बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

शनिवार, 29 अगस्त 2015

फेनु मनबढुवी कईल जाव फेनु बदमाशी के काम
चल इयारवा फेनु चलल जाव हमरा महबूबा के गांव |

फेनु से हुरदंग होखे फेनु से कुछुओ धमाल
घर के पिछुवारे चहुँप के हम करीं उनका के चाल |

उ निकल के छत पर आवस झारत आपन भींजल बाल
हम तनी सिसुकी भरीं छाती प रख के आपन हाथ |

उ देखावस जीभ हमके जइसे हमसे ना पहिचान
हम करीं अइसन इशारा जे उनका बिन निकली परान|

एके छने रंग बरसी चारू और छायी बहार
जब झटक के बान्ह लीहें केश के जुड़ा सम्हार |

दिन थथम जाइ तबे चिहुंकी तनी पुरुवा बेयार
केकरा भलुक नीक लागि दू गो प्रेमीजन के प्यार |

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