बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

शर्त लगी आदमखोरों में
किससे कौन अधिक जन खाय !
मंज़र-मंज़र मातम फैला
कहीं हुआँ -हुआँ; कहीं हाय- हाय !
बैताल बिराजे राजभवन में ,
सबकी एकमत हुई राय !
खून बहे नदियों में अविरल
धरती का जी तिरपित हो जाय !
गली गली सन्नाटा फैले ;
विकराल पवन बहे सायं-सायं !
बड़ी उमस है घर के बाहर
कौन मचाये हाय - हाय !
जबतक गर्दन रहे सलामत ,
तबतक हलवा पूरी खाय !
भले आग लगे छप्पर में ,
घर में घुसे गए रामसुभाय !

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