सच है,
तुम्हारे पुरखों ने सबकुछ रचा था-
जहाज, रेल, मोबाइल
और कम्प्यूटर भी |
कि वे चाँद और सूरज से भी आगे गए थे |
कि भांति-भांति के यन्त्र भी उनने गढे थे |
आकाशवाणी-अभियांत्रिकी-सर्जरी-परमाणु बम
माना कि जो कुछ आज है उनके दिये है |
पर खटकती है हमेशा बात एक मेरे ह्रदय में
जब कुछ नहीं था उनके पास ; कुछ भी नहीं
( और आज भी कुछ नहीं है तुम्हारे पास; कुछ भी नहीं )
तो शुरुआत कैसे की उन्होंने ?
कुछ सोच - कुछ विचार - कुछ कर्म - कुछ विज्ञानं
या कि चालीसा पाठ या पोंगा पुराण
या कपोल कल्पना, व्याख्यान -
जो आजकल तुम कर रहे हो |
चन्द भीख और उधारियों पर जी रहे हो |
आज कि प्रोद्योगिकी बहुत आगे बढ़ गयी है |
चेक करवा लो खून अपना
कहीं तुम्हारी नस्ल तो नहीं बदल गयी है ?
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