बबुआ बिहारी
बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए
b
मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें
शनिवार, 23 जनवरी 2016
चाह-
तिलकुट के रहे :
धोंधा मिलल |
सुख- दुख मिलल
खिचड़ी के
चाउर दाल जइसन |
घीव जइसन,
अनासहूँ कबो -
उपरे से मिलल,
उनकर अनुग्रह |
धरम- दही ;
पापड़ -वैभव ;
अंचार के मत्सर्ग से पहिचान
तनिका बढ़ गईल बा |
जिंदगी अब -
संकरात हो गईल बा |
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें