बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

कुछ गीली यादें शेष बची हैं
छुट्टियां चुक जाने के बाद
घर की चौखट बुला रही है
बाहर आ जाने के बाद

****उन हिलते परदों के भीतर
**** छुपी हुयी कजरारी आँखें
**** वहीँ कहीं कोने में दुबकी
**** बिटिया की नन्ही-नन्ही बाहें

बाहर बैठक में ठिठका मन
बूढ़े बाबा के बिलकुल पास
घर की चौखट बुला रही है
बाहर आ जाने के बाद

****एक छौंक के खुश्बू से तर
**** सांसों से ललचाती जीभ
****बूढी स्नेहिल हाथें जो
**** भोजन संग परसती सीख

पकी हुई मूंछों पर थिरती
अपनापन भरी मधुर मुस्कान
घर की चौखट बुला रही है
बाहर आ जाने के बाद

****इन सबसे ज्यादा याद आते
****घर की चिंता में अपना अंश
**** अम्मा की पिराती आँखें
**** बापू के घुटने का दर्द

बीबी की वंचित फरमाइशें
बेटी के अधूरे अरमान
घर की चौखट बुला रही है
बाहर आ जाने के बाद

**** यह भूख पेट की बड़ी क्रूर है
**** छुड़वा देती है अपना देश
****तोड़ के सारे रिश्तें नाते
**** घूम हूँ रहा हूँ देश विदेश

मन, लेकिन , अभी वहीँ अटका है
अपने घर- अपनी मिटटी अपने गांव
घर की चौखट बुला रही है
बाहर आ जाने के बाद

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