से टपक कर,  पानी घास की बूंदों को नम किये देता है | ठंढ से रात भी सिहर  जाती है | हवाएँ तो बिना बताये  ही इधर उधर बेमतलब घूम रहीं हैं | रात को इससे तकलीफ तो होती है ; पर वह उलाहना नहीं देती बल्कि लज्जा से और सिकुड़  जाती है | अभी -अभी हवाओं ने शायद रात की साडी को छू  लिया है | उनके हाथ गीले हो गए हैं | 
             एकाएक घूँघट उठा कर , कनखी से, रात चाँद को  एक नज़र देखती है | चाँद अभी तक बेखटके रात के सांवले बदन को निहार रहा था | पर अब शरमा जाता है | शरम से वह  एक कोने में छुप जाता है | रात  पहले अपनी साड़ी ठीक करती है | अब तो  उसका चेहरा  बिल्कुल  दिखाई नहीं देता | अबतक हवाएँ भी  थक कर सो गयी है | चाँद भी तब छुपा तो अबतक  बाहर नहीं निकला | रात भी अकेले में  उंघने लगी  है |
              फिर धड़ाके से नए साल का आगमन होता है | रात की इन्तजार ख़त्म हुई | वह उतावली में नए साल से लिपट जाती है | हवाएँ कुनमुना कर अपनी उपस्थिति जताती हैं  | चाँद भी कहीं कोने से आँख फाड़े यह सब देख रहा हैं | पर इसका असर न ही रात पर ; न नए साल पर पड़ता हैं |वे दोनों एक दूसरे से लिपटे पड़ें हैं |
             रात के बदन में एक झुरझुरी सी उठती हैं | उसका इन्तजार अब जा कर ख़त्म हुआ हैं | वह झूमने , नाचने, गाने ,मस्ती में बहक जाने के मूड में हैं |वह नए साल को जबरदस्ती एक ओर खींचती हैं | लगभग  घसीटे जाते हुए नया साल रात के साथ जाने को तैय्यार होता हैं  | उसने आज जम कर खाया हैं | उसके मुंह से बदबू आ रही हैं | शायद उसने कुछ चढ़ा भी रखी हैं | वह रात के आगोश में सिर्फ सोना चाहता हैं | उसे नींद आ रही हैं | उसे कल दोस्तों के साथ पिकनिक भी जाना हैं | वह रात को कुछ   समझाना चाहता हैं |पर रात कहाँ मानने वाली !
                 आज वह अपने सारे अरमान पूरे  कर लेना चाहती हैं | उसे पता  हैं - आज का मिलन आखिरी है | कल फिर नयी सुबह होगी | कल नया साल  नयी सुबह के गले में गलबहियां डाले घूमता नज़र आएगा | पर उससे क्या ? आज तो वह अपना है | रात नए  साल की कलाई जोर से पकड़ कर अपनी और खींच लेती है  | नए साल ने भी नखरे  छोड़ रात के संग हो लेता है | दोनों खूब नाचते हैं , एक दूसरे से चिपक चिपक  कर | रात खिलखिला कर हंसती है तो नया साल भी ठठाकर उसका साथ देता है | रात बेतुकी गीत गाती है तो नए साल के कदम भी लड़खड़ाते हुए थिरकतें है | रात के  कपड़े नए साल के पसीने   से  भीग गएँ है | पर इसकी परवाह किसे है ? दोनों अपने आखिरी मिलन को यादगार बनाना चाहतें है | फिर रात थक जाती है | नया साल भी उसके आगोश में लुढक जाता है | दोनों ही सो जाते हैं |
              तड़के ही जग कर रात अपने कपड़े ठीक करती  है | नया साल अभी तक सोया हुआ है | रात मुस्कुराती है | उसने नए साल को नयी सुबह से मिलने में थोड़ी  देर तो रोक ही दिया ! जब नयी सुबह आएगी और नए साल को इस तरह सोते देखेगी तो नाराज नहीं होगी क्या ? - यह सोच कर रात फिर मुस्कुराती है और सोये हुए नए साल के होठों पर एक चुम्बन  देकर  चली जाती है - " अलविदा मेरे सनम ! अलविदा ! अब फिर लौटकर मैं तुम्हारे पास कभी नहीं आउंगी | नयी सुबह तुम्हें मुबारक हो ! याद रखना ! " नए साल को क्या पता कि कौन आ रहा है और कौन जा रहा है ? वह तो ऐसे समय में हमेशा सोया ही रहता है |

                बड़े जोश में नयी सुबह आती है | उसने  बड़े अच्छे बनाव सिंगार कर रखें है | पर नए साल को नींद में देखकर उसका उत्साह ठंढा पड़ जाता है | वह यूँ ही बैठकर नए साल के जागने का इन्तजार करने लगती है | काफी देर तक इन्तजार करने के बाद भी नया साल नहीं जगता है तो वह उसके कानों  में जाकर जोर से चिल्लाती है -" स्वागत है बुद्धू ! नयी सुबह के साथ स्वागत है ! अब तो उठो !”                                                [क्रमशः]

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