कभी यह सोचता हूँ कि ग़ालिब बन ही जाऊँ मैं
मगर अच्छा नहीं लगता है मुझको मुसलमाँ होना |
चलो शुरुआत करतें है, मुसलमाँ बन भी जाते है
मुझे ही कुफ्र लगता है मेरा दारू पिया होना |
यहाँ तक ठीक है, दो बूँद दारू पी लिया तो क्या
घटिया है ,किसी बेहैसियत साकी पर फ़िदा होना |
हुस्ने -साकी की लज्जत आजमाने में बुराई क्या
मगर ये बेहयाई है कि उसपर ग़ज़ल कहना |
ग़ालिब!लिखो तुम शेर ,पढूंगा मैं, मज़े लूँगा
मुझे बेहतर यही जंचता है जहाँ हूँ मैं; वहीँ रहना |
मगर अच्छा नहीं लगता है मुझको मुसलमाँ होना |
चलो शुरुआत करतें है, मुसलमाँ बन भी जाते है
मुझे ही कुफ्र लगता है मेरा दारू पिया होना |
यहाँ तक ठीक है, दो बूँद दारू पी लिया तो क्या
घटिया है ,किसी बेहैसियत साकी पर फ़िदा होना |
हुस्ने -साकी की लज्जत आजमाने में बुराई क्या
मगर ये बेहयाई है कि उसपर ग़ज़ल कहना |
ग़ालिब!लिखो तुम शेर ,पढूंगा मैं, मज़े लूँगा
मुझे बेहतर यही जंचता है जहाँ हूँ मैं; वहीँ रहना |
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