बड़बड़ाने की आदत है न ....इसलिए

रविवार, 15 जून 2014

गाँव का खत

गाँव का खत 


मेरे गाँव ने फिर मुझको खत भेजा है , बुलाया है !
बाट जोहती राह थक गयी
पगडण्डी की कमर टूट गयी
पुलिया नाले को अब क्या जोड़े
उसकी अपनी पीठ दरक गयी

आओ पैरों से पीठ दबा दो ----
ऐसा खत में लिखवाया है !
मेरे गाँव ने फिर मुझको खत भेजा है , बुलाया है !

बँसवारी से कोयल कूके
फुलवारी में कुत्ते भूंके
घर की छत पर कौआ आकर
कब आओगे --ऐसा पूछे

अबके तो निश्चय ही आओगे
ऐसा सबने माना है !
मेरे गाँव ने फिर मुझको खत भेजा है , बुलाया है !

ईंख के रस का स्वाद बदल गया
घूरे का जलना अब कम गया
मिसरी आम का पेड़ पुराना
पिछले साल चुपचाप गुजर गया

परिवर्तन ही नियति है जग का
जड़ता तो मात्र छलावा है !
मेरे गाँव ने फिर मुझको खत भेजा है , बुलाया है !

खेल खेल के साथी सारे
सबने मिल कर गांव बिसारे
बूढ़े जिनसे हम लड़ते थे
एक एक कर स्वर्ग सिधारे

चला चली की बेला मिल लो
खत में ऐसा कहलाया है!
मेरे गाँव ने फिर मुझको खत भेजा है , बुलाया है !

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