एक महीना से मातवा अइसन जिद पकडले रहनी जे कुल्हि घर के लोग औतियाईल रहे | आ
काल्ह त एकदमे गजब करि देहुवीं | एकदम्मे अन्न जल तियाग के | का जे उहाँ
के चंडीगढ़ ले जाईल जाओ | लोग लाख समुझावाल जे पुरनिया देह ट्रेन के सफर ना
सह पाई | बाकिर उहाँ के जवन जिद ना धयीनी जे लोग केतनो मना के हारल गईल ,
बाकिर दुपहरिया से साँझ लेक अन्न के एको दाना मुंह में ना डालनी | संजय
अपना आजी के दुलरुआ ह्वुआन |उनका के भेजल गईल जे
एको दाना त बुढ़ियो मुंह में डालस | बाकिर ई का जे बुढ़ियो मान जास |हार पाछ
के संजय कहले –“मतवा ईया ! देखीं, ट्रेन के रिजर्वेशन चार महीना पहिले
करावे के परता एही घरी | बिना रिजर्बेशन के के लेखां रउआ चंडीगढ़ जाएम ?’
“हम जेनेरलो में चढ़ि के चल जाईब हो ,केहु खाली हमार देहिया सम्हारे खातिर साथ में चलो ना |”
“जेनरल में हमनी के चढ़ल मुश्किल बा | राउर त पुरनिया देह भईल |”
“ऐ संजय ! हम जेनेरल में गईल नईखी काs जे हमरा के बुरबक बनावत बाड़s लोगिन ? एही जेनरल में हम काशी मथुरा लेक घूम आयिल बानी |ई कह लोगिन जे हमार जांगर नईखे चलत त तहरा लोगिन पर बोझा भईल बानी |नाही त हम पूछे जईति कि अपनहि चल जईति चंडीगढ़ !” तनी टिहुक के मातवा बोलनिं |
अब मतवा के केs समझाओ जे ओह घरी के जमाना अलग रहे |तब ट्रेन से आवे-जाए वाला लोग कम होखे |यह घरी त स्लीपर में लेक ठकठेल लागल रहेला |खैर ,लोग बुझ गईल जे मतवा बिना चंडीगढ़ गईले ना मनिहें, त सोचल गईल जे तत्काल में टिकस लिहल जाई |छोटका बाबा आँगन में आ के कहि गईनी –“मतवा भाभी ,टाटकाल्ह में टिकस कटा दिहल जाई |परसों संजय संघे चंडीगढ़ चल जयिहs |अब मान जा | कुछु अन्न जल ग्रहन कs लs | बाकिर तहरा गईला से होइ काs ? तहार भाई के त होश हवास लेक नईखे |”
“हम नु जानत बानी कि का होइ?”- इहे कहत मतवा खटिया पर से उतर के तनी भात खईनी –“खाली हमरा के जाए ना द लोगिन हमार बबुवा हरखित नु हो जाइ हो |”
मतवा गिने लगनी -दू दिन ट्रेन के सफर ; ओकरा बाद तिसरका दिने सावन के पुनवासी ........|राखी ....| पता ना एह साले काहें उनका अपना भाई के राखी बान्हे के मन करता | आजु लेक त कब्बो भाई के राखी ना बन्हले रहली | बाकिर आजु जब उ कोमा में बाड़े चंडीगढ़ के पी जी आई में, त पता ना काहें दूनी भाई के राखी बान्हे के मन करता | मने-मन बुझाता जे बड़का बाबू हमरा गईला पर हरखित हो जइहें | राखी बन्हवाईहें,उठ के बईठ जइहें |
उनका आपन लइकाई इयाद आवे लागल |मतवा रहनीं त अपना माई बाप के पहिलका संतान -बेटी ! बाकिर मतवा के जन्म भईला पर थरिया ना बाजल –‘इनका से काs कुल उजियार होइ ? आपन ध-बान्ह के दोसरा के घरे चल दीहें|’ फेनु पांच साल बाद अईले- “बड़का बाबू” -माई बाप के दुलरुआ ! अब मतवा के कुसमय शुरू भईल | बड़का बाबू खातिर दूध रहे, घीव रहे, फल रहे, मेवा रहे | ओईमें जवन बच जाऊ तवन मतवा के हिस्सा | कबो मतवा लइकाई में चोरा के कुछु खाइयो लेस त अइसन मार पड़े जे गतर गतर दुखाये लागो –‘ई म्लेछिनी लइकवा के मुंह के कौरा छिनत बिया | चोरी जइसन कु रहन सीखतिया |’ बाद में त मार कुटाई के बेरोक टोक अधिकार बड़का बाबू के मिल गईल | खेलत-में ,कूदत-में ,सुतल-जागल-खात- पियत हर समय बड़का बाबू के मारकूट के स्वाभाविक आश्रय स्थल मतवा के शरीर रहे | बड़का बाबू के अत्याचार के खिलाफ शिकायत के कवनो उपाय ना रहे | कबो-कबो जब प्रतिकार में मातवा बाबू के ठुनकाईयो दीं त बाबू भेम्हा फोर के डहकस|एकरा बाद माई बाप से मतवा के अउरी पिटाई होखे ,एही से अपना छोट भाई के सगरो जुलुम मतवा सहि लीं |
