बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

रविवार, 15 जून 2014

पत्नी के प्रति

पत्नी के प्रति

तुमको जब भी चुनने का संकट आये 
ध्यान रहे, मै मात्र विकल्प नहीं हूँ !
मै जो हूँ ,जैसा हूँ ,जितना भी हूँ ,
प्रथम नहीं अंत भी नहीं---
बहुत अधिक या अल्प नहीं हूँ !
सबसे ऊपर, सर्वोपरि या उससे भी ऊपर कुछ हो 
मै उसका स्वाभाविक दावेदार हूँ ; द्वंद्व नहीं हूँ !
तुझपर मेरे अधिकार क्षेत्र का निर्णयकर्ता 
मै ईश्वर से भी ज्यादा स्वछन्द कहीं हूँ !

तुम हो मेरे होने की बस एक वज़ह 
तेरे बस होने से ही कुछ हो भी पाता है !
जो करता हूँ जो धरता हूँ जो हाड़ तोड़ कर लड़ता हूँ 
सबका निमित्त सर्वस्व तुम्ही और श्रेय तुम्हे ही जाता है !
अंतर क्या तेरे मेरे में जब अंतर्मन है एकरूप 
जो भी कहता हूँ मै मुख से, तेरा मन ही उसे सुझाता है ! 
जीवन - धन- मन - तन हो तुम मेरे 
स्वीकार तुम्हारा ही मुझको जग में पहचान दिलाता है !

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