बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

शनिवार, 23 जनवरी 2016

सावधान !
बामुलाहिजा होशियार !
बीच समर में
रुदालियों के दल बुलाये गए हैं |
दायें- बाएं -आगे -पीछे -
यहां तक कि हरावल दस्तों के बीच
छुपाये गए हैं |
वे जंग नहीं लड़ते
केवल मर्सिया पढ़ते हैं |
रोने को मिले ;कोई मरे तो-
यही कामना करते है |
योद्धाओं !
जंग जरूरी है
पर इससे ज्यादा जरूरी है-
इन रुदालियों को पहचानना |
ये पिछले जंग की विधवाएं हैं,
जिन्होंने जौहर नहीं किया था |
ये कल भी रोई थी ;
आज भी कलपती हैं |
रोज नए-नए शहीद हड़पती हैं |
शहीदों !
जंग जरूरी हैं -
पर इससे ज्यादा जरूरी हैं
जंग के लिए मरना ;
रुदालियों के लिए नहीं |
ये अपने बच्चे खाती हैं |

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