ए माहौल में का भाई खातिर नेह छोह जागी? मतवा के नईखे इयाद जे उहाँ के कबो बड़का बाबू के प्रेम से राखी बन्हले होखेम | कबो माई बाप के बरजोरी राखी बनहईलो होइ त बड़का बाबू ठेंगा देखा के भाग जयिंहे आ तनी देर में राखी नोचा चौथा जाइ|बड़का बाबू- बड़का बाबू रहले ....आ मतवा एगो बेटी -जेकरा दोसरा के घरे जाए के रहे |आ एक दिन सांचहूं में मतवा दोसरा घरे चल गईनी -बियाह क के | आ एहिजा से मतवा के दिन बदलल शुरू भईल | एतना समझदार आ गमखोर पतोह के नाम-जस जवार में फइल गईल | लोग आदर से उहाँ के मतवा जी (महाराज जी के मेहरारू )कहे लागल |मतवा के सोर से अब बड़हन हरिहर गाछ पनप गईल बा |नाती-पोता-बेटा-बहू सब मन जोगे बा लोग |
बाकिर नईहर के मोह कहाँ मेहरारू लोग से छुटेला ? भाई से मतवा के मुंहामुँही सम्बन्ध बनले रहे |बाकिर जब लोग बतावल जे बड़का बाबू के किडनी फेल हो गईल बा आ उ चंडीगढ़ में भर्ती बाड़े तहिया से मतवा बेचैन रहनीं ह | कोमा में गईला के खबर सुन के त मतवा अन्न जल छोड़ देहनी जे चंडीगढ़ आजुवे ले चल लोगिन | ई कहs जे घरवा में अभियो मतवा के लोग बात सुनेला| अब बुझाता जे राखी के दिने चंडीगढ़ ......|-- इहे सोचत मतवा करवट बदलत रात कटनिं आ बिहाने बिहान संजय टू ए सी के तत्काल टिकस ले के आ गईले |संजय के साथे मतवा के चंडीगढ़ जाए के रहे | मतवा के पतोह -पड़पतोह लोग नीमन से तईयार क देहल लोग |मतवा ट्रेन में बईठ के चंडीगढ़ चल देहनीं अपना भाई के राखी बान्हे | राखी एक दिन पहिलहीं जीन बाबा के चढ़ा आयिल रहनीं - “जीन बाबा हमरा भाई के हरखित कs दीं |हम रोट परसाद चढ़ायेम |”
आ मद्ध (ठीक) राखिये के दिने मतवा चंडीगढ़ के पी जी आई में पहुंच गईनी -आपना बड़का बाबू के सामने | बड़का बाबू इंटेंसिव केयर यूनिट में एगो बेड पर एक महीना से पटाईल रहले -अचेत | उनकर कीटोन लेवल बढ़ गईल रहे | दुन्नु किडनी फेल हो गईल रहे | दिमाग में खून के थक्का जम गईल रहे |डाक्टर कहि देहले रहे कि बाँचल मोसकिल बा | मातवा के एतना कुल्हि बात से काs मतलब रहे ? उहाँ के त राखी बान्हे के रहे | स्टाफ केतनो रोकत रही गईले सन-“नो फॉरेन ऑब्जेक्ट प्लीज” ,बाकिर अपना हाथ में राखी के धागा लिहले मतवा भाई के बेड तक पहुंच गईनी |
“बड़का बाबू हो !दाहिना हाथ दs | राखी बान्हे के बा |”
आ जले लेक नर्स पहुँच के राखी के मरीज के हाथ से निकालs सन , बड़का बाबू अपना दोसरा हाथ से छन भर में राखी नोच देहले | ई उनकर पुरान आदत हs -ई मतवा जानत रहली |जब जब मतवा राखी बान्हेली ; बड़का बाबू नोच देले | बाकिर हॉस्पिटल वाला लोग खातिर त ई अचम्भा रहे |बड़का बाबू कोमा से बाहर आ गईल रहले |अचम्भे में हॉस्पिटल वाला लोग मतवा के बड़का बाबू के पंजरा से ना हटावल |मतवा बड़का बाबू के केश सझुरावत रहनी -“बड़का बाबू ! अबकी भईया दूज में हमरा घरे जरूर अईहs |जिन बाबा के रोट प्रसाद साथहीं चढवल जाइ |”
