माथे सेनुर लाल ;
साड़ी लाल ;
साड़ी के किनारी-
जरीवाली ;
नाक में के ठोप -
चानी के ;
कान में -सोना के बाली
हाथ में –मेंहदी- टटका ,
नेलपालिश ;
गोड़ में- महावर ,
पायल घुंघरूवाली;
देह चिक्कन-
टटके में आबटन लगावल ;
मन चिरईया-
हुलसत आकाशे ;
जे काल्ह राति खान -
उनकर सोहागऱात रहे !
मिलन के रात रहे !
आज-भोरे-भोर-
रमुआ के मेहर -
धान के रोपनी बदे-
खेत में आईल बाड़ी |
लोग बा निरखत,
तनी लजाईल बाड़ी |
मजूर के मेहर -
ना लजाईला से
कवनो काम चली |
रानी -पतुरिया ना हई
जे घर में रहींहै |
काम करिहैं |
धान रोपीहैं |
तनिका निहुरि के
धान के कोठी रोपत
गीत गईंहै |
ननदी जब बोली टीबोली
तब लजईहें |
देख लीहें कनखी से
रमुआ के मुस्की |
तब अपनहिं करीहें ठिठोली |
बीग दीहें जान के -
एगो बोझि धान ,रमुआ के ओरि |
अकबका के -
लपक ना पायी रमुआ |
आहि रे बबुवा !
मेहर बिया चोख
ई भोथर रमुआ !
मने मन हो जायी
निहाल रमुआ |
उलीच दिही
अंजुरी भर पानी उठाके |
“धत्त”-
कही मेहर लजाके-
“लोग देखत बा लुकाके” |
“देखे द”-
रमुवा सुनाई
“आज सुहागदिन हउवे” |
काल्ह सुहागरात रहे;
मिलन के रात रहे !
साड़ी लाल ;
साड़ी के किनारी-
जरीवाली ;
नाक में के ठोप -
चानी के ;
कान में -सोना के बाली
हाथ में –मेंहदी- टटका ,
नेलपालिश ;
गोड़ में- महावर ,
पायल घुंघरूवाली;
देह चिक्कन-
टटके में आबटन लगावल ;
मन चिरईया-
हुलसत आकाशे ;
जे काल्ह राति खान -
उनकर सोहागऱात रहे !
मिलन के रात रहे !
आज-भोरे-भोर-
रमुआ के मेहर -
धान के रोपनी बदे-
खेत में आईल बाड़ी |
लोग बा निरखत,
तनी लजाईल बाड़ी |
मजूर के मेहर -
ना लजाईला से
कवनो काम चली |
रानी -पतुरिया ना हई
जे घर में रहींहै |
काम करिहैं |
धान रोपीहैं |
तनिका निहुरि के
धान के कोठी रोपत
गीत गईंहै |
ननदी जब बोली टीबोली
तब लजईहें |
देख लीहें कनखी से
रमुआ के मुस्की |
तब अपनहिं करीहें ठिठोली |
बीग दीहें जान के -
एगो बोझि धान ,रमुआ के ओरि |
अकबका के -
लपक ना पायी रमुआ |
आहि रे बबुवा !
मेहर बिया चोख
ई भोथर रमुआ !
मने मन हो जायी
निहाल रमुआ |
उलीच दिही
अंजुरी भर पानी उठाके |
“धत्त”-
कही मेहर लजाके-
“लोग देखत बा लुकाके” |
“देखे द”-
रमुवा सुनाई
“आज सुहागदिन हउवे” |
काल्ह सुहागरात रहे;
मिलन के रात रहे !
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