बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

रविवार, 28 दिसंबर 2014

हे प्रथमपूज्य ,हे वक्रतुण्ड, हे लम्बोदर ,मूषकवाहन !
हे शैलसुतासुत, एकदन्त ,हे ऋद्धि -सिद्धि के फलदायक !
एक यक्षप्रश्न का समाधान मै आपसे सुनने आया हूँ I
कितने शीश कटे गिरी पर मैं उनकों गिनने आया हूँ I
माता की लाज बचाने हेतु बाल गणेश प्रहरी- सा डंटा था I
कर्तव्यनिष्ठ था, निर्भय था, इस कारण उसका शीश कटा था I
इतिहास ने खुद को दुहराया है, यह कितनी निष्ठुर विधना है I
आज भी हेमराज का सर माता की रक्षा हेतु कटा है I
उस समय माता के क्रंदन का कुछ भी उपचार हुआ तो था I
किसी तरह गजमस्तक से ही बाल गणेश जिया तो था I
पर नहीं किसी को हेमराज का त्याग दिखाई देता है I
उसके घरवाले रोतें है पर किसे सुनाई देता है ?
खंडित भाल साथ ले गए वे दानव आततायी हैं I
स्वजनों को भी कहाँ त्याग का मोल समझ में आई है ?
कबतक अपमान सहन होगा कबतक माताएं रोयेंगी ?
वसुधा कबतक उसके रक्षा हित उद्द्यत सैनिक खोयेगी ?
हे विघ्नहरण, हे गणनायक ,कुछ ऐसा कौतुक दिखलाएं !
फिर ना कोई माता रोवे फिर ना कोई सर काटा जाये I

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