बड़का बाबू के सहमति में पलक झपकावल केs देखल ?केs देखल बड़का बाबू के आँख से लोर बहत? केs कहता जे भाई बहिन के नेह-छोह महतारिये के घर लेक होला ? केs कहता जे खाली बहिनिये के रक्षा खातिर राखी बान्हल जाला ? केs कहता जे भाई बहिन के रिश्ता खाली राखिये के दिन तक रहेला ? एही साल बड़का बाबू भईया दूज के दिने मतवा के घरे जरूर जइहें |
“हम जेनेरलो में चढ़ि के चल जाईब हो ,केहु खाली हमार देहिया सम्हारे खातिर साथ में चलो ना |”
“जेनरल में हमनी के चढ़ल मुश्किल बा | राउर त पुरनिया देह भईल |”
“ऐ संजय ! हम जेनेरल में गईल नईखी काs जे हमरा के बुरबक बनावत बाड़s लोगिन ? एही जेनरल में हम काशी मथुरा लेक घूम आयिल बानी |ई कह लोगिन जे हमार जांगर नईखे चलत त तहरा लोगिन पर बोझा भईल बानी |नाही त हम पूछे जईति कि अपनहि चल जईति चंडीगढ़ !” तनी टिहुक के मातवा बोलनिं |
अब मतवा के केs समझाओ जे ओह घरी के जमाना अलग रहे |तब ट्रेन से आवे-जाए वाला लोग कम होखे |यह घरी त स्लीपर में लेक ठकठेल लागल रहेला |खैर ,लोग बुझ गईल जे मतवा बिना चंडीगढ़ गईले ना मनिहें, त सोचल गईल जे तत्काल में टिकस लिहल जाई |छोटका बाबा आँगन में आ के कहि गईनी –“मतवा भाभी ,टाटकाल्ह में टिकस कटा दिहल जाई |परसों संजय संघे चंडीगढ़ चल जयिहs |अब मान जा | कुछु अन्न जल ग्रहन कs लs | बाकिर तहरा गईला से होइ काs ? तहार भाई के त होश हवास लेक नईखे |”
“हम नु जानत बानी कि का होइ?”- इहे कहत मतवा खटिया पर से उतर के तनी भात खईनी –“खाली हमरा के जाए ना द लोगिन हमार बबुवा हरखित नु हो जाइ हो |”
मतवा गिने लगनी -दू दिन ट्रेन के सफर ; ओकरा बाद तिसरका दिने सावन के पुनवासी ........|राखी ....| पता ना एह साले काहें उनका अपना भाई के राखी बान्हे के मन करता | आजु लेक त कब्बो भाई के राखी ना बन्हले रहली | बाकिर आजु जब उ कोमा में बाड़े चंडीगढ़ के पी जी आई में, त पता ना काहें दूनी भाई के राखी बान्हे के मन करता | मने-मन बुझाता जे बड़का बाबू हमरा गईला पर हरखित हो जइहें | राखी बन्हवाईहें,उठ के बईठ जइहें |
उनका आपन लइकाई इयाद आवे लागल |मतवा रहनीं त अपना माई बाप के पहिलका संतान -बेटी ! बाकिर मतवा के जन्म भईला पर थरिया ना बाजल –‘इनका से काs कुल उजियार होइ ? आपन ध-बान्ह के दोसरा के घरे चल दीहें|’ फेनु पांच साल बाद अईले- “बड़का बाबू” -माई बाप के दुलरुआ ! अब मतवा के कुसमय शुरू भईल | बड़का बाबू खातिर दूध रहे, घीव रहे, फल रहे, मेवा रहे | ओईमें जवन बच जाऊ तवन मतवा के हिस्सा | कबो मतवा लइकाई में चोरा के कुछु खाइयो लेस त अइसन मार पड़े जे गतर गतर दुखाये लागो –‘ई म्लेछिनी लइकवा के मुंह के कौरा छिनत बिया | चोरी जइसन कु रहन सीखतिया |’ बाद में त मार कुटाई के बेरोक टोक अधिकार बड़का बाबू के मिल गईल | खेलत-में ,कूदत-में ,सुतल-जागल-खात- पियत हर समय बड़का बाबू के मारकूट के स्वाभाविक आश्रय स्थल मतवा के शरीर रहे | बड़का बाबू के अत्याचार के खिलाफ शिकायत के कवनो उपाय ना रहे | कबो-कबो जब प्रतिकार में मातवा बाबू के ठुनकाईयो दीं त बाबू भेम्हा फोर के डहकस|एकरा बाद माई बाप से मतवा के अउरी पिटाई होखे ,एही से अपना छोट भाई के सगरो जुलुम मतवा सहि लीं |
