बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

रविवार, 8 मई 2016

जवनी गंगा में
गूह -मूत कुल्हि बोरल  बा |
जवनी गंगा में
दुनिया भर के
कचरो- डभरो   घोरल बा |
जवनी गंगा में
कल -कारखाना के
कानो- पाँकी  - गाद- रसायन
जानबूझ के छोड़ल बा  |
जवनी गंगा के
छानल   साफ़ पानी
भी आई पी खातिर अगोरल बा |
जवनी गंगा के
सरत-महकत पानी
जनता के माथे थोपल बा  |
तवनी गंगा  में .... |
“सावधान !
गंगा ना ; गंगा माई कहs  |
हं भाई !
तवनी गंगा माई में
पहिले गोड़ डुबाईं  कि माथा
सोचे लागले काका ;
गंगा नहान के बेरा |
हं; काका साफे बुरबक हवुअन |

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