बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

रविवार, 28 दिसंबर 2014

चाऊंर के खेत |
सोगहक धनगर खेत |
दादा - परदादा के निशानी खेत |
घर के इज्जत , खानदानी खेत |
माटी से सोना उपिजावे |
अन्न -धन के बरखा करवावे |
दुलरुआ पूत से अधिक लायक -
सभकर हियरा जुड़ावे खेत |
उहे खेत ,
मटियामेट ---
करि दिहले चारु भाई |
जिनकर झागरा कहियो ना ओराई |
इंची टेप से नापल जाइ
आरी -डंडारी से पाटल जाइ |
गते - गते काटल जाइ
सँउसे लमहर खेत |
अब कइसे हरखित रहि पाई -
आ दोसरा के का भूख़ मेटाई -
अपने दूबर पातर खेत |
हाय रे ! हेतना असहाय -
छींछवत--कुहुकत --बिसूरत – टूअर -
भाई -भाई में बाँटल खेत !

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