बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

सोमवार, 7 सितंबर 2015

हे प्रगल्भ - रणछोर ,चोर-माखन के ,हे लीलाधारी
कहां गुम हुई जन्मदिवस पर सह-जन्मी वह बहन तुम्हारी
जन्मदिवस की धुमधाम बस अपने लिए आरक्षित करके
तुम कृतघ्न बैठे हो उसके अस्तित्व -मात्र को विस्मृत करके
तुम पकवानों से घिरे स्वर्ण झूलाओं पर झूले बैठे हो
अपनी बहना के हिस्से का दायभाग भी भूले बैठे हो
हे छद्म वीर रणछोर हमेशा रण में पीठ दिखानेवाले
भरमा भरमाकर लोगों के कंधे से तीर चलानेवाले
घोर विपत्ति बीच हमेशा एक ओट छुपजानेवाले
खुद कर्तव्यहीन अन्य को ज्ञान बहुत सिखलानेवाले
कुछ तो यश गाओ योगमाया के वीर इरादों के
जो सम्मुख होकर लड़ी कंस के दुर्निवार आघातों से
माँ के आँचल में छुपे हुए थे तुम जब गोकुल के राजमहल में
उसी समय से बहन तुम्हारी रहती आई विंध्याचल में
कालांतर में सम्राट हुए अपना इतिहास लिखवाया तुमने
पर बहना का एक हर्फ़ भी जिक्र कहीं ना लाया तुमने
वह आज भी कुछ गुमनाम तुम्हारे नाम से विमुख खड़ी है
माँ है ,पूजा होती है ,पर उसका जन्मदिवस ज्ञात नहीं है
लाज धरो ,केशव!यश गाओ अपनी रक्षाकरिणी बहना का
जब भी जन्म दिवस मनाओ संग मनाओ बहना का

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