बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

रविवार, 28 दिसंबर 2014

आमद - ए - हुस्न जब रेल में बढ़ जाती है
खुदा कसम ट्रेन जन्नत-सी नज़र आती है
कुछ दूध से भी गोरी , कुछ सांवली काजल-जैसी
कुछ हिज़ाबवालियों के चहरे पर जाली है
सुर्ख ,फिरोज़ी ,बैगुनी हैं पोशाक उनके
फिज़ाओ में खुशनुमा ,सतरंगी बहार आई है
इत्तर- फुलेल की खुश्बूएं फैलीं हरसूँ
कोई चमेली है ,चंपा है ,तो कोई गुलाब की डाली है
कोई इशारों से करे बात ;कोई देख कर शर्माएं
किसी ने मेरी नाम- पता- हैसियत तक पूछ डाली है
बंदिशे सख्त हैं ; पर जोश मेरा भी कम नहीं
मंज़िल दूर है अभी ;रेल का सफर जारी है

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