ए माहौल में का भाई खातिर नेह छोह जागी? मतवा के नईखे इयाद जे उहाँ के कबो बड़का बाबू के प्रेम से राखी बन्हले होखेम | कबो माई बाप के बरजोरी राखी बनहईलो होइ त बड़का बाबू ठेंगा देखा के भाग जयिंहे आ तनी देर में राखी नोचा चौथा जाइ|बड़का बाबू- बड़का बाबू रहले ....आ मतवा एगो बेटी -जेकरा दोसरा के घरे जाए के रहे |आ एक दिन सांचहूं में मतवा दोसरा घरे चल गईनी -बियाह क के | आ एहिजा से मतवा के दिन बदलल शुरू भईल | एतना समझदार आ गमखोर पतोह के नाम-जस जवार में फइल गईल | लोग आदर से उहाँ के मतवा जी (महाराज जी के मेहरारू )कहे लागल |मतवा के सोर से अब बड़हन हरिहर गाछ पनप गईल बा |नाती-पोता-बेटा-बहू सब मन जोगे बा लोग |
बाकिर नईहर के मोह कहाँ मेहरारू लोग से छुटेला ? भाई से मतवा के मुंहामुँही सम्बन्ध बनले रहे |बाकिर जब लोग बतावल जे बड़का बाबू के किडनी फेल हो गईल बा आ उ चंडीगढ़ में भर्ती बाड़े तहिया से मतवा बेचैन रहनीं ह | कोमा में गईला के खबर सुन के त मतवा अन्न जल छोड़ देहनी जे चंडीगढ़ आजुवे ले चल लोगिन | ई कहs जे घरवा में अभियो मतवा के लोग बात सुनेला| अब बुझाता जे राखी के दिने चंडीगढ़ ......|-- इहे सोचत मतवा करवट बदलत रात कटनिं आ बिहाने बिहान संजय टू ए सी के तत्काल टिकस ले के आ गईले |संजय के साथे मतवा के चंडीगढ़ जाए के रहे | मतवा के पतोह -पड़पतोह लोग नीमन से तईयार क देहल लोग |मतवा ट्रेन में बईठ के चंडीगढ़ चल देहनीं अपना भाई के राखी बान्हे | राखी एक दिन पहिलहीं जीन बाबा के चढ़ा आयिल रहनीं - “जीन बाबा हमरा भाई के हरखित कs दीं |हम रोट परसाद चढ़ायेम |”
आ मद्ध (ठीक) राखिये के दिने मतवा चंडीगढ़ के पी जी आई में पहुंच गईनी -आपना बड़का बाबू के सामने | बड़का बाबू इंटेंसिव केयर यूनिट में एगो बेड पर एक महीना से पटाईल रहले -अचेत | उनकर कीटोन लेवल बढ़ गईल रहे | दुन्नु किडनी फेल हो गईल रहे | दिमाग में खून के थक्का जम गईल रहे |डाक्टर कहि देहले रहे कि बाँचल मोसकिल बा | मातवा के एतना कुल्हि बात से काs मतलब रहे ? उहाँ के त राखी बान्हे के रहे | स्टाफ केतनो रोकत रही गईले सन-“नो फॉरेन ऑब्जेक्ट प्लीज” ,बाकिर अपना हाथ में राखी के धागा लिहले मतवा भाई के बेड तक पहुंच गईनी |
“बड़का बाबू हो !दाहिना हाथ दs | राखी बान्हे के बा |”
आ जले लेक नर्स पहुँच के राखी के मरीज के हाथ से निकालs सन , बड़का बाबू अपना दोसरा हाथ से छन भर में राखी नोच देहले | ई उनकर पुरान आदत हs -ई मतवा जानत रहली |जब जब मतवा राखी बान्हेली ; बड़का बाबू नोच देले | बाकिर हॉस्पिटल वाला लोग खातिर त ई अचम्भा रहे |बड़का बाबू कोमा से बाहर आ गईल रहले |अचम्भे में हॉस्पिटल वाला लोग मतवा के बड़का बाबू के पंजरा से ना हटावल |मतवा बड़का बाबू के केश सझुरावत रहनी -“बड़का बाबू ! अबकी भईया दूज में हमरा घरे जरूर अईहs |जिन बाबा के रोट प्रसाद साथहीं चढवल जाइ |”
बड़का बाबू के सहमति में पलक झपकावल केs देखल ?केs देखल बड़का बाबू के आँख से लोर बहत? केs कहता जे भाई बहिन के नेह-छोह महतारिये के घर लेक होला ? केs कहता जे खाली बहिनिये के रक्षा खातिर राखी बान्हल जाला ? केs कहता जे भाई बहिन के रिश्ता खाली राखिये के दिन तक रहेला ? एही साल बड़का बाबू भईया दूज के दिने मतवा के घरे जरूर जइहें |
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