बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

सच है,

तुम्हारे पुरखों ने सबकुछ रचा था-

जहाज, रेल, मोबाइल और कम्प्यूटर भी |

कि वे चाँद और सूरज से भी आगे गए थे |

कि भांति-भांति के यन्त्र भी उनने गढे थे |

आकाशवाणी-अभियांत्रिकी-सर्जरी-परमाणु बम

माना कि जो कुछ आज है उनके दिये है  |

पर खटकती है हमेशा बात एक मेरे ह्रदय में

जब कुछ नहीं था उनके पास ; कुछ भी नहीं

( और आज भी कुछ नहीं है तुम्हारे पास; कुछ भी नहीं )

तो शुरुआत कैसे की उन्होंने ?

कुछ सोच - कुछ विचार  - कुछ कर्म - कुछ विज्ञानं

या कि चालीसा पाठ या पोंगा पुराण

या कपोल कल्पना, व्याख्यान -

जो आजकल तुम कर रहे हो |

चन्द भीख और उधारियों पर जी रहे हो |

आज कि प्रोद्योगिकी बहुत आगे बढ़ गयी है |

चेक करवा लो खून अपना


कहीं तुम्हारी नस्ल तो नहीं बदल गयी  है ?

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